पंचप्राणांचें नीरांजन करुनी।
पंचतत्त्वें वाती परिपूर्ण भरुनी॥
मोहममतेनें समूळ भिजवोनी।
अपरोक्ष प्रकाश दीप पाजळोनी॥१॥
जय देव जय देव जय नीरांजना।
नीरांजन ओवाळू तुझिया समचरणा॥
ज्वाला ना काजळी दिवस न राती।
सदोदित प्रकाश भक्तीनें प्राप्ती॥
पूर्णानंदें धालों बोलों मी किती।
उजळों हे शिवराम भावें ओंवाळीती॥२॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
पंचतत्त्वें वाती परिपूर्ण भरुनी॥
मोहममतेनें समूळ भिजवोनी।
अपरोक्ष प्रकाश दीप पाजळोनी॥१॥
जय देव जय देव जय नीरांजना।
नीरांजन ओवाळू तुझिया समचरणा॥
ज्वाला ना काजळी दिवस न राती।
सदोदित प्रकाश भक्तीनें प्राप्ती॥
पूर्णानंदें धालों बोलों मी किती।
उजळों हे शिवराम भावें ओंवाळीती॥२॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Panchaprananchen niranjan karuni,
Panchatattven vaati paripurna bharuni. ||
Mohamamatenen samul bhijavoni,
Aparoksha prakash deep paajaloni. ||1||
Jai Dev Jai Dev Jai Niranjana,
Niranjan ovalun tujhiya samacharana. ||
Jwala na kajali divas na raati,
Sadodit prakash bhaktinen prapti. ||
Purnananden dhalon bolon mi kiti,
Ujalon he shivram bhaven onvaliti. ||2||
॥ Iti Sampurnam ॥
Panchatattven vaati paripurna bharuni. ||
Mohamamatenen samul bhijavoni,
Aparoksha prakash deep paajaloni. ||1||
Jai Dev Jai Dev Jai Niranjana,
Niranjan ovalun tujhiya samacharana. ||
Jwala na kajali divas na raati,
Sadodit prakash bhaktinen prapti. ||
Purnananden dhalon bolon mi kiti,
Ujalon he shivram bhaven onvaliti. ||2||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"पंचप्राणांचें नीरांजन" एक अत्यंत गहन और दार्शनिक मराठी आरती है। सामान्य आरतियों के विपरीत, जो किसी देवता के सगुण रूप की स्तुति करती हैं, यह 'नीरांजन' (अर्थात निर्मल, निष्कलंक) आरती निर्गुण, निराकार परमात्मा की आंतरिक पूजा का एक रूपक है। यह अद्वैत वेदांत के सिद्धांत पर आधारित है, जहाँ साधक बाहरी पूजा सामग्री के बजाय अपने ही शरीर और चेतना के तत्वों को भगवान को अर्पित करता है। यह आरती पूजा को एक बाहरी क्रिया से एक आंतरिक आध्यात्मिक अभ्यास (internal spiritual practice) में बदल देती है, जिसका लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार है। इसे अक्सर सभी पूजाओं के अंत में गाया जाता है, जो सगुण भक्ति से निर्गुण ध्यान की ओर यात्रा का प्रतीक है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती आंतरिक पूजा की प्रक्रिया का प्रतीकात्मक वर्णन करती है:
- पंचप्राणों का दीपक (The Lamp of Five Pranas): "पंचप्राणांचें नीरांजन करुनी" - यहाँ आरती का दीपक कोई भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि शरीर को चलाने वाली पांच मुख्य जीवन-ऊर्जाएं (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान) हैं। साधक इन प्राणों को ही दीपक बनाकर परमात्मा को अर्पित करता है।
- पंचतत्वों की बाती (The Wick of the Five Elements): "पंचतत्त्वें वाती परिपूर्ण भरुनी" - इस दीपक की बातियाँ शरीर का निर्माण करने वाले पांच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बनी हैं। यह दर्शाता है कि साधक अपने संपूर्ण भौतिक अस्तित्व को पूजा में समर्पित कर रहा है।
- मोह-ममता का घी (The Ghee of Attachment): "मोहममतेनें समूळ भिजवोनी" - बाती को जलाने के लिए घी या तेल के रूप में सांसारिक मोह और ममता का उपयोग किया जाता है। इसका गहरा अर्थ है कि आध्यात्मिक प्रकाश को प्रकट करने के लिए अपने लगाव और अहंकार को जलाना (burn away one's ego) आवश्यक है।
- आत्म-ज्ञान का शाश्वत प्रकाश (The Eternal Light of Self-Realization): "ज्वाला ना काजळी दिवस न राती। सदोदित प्रकाश भक्तीनें प्राप्ती॥" - इस आंतरिक आरती से जो प्रकाश उत्पन्न होता है, उसमें न तो ज्वाला है और न ही कालिख। यह एक ऐसा शाश्वत प्रकाश है जो दिन और रात से परे है। यह 'अपरोक्ष प्रकाश' या आत्म-ज्ञान का प्रकाश है, जो केवल सच्ची भक्ति से ही प्राप्त होता है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती किसी विशेष दिन या समय से बंधी नहीं है। इसे प्रतिदिन की पूजा या ध्यान सत्र के अंत में गाया जा सकता है, ताकि मन को बाहरी दुनिया से हटाकर भीतर की ओर केंद्रित किया जा सके।
- इसका पाठ करने के लिए किसी विशेष सामग्री की आवश्यकता नहीं है। इसे शांत चित्त से, बैठकर, और प्रत्येक पंक्ति के गहरे अर्थ पर ध्यान केंद्रित करते हुए गाया जाना चाहिए।
- यह आरती विशेष रूप से उन साधकों के लिए लाभकारी है जो ज्ञान मार्ग या ध्यान (meditation and self-enquiry) में रुचि रखते हैं।
- इसका नियमित पाठ वैराग्य की भावना को बढ़ावा देता है और मन को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठाकर शाश्वत आनंद (eternal bliss) का अनुभव करने में मदद करता है।
