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श्री शिवार्तिक्यम् (हालहलविषपानं)

Halahalavishapanam Shiv Aarti

श्री शिवार्तिक्यम् (हालहलविषपानं)
हालहलविषपानं त्रिपुराणां मथनं,
नाथ कथङ्कारमहं कुर्यां तत्कथनं।
चरितममितमन्धकमुखजगदहितक्रथनं,
यदलङ्कृतये तत्तद्धतशिरसां ग्रथनं॥

जय जय शिशुशशिशेखर शिव! कामाराते!
ज्ञातमिदं परमेश्वर करुणा स्फारा ते॥ध्रुव॥१॥

उपमन्यव ईशकृतं दुग्धोदधिदानं,
काश्यां दीयत एव प्राणिभ्यो ज्ञानं।
दस्युरितः शिरसि पदं दत्वापि विमानं,
बहुमतमिदमेव सतां कीर्तिसुधापानम्॥जय जय॥२॥

नाम्यस्त्वादर ईश ग्रीष्म इव व्यजने,
बालस्य क्रीडन इव वा भवतो भजने।
मामुद्धर मा मुद्धर! नश्यतु में भजने,
भक्तमयूरघन त्वं परिगणय स्वजने॥जय जय॥३॥

॥ इति श्रीरामनन्दनमयूरेश्वरकृतं शिवार्तिक्यं सम्पूर्णम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

18वीं सदी के महान मराठी कवि मोरोपंत (मयूरेश्वर) द्वारा रचित यह 'शिवार्तिक्यम्' (शिव की आरती), भगवान शिव की पौराणिक लीलाओं और उनकी अपार करुणा का एक अद्भुत काव्यात्मक वर्णन है। आरती का आरंभ ही "हालहलविषपानं" (हलाहल विष का पान) से होता है, जो समुद्र मंथन की उस प्रसिद्ध कथा का उल्लेख है जहाँ भगवान शिव ने सृष्टि को बचाने के लिए विष पी लिया था। कवि अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए कहता है, "हे नाथ! मैं आपके उन महान चरित्रों का कथन कैसे करूँ?" यह आरती शिव के परोपकारी, शक्तिशाली और भक्त-वत्सल स्वरूप पर केंद्रित है। इसका पाठ करना केवल एक पूजा नहीं, बल्कि भगवान शिव की महान लीलाओं का स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता (gratitude) व्यक्त करने का एक सुंदर माध्यम है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती भगवान शिव की पौराणिक कथाओं और उनके दयालु स्वभाव का गुणगान करती है:

  • करुणा का सागर (Ocean of Compassion): "हालहलविषपानं... ज्ञातमिदं परमेश्वर करुणा स्फारा ते" - 'हलाहल विष का पान करना' और 'त्रिपुरासुर का नाश करना' जैसी लीलाओं का वर्णन करने के बाद, कवि कहता है, 'हे परमेश्वर! इससे ज्ञात होता है कि आपकी करुणा अपार है।' यह शिव के परोपकारी स्वभाव को उजागर करता है।
  • भक्तों पर कृपा (Grace upon Devotees): "उपमन्यव ईशकृतं दुग्धोदधिदानं" - यहाँ ऋषि उपमन्यु की कथा का संदर्भ है, जिनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनके लिए क्षीरसागर (दूध का सागर) उत्पन्न कर दिया था। यह दर्शाता है कि भगवान अपने भक्तों की छोटी-सी इच्छा पूरी करने के लिए भी extraordinary acts करते हैं।
  • काशी में मोक्ष (Liberation in Kashi): "काश्यां दीयत एव प्राणिभ्यो ज्ञानं" - यह पंक्ति काशी (वाराणसी) की महिमा का वर्णन करती है, जहाँ माना जाता है कि भगवान विश्वनाथ स्वयं प्राणियों को तारक-मंत्र देकर ज्ञान और मोक्ष प्रदान करते हैं।
  • भक्त की विनम्र पुकार (A Humble Plea of the Devotee): "मामुद्धर मा मुद्धर! ... भक्तमयूरघन त्वं परिगणय स्वजने" - अंत में कवि (मयूर) एक विनम्र भक्त के रूप में प्रार्थना करता है, 'मेरा उद्धार करो, मेरा उद्धार करो! आप भक्तों के लिए मेघ (घन) के समान हैं, कृपया मुझे भी अपने जनों में गिन लें।' यह भक्त की तीव्र आकांक्षा और an earnest prayer को दर्शाता है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती महाशिवरात्रि (Mahashivratri) और श्रावण सोमवार के दिनों में संध्याकालीन पूजा के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
  • इसका पाठ करते समय, भगवान शिव की उन लीलाओं का ध्यान करना चाहिए जिनका इसमें वर्णन है, जैसे विषपान करना और उपमन्यु पर कृपा करना।
  • यह आरती भगवान शिव के प्रति प्रेम, समर्पण और करुणा की भावना को बढ़ाती है।
  • जो भक्त भगवान शिव के दयालु और भक्त-वत्सल स्वरूप से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए इस आरती का पाठ करना विशेष रूप से मन को शांति (mental peace) और आनंद प्रदान करता है।
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