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श्री शिवार्तिक्यम् (गौरीकान्तं नौमि)

Gaurikantam Naumi Shiv Aarti

श्री शिवार्तिक्यम् (गौरीकान्तं नौमि)
गौरीकान्तं नौमि सदा निर्जरदान्तं॥ध्रुव॥

कामारातिं पावकभालं जनपालं, मायालीलं चन्द्रकलारञ्जितमौलिं।
योगातीतं योगिभिरन्तः स्तुतिगीतम्॥गौरी॥१॥

गङ्गामालं दानवकालं मुनिपालं, देवाधीशं व्यालकुलालङ्कृतवेषं।
क्षोणीनाथं वारणचार्माम्बरकायम्॥गौरी॥२॥

नानावाद्यैस्ताण्डवकाले सुरसङ्गैः, नागादैः सामकलाभिस्तुतिपूज्यैः।
सर्वोपायं वारणदत्ताम्बरकायम्॥गौरी॥३॥

नानारूपै नानाभुवनानि, सूक्ष्मासूक्ष्मैः स्थूलतरास्थूलतरैः।
लालितपालितदीनं दिनदशपालम्॥गौरी॥४॥

पाशबाणैः संयुतं खेलन्तमनन्तं, दीक्षाभङ्गं दक्षिणकान्तं कृतवन्तं।
वेदैः शास्त्रैर्वन्दितपादं सुरमोदम्॥गौरी॥५॥

क्षोणीपालं वारिमयं त, तेजोरूपं चन्द्रमयं सूर्यमयं चार्क।
तारामागैः सोमकलाक्षं त्रिपुरान्तम्॥गौरी॥६॥

भूतानन्दं मर्दितभस्मासुरकन्दं, वाराणस्या सेवितविश्वेश्वरपादं।
यन्त्रैस्तीर्थैर्मन्त्रैः परैर्मानसगीतम्॥गौरी॥७॥

प्रातःकाले शङ्करमालारुचि मेतं, अस्य मयूरकृतित्वे सन्देग्धि नश्वेतः।
रामानन्दे जल्पति कान्तं रमणीयं, भुक्रवाभोगं वञ्चति योगाङ्कितगम्यं।
स्नानं शम्भो मत्तमयूरेश्वरवृन्दम्॥गौरी॥८॥

॥ इति श्रीरामनन्दनमयूरेश्वरकृतं शिवार्तिक्यं सम्पूर्णम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"गौरीकान्तं नौमि" एक 'शिवार्तिक्यम्' है, जो भगवान शिव को समर्पित एक काव्यात्मक संस्कृत आरती है। इसकी रचना 18वीं सदी के महान मराठी कवि मोरोपंत रामचन्द्र पराडकर ने की थी, जिन्हें 'मयूर पंडित' (मयूरेश्वर) के नाम से भी जाना जाता है। मोरोपंत अपनी जटिल और अलंकृत काव्य शैली के लिए प्रसिद्ध थे, और यह आरती उसी का एक सुंदर उदाहरण है। 'शिवार्तिक्यम्' का अर्थ है 'शिव की आरती'। यह रचना भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों, लीलाओं और गुणों का एक गहन और भक्तिपूर्ण स्तुतिगान है। इसका पाठ करना न केवल भगवान शिव की पूजा करना है, बल्कि संस्कृत काव्य की सुंदरता और भक्ति रस का आनंद लेना भी है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती भगवान शिव के विविध और अक्सर विरोधाभासी गुणों का एक साथ वर्णन करती है:

  • गौरी के पति (The Husband of Gauri): "गौरीकान्तं नौमि सदा निर्जरदान्तं" - 'मैं गौरी के पति को नमन करता हूँ, जो सदा दानवों पर विजय प्राप्त करते हैं।' यह उनके सौम्य गृहस्थ और शक्तिशाली संहारक, दोनों रूपों को एक साथ प्रस्तुत करता है।
  • कामदेव के शत्रु (The Enemy of Kamadeva): "कामारातिं पावकभालं जनपालं" - वे 'कामदेव के शत्रु' हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि (पावक) है, और जो फिर भी सभी जनों के पालक हैं। यह दर्शाता है कि सर्वोच्च वैराग्य (asceticism) धारण करते हुए भी वे सृष्टि का पालन करते हैं।
  • तांडव के स्वामी (The Lord of Tandava): "नानावाद्यैस्ताण्डवकाले सुरसङ्गैः" - आरती में उनके तांडव नृत्य का उल्लेख है, जिसके समय विभिन्न वाद्ययंत्रों के साथ देवतागण उनकी स्तुति करते हैं। यह सृष्टि और प्रलय के उनके लौकिक नृत्य (cosmic dance) का प्रतीक है।
  • सूक्ष्म और स्थूल स्वरूप (Subtle and Gross Forms): "सूक्ष्मासूक्ष्मैः स्थूलतरास्थूलतरैः" - कवि कहते हैं कि वे सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और स्थूल से भी स्थूल रूपों में अनेक भुवनों का लालन-पालन करते हैं। यह ईश्वर की सर्वव्यापकता (omnipresence) और हर कण में उनके वास को दर्शाता है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती महाशिवरात्रि (Mahashivratri) और श्रावण सोमवार के दिन सायंकाल की पूजा में गाने के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।
  • यह एक शास्त्रीय रचना है, इसलिए इसे शांत और भक्तिपूर्ण वातावरण में, शब्दों के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करते हुए गाना चाहिए।
  • भगवान शिव के समक्ष दीपक जलाकर इस आरती का पाठ करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जो सभी प्रकार के दुखों का हरण करते हैं।
  • इसका नियमित पाठ संस्कृत भाषा के प्रति प्रेम को बढ़ाता है और भक्त को भगवान शिव के दार्शनिक और काव्यात्मक स्वरूप से जोड़ता है, जिससे मानसिक शांति (mental peace) और आध्यात्मिक आनंद मिलता है।
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