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संस्कृतभाषा

नीराजना आरती (जय संस्कृतभाषे) - Sanskrit Bhasha Aarti

संस्कृतभाषा
जय संस्कृतभाषे, जय संस्कृतभाषे,
कुरु करुणां करुणार्द्रे, त्वच्छरणे दासे॥ध्रु॥
वेदा भगवद्गीता उपनिषदः सर्वाः,
तव वै दिव्यशरीरं यैस्त्वं सद्गर्वा॥१॥
कपिलपतञ्जलिशङ्करगोतमकणभुग्भिः,
जैमिनिमुख्यैर्मुनिभिरिष्टा बहुसद्भिः॥२॥
व्यासः कालीदासो भारविकविबाणौ,
भवभूतिर्भवभूतिः, भासश्रीहर्षो॥३॥
कोऽन्यो लोके यो वै समतामेषां कुरुतां,
वाल्मीकिश्च सुबन्धुः, क्वान्यस्यामास्ते॥४॥
वेदौ ज्योतिर्धनुषोः पुनरायुर्वेदः,
अतुलरसायनशास्त्रं कस्तुलयेल्लोके॥५॥
किं तच्छास्त्रं लोके न त्वं यन्मूलं,
नास्ति जगद्धितकारिणि, जनसुखमनुकूलम्॥६॥
विश्वस्मिन् विश्वेऽस्मिन् शान्तिश्चेन्मृग्या,
त्वच्चरणौ हित्त्वा नो गतिरिह जनवासे॥७॥
जनिमरणाद्भुतदुःखैः परिपूर्णे भुवने,
तव चरणौ किल शरणं स्यातामाशासे॥८॥
वयमपि भवभयभीता भी-तापह-रूपाम्,
त्वां शरणं प्राप्ताः, कुरु करुणां करुणार्द्रैः॥९॥
त्यक्त्वा खर्वं कूपं जलनिधिरुपसेव्यः,
विश्वे विश्वजना इह सादरमर्थ्यन्ते॥१०॥
रामः परशुसपूर्वोऽपूर्वैः स्तुतिदीपैः,
मातः आरार्त्तिक्यं कुर्वन् त्वच्चरणौ श्रयते॥११॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"जय संस्कृतभाषे" एक असाधारण और अत्यंत महत्वपूर्ण 'नीराजना' (आरती) है, जो किसी देवता के बजाय स्वयं संस्कृत भाषा को समर्पित है। इस रचना में, संस्कृत को एक करुणामयी देवी, 'संस्कृत-माता', के रूप में पूजा गया है, जो ज्ञान और संस्कृति का स्रोत है। यह आरती संस्कृत के महत्व को उजागर करती है, उसे 'देवभाषा' (देवताओं की भाषा) और भारत की संपूर्ण ज्ञान-परंपरा की जननी बताती है। इसका पाठ करना केवल एक भाषा का सम्मान नहीं, बल्कि उन सभी शास्त्रों, दर्शनों, काव्यों और विज्ञानों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है, जो संस्कृत के माध्यम से हमें विरासत में मिले हैं। यह आरती ज्ञान के उपासकों और भारतीय culture से प्रेम करने वालों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती संस्कृत भाषा की महिमा और उसके योगदान का गुणगान करती है:

  • वेदों और शास्त्रों का शरीर (Body of Vedas and Scriptures): "वेदा भगवद्गीता उपनिषदः सर्वाः, तव वै दिव्यशरीरं..." - यह पंक्तियाँ कहती हैं कि सभी वेद, भगवद्गीता और उपनिषद् आपके ही दिव्य शरीर हैं, जिन पर आपको गर्व है। यह संस्कृत को संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान का मूर्त रूप (embodiment of spiritual knowledge) मानता है।
  • ऋषियों और कवियों की पूज्या (Worshipped by Sages and Poets): आरती में महान दार्शनिकों (कपिल, पतञ्जलि, शङ्कर, गौतम) और कवियों (व्यास, कालिदास, वाल्मीकि, भवभूति) का उल्लेख है। यह दर्शाता है कि भारत के महानतम विचारकों और साहित्यकारों ने इसी भाषा में अपने ज्ञान को व्यक्त किया और इसे पूजा।
  • सभी ज्ञान का मूल (The Root of All Knowledge): "किं तच्छास्त्रं लोके न त्वं यन्मूलं..." - 'संसार में ऐसा कौन सा शास्त्र है जिसका मूल आप में नहीं है?' यह पंक्ति संस्कृत के विशाल ज्ञान भंडार को रेखांकित करती है, जिसमें आयुर्वेद, ज्योतिष, धनुर्वेद और रसायन शास्त्र जैसे अनगिनत विषय शामिल हैं।
  • विश्व शांति का मार्ग (The Path to World Peace): "विश्वस्मिन् विश्वेऽस्मिन् शान्तिश्चेन्मृग्या, त्वच्चरणौ हित्त्वा नो गतिरिह..." - 'यदि इस विश्व में शांति की तलाश है, तो आपके चरणों को छोड़कर कोई दूसरा मार्ग नहीं है।' यह संस्कृत में निहित 'वसुधैव कुटुम्बकम्' जैसे शांति और universal brotherhood के संदेशों की ओर संकेत करता है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती किसी भी शास्त्र, ग्रंथ या संस्कृत साहित्य का अध्ययन शुरू करने से पहले मंगलाचरण के रूप में की जा सकती है। यह ज्ञान के प्रति श्रद्धा और विनय का भाव पैदा करती है।
  • गुरु पूर्णिमा और वसंत पंचमी (देवी सरस्वती का दिन) जैसे अवसरों पर इस आरती का पाठ करना अत्यंत शुभ और सार्थक होता है।
  • इसे करने के लिए किसी विशेष मूर्ति की आवश्यकता नहीं है। आप अपने ग्रंथों या पुस्तकों को ही देवी का स्वरूप मानकर उनके समक्ष दीपक जलाकर यह आरती कर सकते हैं।
  • इस आरती का नियमित पाठ छात्रों, शिक्षकों, और ज्ञान के सभी उपासकों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है। यह स्मरण शक्ति, एकाग्रता (concentration) और विषय की गहरी समझ विकसित करने में मदद करता है।
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