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जय दुर्गे! शिवदे! (नीराजनम्)

Durga Nirajanam (Sanskrit)

जय दुर्गे! शिवदे! (नीराजनम्)
ॐ जय दुर्गे! शिवदे!, जय जय दुर्गे शिवदे!
दुर्गति-हारिणि! मातः!, तव चरणे प्रणिपातः,
हे शुभदे! वरदे!, (तव) पद-पद्मं वन्दे॥
ॐ जय दुर्गे! शिवदे!, जय जय दुर्गे शिवदे!॥

केशरि-वाहिनि! गौरि, त्वं गिरिराज-सुता।
आद्या शक्तिः सुभगा, सुर-नरवृन्द-नुता॥१॥

दुष्ट-विदारण-रुद्रा, त्वं त्रिभुवन-धात्री।
महिष-विमर्दिनि! देवि, जगतां परिपात्री॥२॥

मङ्गलमयि! मातस्त्वं, गङ्गाधर-कान्ता।
दिव्याभरणै-र्भव्या, प्रेममयी शान्ता॥३॥

दुरितं हर जननी मे, कुरु सुदयां प्रति माम्।
हैमवतीं नौमि त्वां, स्नेहमयीं प्रतिमाम्॥४॥

स्वस्तिमयं तव हस्ते, शूलं विकरालम्।
शङ्करि! सकलातङ्कं, हर सङ्कटजालम्॥५॥

तव शुभ-दिव्यं ज्योतिः, उज्ज्वलयतु भुवनम्।
सुन्दरयतु परिवेशं, सुखयतु विश्वजनम्॥६॥

तव करुणामृत-धारा, शमयतु गुरु-तापम्।
शीतलयतु संसारं, हृत्वा कलि-पापम्॥७॥

भवभय-नाशिनि! भीमां, परमानन्द-भराम्।
त्वां भगवतीं नतोऽहं, सौम्यां भक्तिपराम्॥८॥

मार्जय सकलं दोषं, कुरु मां कृतकृत्यम्।
मातस्तवार्चनेयं, शं वितरतु नित्यम्॥९॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"जय दुर्गे! शिवदे!" माँ दुर्गा को समर्पित एक सुंदर संस्कृत 'नीराजनम्' है। 'नीराजनम्' आरती का ही एक शुद्ध और पारंपरिक रूप है, जिसमें दीपक जलाकर देवता के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। इस आरती की विशेषता इसकी मधुर संस्कृत भाषा और गहरे आध्यात्मिक भाव हैं। 'शिवदे' का अर्थ है "कल्याण करने वाली" या "मंगल प्रदान करने वाली," जो माँ दुर्गा के सौम्य और करुणामय स्वरूप को उजागर करता है। यह स्तुति केवल देवी के शक्तिशाली रूप का ही नहीं, बल्कि उनके मातृवत, सुरक्षात्मक और वरदायिनी (protective and boon-giving) पहलू का भी आह्वान करती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह संस्कृत स्तुति माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों और गुणों का वर्णन करती है:

  • Remover of Misfortunes: "दुर्गति-हारिणि! मातः!" - इस पंक्ति में भक्त माँ को 'दुर्गति' अर्थात सभी प्रकार के कष्टों, संकटों और दुखों को हरने वाली के रूप में पुकारता है। यह उनके भक्तों के लिए एक सुरक्षा कवच (protection shield) का काम करता है।
  • Lion Rider and Daughter of the Mountain: "केशरि-वाहिनि! गौरि, त्वं गिरिराज-सुता" - यहाँ उनके सिंह-वाहिनी रूप और पर्वतराज हिमालय की पुत्री 'गौरी' या 'पार्वती' होने का उल्लेख है। सिंह पर सवारी करना धर्म, इच्छा और शक्ति पर पूर्ण नियंत्रण का प्रतीक है।
  • Slayer of Evil: "दुष्ट-विदारण-रुद्रा... महिष-विमर्दिनि!" - यह पंक्तियाँ उनके महिषासुरमर्दिनी के शक्तिशाली रूप का स्मरण कराती हैं, जिसमें वे दुष्टों का संहार करती हैं और ब्रह्मांड में धर्म और संतुलन (balance in the universe) को पुनर्स्थापित करती हैं।
  • Source of Compassion: "तव करुणामृत-धारा, शमयतु गुरु-तापम्" - भक्त प्रार्थना करता है कि आपकी करुणा की अमृत धारा संसार के सभी गंभीर कष्टों और पापों को शांत करे और शीतलता प्रदान करे, जो उनके करुणामय स्वभाव को दर्शाता है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह नीराजनम् विशेष रूप से नवरात्रि (Navratri) और दुर्गा पूजा (Durga Puja) के दौरान प्रतिदिन संध्या आरती में गाने के लिए श्रेष्ठ है।
  • शुक्रवार (Friday) का दिन देवी की पूजा के लिए विशेष माना जाता है, इस दिन इसका पाठ करना अत्यधिक फलदायी होता है।
  • माँ दुर्गा की प्रतिमा के सामने घी या कपूर का दीपक प्रज्वलित करें। लाल पुष्प, विशेषकर गुड़हल, अर्पित करना शुभ माना जाता है।
  • संस्कृत के श्लोकों का स्पष्ट और भक्तिपूर्ण उच्चारण करने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा (positive energy) का संचार होता है और मानसिक शांति (mental peace) प्राप्त होती है।
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