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श्री शिव आरती (सर्वेशं परमेशं)

Sarvesham Paramesham Shiv Aarti

श्री शिव आरती (सर्वेशं परमेशं)
सर्वेशं परमेशं श्रीपार्वतीशं वन्देऽहं विश्वेशं श्रीपन्नगेशम्।
श्रीसाम्बं शम्भु शिवं त्रैलोक्यपूज्यं वन्देऽहं त्रैनेत्रं श्रीकंठमीशम्॥१॥

भस्माम्बरधरमीशं सुरपारिजातं बिल्वार्चितपदयुगलं सोमं सोमेशम्।
जगदालयपरिशोभितदेवं परमात्मं वन्देऽहं शिवशङ्करमीशं देवेशम्॥२॥

कैलासप्रियवासं करुणाकरमीशं कात्यायनीविलसितप्रियवामभागम्।
प्रणवार्चितमात्मार्चितं संसेवितरूपं वन्देऽहं शिवशङ्करमीशं देवेशम्॥३॥

मन्मथनिजमददहनं दाक्षायनीशं निर्गुणगुणसंभरितं कैवल्यपुरुषम्।
भक्तानुग्रहविग्रहमानन्दजैकं वन्देऽहं शिवशङ्करमीशं देवेशम्॥४॥

सुरगंगासम्प्लावितपावननिजशिखरं समभूषितशशिबिम्बं जटाधरं देवम्।
निरतोज्ज्वलदावानलनयनफालभागं वन्देऽहं शिवशङ्करमीशं देवेशम्॥५॥

शशिसूर्यनेत्रद्वयमाराध्यपुरुषं सुरकिन्नरपन्नगमयमीशं संकाशम्।
शरवणभवसम्पूजितनिजपादपद्मं वन्देऽहं शिवशङ्करमीशं देवेशम्॥६॥

श्रीशैलपुरवासं ईशं मल्लीशं श्रीकालहस्तीशं स्वर्णमुखीवासम्।
काञ्चीपुरमीशं श्रीकामाक्षीतेजं वन्देऽहं शिवशङ्करमीशं देवेशम्॥७॥

त्रिपुरान्तकमीशं अरुणाचलेशं दक्षिणामूर्ति गुरुं लोकपूज्यम्।
चिदम्बरपुरवासं पञ्चलिंगमूर्तिं वन्देऽहं शिवशङ्करमीशं देवेशम्॥८॥

ज्योतिर्मयशुभलिंगं सङ्ख्यात्रयनाट्यं त्रयीवेद्यमाद्यं पञ्चाननमीशम्।
वेदाद्भुतगात्रं वेदार्णवजनितं वेदायं विश्वायं श्रीविश्वनाथम्॥९॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"सर्वेशं परमेशं" भगवान शिव को समर्पित एक गहन और श्रद्धामयी संस्कृत आरती है। इसका शीर्षक ही इसके महत्व को प्रकट करता है: 'सर्वेशं' (सभी के ईश्वर) और 'परमेशं' (परम ईश्वर)। यह आरती भगवान शिव को केवल एक देवता के रूप में नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के सर्वोच्च और सर्वव्यापी स्वामी के रूप में पूजती है। इस स्तुति की एक अनूठी विशेषता यह है कि यह भारत भर में स्थित भगवान शिव के विभिन्न प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों और पवित्र स्थानों (जैसे श्रीशैल, कालहस्ती, कांची, अरुणाचल, चिदंबरम और काशी) का उल्लेख करती है, जिससे यह एक संगीतमय तीर्थयात्रा (a musical pilgrimage) बन जाती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों और उनकी महिमा का विस्तार से वर्णन करती है:

  • सर्वोच्च ईश्वर (The Supreme Lord): "सर्वेशं परमेशं श्रीपार्वतीशं वन्देऽहं विश्वेशं" - 'मैं सभी के ईश्वर, परम ईश्वर, श्री पार्वती के पति, और संपूर्ण विश्व के स्वामी को वंदन करता हूँ।' यह प्रारंभिक पंक्ति ही आरती के मुख्य भाव को स्थापित कर देती है।
  • योगी और गृहस्थ का संतुलन (Balance of Ascetic and Householder): आरती में उन्हें "भस्माम्बरधरम्" (भस्म के वस्त्र धारण करने वाले) और "कैलासप्रियवासं" (कैलास में प्रेम से वास करने वाले) के साथ-साथ "कात्यायनीविलसितप्रियवामभागम्" (देवी कात्यायनी/पार्वती जिनके सुंदर वाम भाग में विराजित हैं) भी कहा गया है, जो उनके वैरागी और गृहस्थ स्वरूपों का अद्भुत संतुलन दिखाता है।
  • निर्गुण और सगुण (Formless and with Form): "निर्गुणगुणसंभरितं कैवल्यपुरुषम्" - यह एक गहन दार्शनिक पंक्ति है, जिसका अर्थ है 'आप निर्गुण होते हुए भी सभी गुणों से परिपूर्ण हैं और कैवल्य (परम मुक्ति) के स्वरूप हैं।' यह अद्वैत वेदांत (Advaita Vedanta) के एक मूल सिद्धांत को दर्शाता है।
  • विभिन्न तीर्थों में वास (Abode in Various Holy Places): आरती में श्रीशैल (मल्लिकार्जुन), श्रीकालहस्ती, कांची (एकाम्रेश्वर), अरुणाचल, चिदंबरम (नटराज) और काशी (विश्वनाथ) जैसे महान शैव तीर्थों का उल्लेख है, जो भगवान शिव की अखिल भारतीय उपस्थिति और तीर्थयात्रा के महत्व (importance of pilgrimage) को दर्शाता है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती विशेष रूप से महाशिवरात्रि (Mahashivratri) के पर्व पर और श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार (Monday) को की जाती है।
  • जिन भक्तों ने विभिन्न ज्योतिर्लिंगों की यात्रा की है, उनके लिए यह आरती उन सभी पवित्र स्थानों का एक साथ स्मरण करने का एक सुंदर माध्यम है।
  • चूंकि यह संस्कृत में है, इसका शांत और भक्तिपूर्ण गायन एक अत्यंत पवित्र और ध्यानपूर्ण वातावरण बनाता है, जो मन को ईश्वर से जोड़ने में मदद करता है।
  • इस आरती का नियमित पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है, जो भक्तों को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर सुरक्षा और समृद्धि (protection and prosperity) प्रदान करते हैं।
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