जीवशिव ओवाळीन निजीं निजात्मज्योती॥
त्रिगुण काकडा द्वैतघृतं तिंबिला।
उजळीतों आत्मज्योती तेणें प्रकाशला॥१॥
काजळी तामस अवधें तेज डळमळ।
अवनी आवर अवघा निग निज निश्चळ॥२॥
उदय ना अस्त जेथें बोध प्रातःकाळीं।
रामी रामदास सहजीं सहज ओंवाळी॥३॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Jivashiv ovalin nijin nijatmakajyoti. ||
Trigun kakada dvaitaghritan timbila,
Ujaliton atmajyoti tenen prakashala. ||1||
Kajali tamas avadhen tej dalamal,
Avani aavar avagha nig nij nishchal. ||2||
Uday na asta jethen bodh pratahkali,
Rami Ramdas sahajin sahaj onvali. ||3||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
समर्थ रामदास स्वामी द्वारा रचित यह काकड आरती भगवान श्री राम को समर्पित एक गहन दार्शनिक रचना है। सामान्य काकड आरतियों के विपरीत, जो देवता को भौतिक रूप से जगाने पर केंद्रित होती हैं, यह आरती अद्वैत वेदांत के उच्चतम सिद्धांत का आह्वान करती है। यहाँ 'श्री रघुपति' केवल दशरथ के पुत्र नहीं, बल्कि 'परमात्मा' हैं - वह सर्वोच्च आत्मा जो प्रत्येक जीव में निवास करती है। इस आरती का मुख्य उद्देश्य बाहरी मूर्ति को जगाना नहीं, बल्कि साधक के भीतर सोए हुए आत्म-राम (the Self as Rama) को जगाना है। यह आरती 'जीव' (व्यक्तिगत आत्मा) और 'शिव' (सार्वभौमिक चेतना) के मिलन का एक सुंदर रूपक है, जो इसे केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक ध्यानपूर्ण अभ्यास (meditative practice) बनाती है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती अद्वैत दर्शन के जटिल विचारों को सरल मराठी भाषा में प्रस्तुत करती है:
- त्रिगुणात्मक काकड (The Wick of Three Gunas): "त्रिगुण काकडा द्वैतघृतं तिंबिला" - समर्थ रामदास कहते हैं कि यह काकड (बाती) तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से बनी है और इसे द्वैत (duality) के घी में डुबोया गया है। यह मानव शरीर और मन की स्थिति का प्रतीक है, जो गुणों से बंधा है और दुनिया को 'मैं' और 'अन्य' के द्वैत भाव से देखता है।
- आत्म-ज्योति का प्रकाश (The Illumination of the Self's Light): "उजळीतों आत्मज्योती तेणें प्रकाशला" - जब इस त्रिगुणात्मक बाती को जलाया जाता है, तो उससे 'आत्म-ज्योति' (प्रकाश of the Self) प्रकट होती है। इसका अर्थ है कि जब एक साधक आध्यात्मिक अभ्यास के माध्यम से अपने गुणों और द्वैत भाव से ऊपर उठता है, तो उसे अपने भीतर के सच्चे आत्म-स्वरूप का ज्ञान होता है।
- अज्ञान के अंधकार का नाश (Dispelling the Darkness of Ignorance): "काजळी तामस अवधें तेज डळमळ" - इस आत्म-ज्ञान के प्रकाश से, तामसिकता (अज्ञान, जड़ता) रूपी कालिख पूरी तरह से मिट जाती है और अस्थिर तेज (सांसारिक चमक) शांत हो जाता है। यह state of pure clarity को दर्शाता है।
- शाश्वत बोध का उदय (The Dawn of Eternal Knowledge): "उदय ना अस्त जेथें बोध प्रातःकाळीं" - यह उस परम ज्ञान की सुबह का वर्णन है, जहाँ कोई उदय या अस्त नहीं होता। यह चेतना की उस अवस्था का प्रतीक है जो समय और परिवर्तन से परे है, जहाँ आत्मा को अपनी शाश्वत, non-dual nature का बोध होता है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह एक ध्यानपूर्ण प्रभात आरती है, जिसे ब्राह्ममुहूर्त (Brahma Muhurta) में शांत और एकांत वातावरण में किया जाना चाहिए।
- यह आरती विशेष रूप से राम नवमी (Ram Navami) और हनुमान जयंती जैसे त्योहारों की सुबह के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
- इसे करने के लिए, भगवान राम की मूर्ति के सामने एक दीपक जलाएं और आरती के शब्दों के गहरे अर्थ पर ध्यान केंद्रित करें। यह एक बाहरी अनुष्ठान से अधिक एक आंतरिक अभ्यास (internal practice) है।
- इस आरती का नियमित पाठ साधक को आत्म-निरीक्षण (self-introspection) के लिए प्रेरित करता है और मन को शांत कर आध्यात्मिक स्पष्टता और inner peace प्रदान करने में मदद करता है।
