ॐ जय जगदीश हरे भक्तिजनेड्यविभो त्वयि
मम रतिरस्तु परे॥
यस्त्वां ध्यायति धन्यः सन्ततमनुरागी।
स भवति जनिमृतिरहितः श्रेयः फलभागी॥१॥
त्वं जननी जनको मे त्वं विपदुद्धर्ता।
त्वं शरणः शरणप्रद सकलैनोहर्ता॥२॥
पूर्णस्त्वं परमात्मन् सर्वान्तर्यामी।
ब्रह्मपरमेश्वरभर्तः त्वं सर्वस्वामी॥३॥
त्वं पालयिता पातस्त्वं करुणासिन्धुः।
दुर्वृत्तेरपि जन्तोस्त्वमकारणबन्धुः॥४॥
सर्वागोचर एकः सकलासुगणेशः।
प्राप्यः केन कुमतिना मयि का परमेशः॥५॥
दीनोद्धारः प्रभुरसि सर्वार्युद्धर्ता।
पतितोद्धार्युत्थाप्यः स्नेहमसत्कर्ता॥६॥
श्रौतिं स्मृतिमुज्जीवय सञ्जीवय धर्मम्।
विद्यावृद्धिं विरचय शमयाप्युपधर्मम्॥७॥
विषयविकारं शमयांहः संहर विष्णो।
श्रद्धाभक्ती सेवां दृढय सतां विष्णो॥८॥
ॐ जय जगदीश हरे।
॥ इति संपूर्णंम् ॥
मम रतिरस्तु परे॥
यस्त्वां ध्यायति धन्यः सन्ततमनुरागी।
स भवति जनिमृतिरहितः श्रेयः फलभागी॥१॥
त्वं जननी जनको मे त्वं विपदुद्धर्ता।
त्वं शरणः शरणप्रद सकलैनोहर्ता॥२॥
पूर्णस्त्वं परमात्मन् सर्वान्तर्यामी।
ब्रह्मपरमेश्वरभर्तः त्वं सर्वस्वामी॥३॥
त्वं पालयिता पातस्त्वं करुणासिन्धुः।
दुर्वृत्तेरपि जन्तोस्त्वमकारणबन्धुः॥४॥
सर्वागोचर एकः सकलासुगणेशः।
प्राप्यः केन कुमतिना मयि का परमेशः॥५॥
दीनोद्धारः प्रभुरसि सर्वार्युद्धर्ता।
पतितोद्धार्युत्थाप्यः स्नेहमसत्कर्ता॥६॥
श्रौतिं स्मृतिमुज्जीवय सञ्जीवय धर्मम्।
विद्यावृद्धिं विरचय शमयाप्युपधर्मम्॥७॥
विषयविकारं शमयांहः संहर विष्णो।
श्रद्धाभक्ती सेवां दृढय सतां विष्णो॥८॥
ॐ जय जगदीश हरे।
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Om Jai Jagadisha Hare Bhaktijanedyavibho Tvayi,
Mama Ratirastu Pare. ||
Yastvam Dhyayati Dhanyah Santatamanuragi,
Sa Bhavati Janimritirahitah Shreyah Phalabhagi. ||1||
Tvam Janani Janako Me Tvam Vipaduddarta,
Tvam Sharanah Sharanaprada Sakalainoharta. ||2||
Purnastvam Paramatman Sarvantaryami,
Brahmaparameshvarabhartah Tvam Sarvaswami. ||3||
Tvam Palayita Patastvam Karunasindhuh,
Durvritterapi Jantostvamakaranabandhuh. ||4||
Sarvagochara Ekah Sakalasuganeshah,
Prapyah Kena Kumatina Mayi Ka Parameshah. ||5||
Dinoddharah Prabhurasi Sarvaryuddarta,
Patitoddharyutthapyah Snehamasatkarta. ||6||
Shrautim Smritimujjivaya Sanjivaya Dharmam,
Vidyavriddhim Virachaya Shamayapyupadharmam. ||7||
Vishayavikaram Shamayan'hah Sanhara Vishno,
Shraddhabhakti Sevam Dridhaya Satam Vishno. ||8||
Om Jai Jagadisha Hare.
॥ Iti Sampurnam ॥
Mama Ratirastu Pare. ||
Yastvam Dhyayati Dhanyah Santatamanuragi,
Sa Bhavati Janimritirahitah Shreyah Phalabhagi. ||1||
Tvam Janani Janako Me Tvam Vipaduddarta,
Tvam Sharanah Sharanaprada Sakalainoharta. ||2||
Purnastvam Paramatman Sarvantaryami,
Brahmaparameshvarabhartah Tvam Sarvaswami. ||3||
Tvam Palayita Patastvam Karunasindhuh,
Durvritterapi Jantostvamakaranabandhuh. ||4||
Sarvagochara Ekah Sakalasuganeshah,
Prapyah Kena Kumatina Mayi Ka Parameshah. ||5||
Dinoddharah Prabhurasi Sarvaryuddarta,
Patitoddharyutthapyah Snehamasatkarta. ||6||
Shrautim Smritimujjivaya Sanjivaya Dharmam,
Vidyavriddhim Virachaya Shamayapyupadharmam. ||7||
Vishayavikaram Shamayan'hah Sanhara Vishno,
Shraddhabhakti Sevam Dridhaya Satam Vishno. ||8||
Om Jai Jagadisha Hare.
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"जय जगदीश हरे आरार्तिक्यम्" विश्व-प्रसिद्ध आरती "ॐ जय जगदीश हरे" का एक सुंदर और भावपूर्ण संस्कृत रूपांतरण है। मूल आरती, जिसकी रचना पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने की थी, हिंदू घरों और मंदिरों में सबसे अधिक गाई जाने वाली प्रार्थनाओं में से एक है। इसका संस्कृत संस्करण, 'आरार्तिक्यम्', उसी भक्ति और समर्पण की भावना को देवभाषा संस्कृत की शास्त्रीय पवित्रता और ध्वनि-माधुर्य के साथ प्रस्तुत करता है। यह संस्करण उन साधकों के लिए विशेष महत्व रखता है जो पारंपरिक वैदिक रीति-रिवाजों का पालन करना पसंद करते हैं और संस्कृत के தெய்வீக அதிர்வுகள் (divine vibrations) का अनुभव करना चाहते हैं।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह संस्कृत आरती भगवान विष्णु के सर्वव्यापी और करुणामय स्वरूप की स्तुति करती है:
- Liberation from Cycle of Rebirth: "यस्त्वां ध्यायति... स भवति जनिमृतिरहितः" - जो भी भक्त प्रेमपूर्वक आपका ध्यान करता है, वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है और परम कल्याण (ultimate welfare) को प्राप्त करता है।
- The Ultimate Protector: "त्वं जननी जनको मे त्वं विपदुद्धर्ता" - आप ही मेरे माता और पिता हैं, और आप ही सभी विपत्तियों से उबारने वाले हैं। यह भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और अटूट विश्वास को दर्शाता है।
- Ocean of Compassion: "त्वं करुणासिन्धुः... त्वमकारणबन्धुः" - आप करुणा के सागर हैं और बिना किसी कारण के (अकारण) दुष्ट से दुष्ट प्राणी के भी बंधु हैं। यह भगवान की अपार कृपा और क्षमा (forgiveness) के गुण को दर्शाता है।
- Prayer for Purity: "विषयविकारं शमयांहः संहर विष्णो" - भक्त प्रार्थना करता है कि हे विष्णु! मेरे मन से विषय-विकारों को शांत करें और मेरे पापों का संहार करें, जो आध्यात्मिक शुद्धि (spiritual purification) के लिए एक विनम्र निवेदन है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती किसी भी दिन की जा सकती है, लेकिन गुरुवार (Thursday) भगवान विष्णु का विशेष दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन इसका पाठ करना अत्यंत शुभ होता है।
- एकादशी तिथि (Ekadashi Tithi) पर इस आरती का गायन करना बहुत पुण्यदायी माना जाता है।
- भगवान विष्णु या उनके किसी भी अवतार (जैसे राम, कृष्ण, सत्यनारायण) की मूर्ति के समक्ष घी का दीपक जलाएं। उन्हें तुलसी दल, पीले फूल और पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं।
- संस्कृत में होने के कारण, इस आरती का गायन एक शांत और ध्यानपूर्ण वातावरण बनाता है, जो मन को एकाग्र करने और गहरी शांति (deep peace) का अनुभव करने में मदद करता है।
