जय देव जय देव पंढरीराया।
धूप अर्पीतसें मी भावें तव पायां॥
सोज्ज्वळ अग्निरूप निजतेजोराशी।
अहंभाव धूप कृपें जाळीसी॥
त्याचा आनंद माझे मानसीं।
तव दर्शनमोदें सुख हैं सर्वांसी॥१॥
पूर्णानंद देवा तूं सच्चिदानंदा।
परमात्मा तूं अससी आनंदकंदा॥
पूर्ण करीं तूंची भक्तांच्या छंदा।
अंगीकारुन धूप दे ब्रह्मानंदा॥२॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
धूप अर्पीतसें मी भावें तव पायां॥
सोज्ज्वळ अग्निरूप निजतेजोराशी।
अहंभाव धूप कृपें जाळीसी॥
त्याचा आनंद माझे मानसीं।
तव दर्शनमोदें सुख हैं सर्वांसी॥१॥
पूर्णानंद देवा तूं सच्चिदानंदा।
परमात्मा तूं अससी आनंदकंदा॥
पूर्ण करीं तूंची भक्तांच्या छंदा।
अंगीकारुन धूप दे ब्रह्मानंदा॥२॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Jai Dev Jai Dev Pandhariraya,
Dhup arpitasen mi bhaven tav payan. ||
Sojjval agnirup nijatejorashi,
Ahambhav dhup kripen jalisi. ||
Tyacha anand majhe manasin,
Tav darshanmoden sukh hain sarvansin. ||1||
Purnanand Deva tun Satchidananda,
Paramatma tun asasi anandakanda. ||
Purna karin tunchi bhaktanchya chhanda,
Angikarun dhup de brahmananda. ||2||
॥ Iti Sampurnam ॥
Dhup arpitasen mi bhaven tav payan. ||
Sojjval agnirup nijatejorashi,
Ahambhav dhup kripen jalisi. ||
Tyacha anand majhe manasin,
Tav darshanmoden sukh hain sarvansin. ||1||
Purnanand Deva tun Satchidananda,
Paramatma tun asasi anandakanda. ||
Purna karin tunchi bhaktanchya chhanda,
Angikarun dhup de brahmananda. ||2||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"जय देव जय देव पंढरीराया" यह एक 'धूपारती' (Dhuparati) है, जो भगवान विट्ठल, जिन्हें प्रेम से 'पंढरीराया' (Pandhariraya) अर्थात 'पंढरपुर के राजा' कहा जाता है, को समर्पित है। 'धूपारती' का अर्थ है 'धूप से की जाने वाली आरती'। यह आरती विशेष रूप से सायंकाल में, भगवान के समक्ष धूप (incense) जलाते समय गाई जाती है। इस आरती का आध्यात्मिक भाव बहुत गहरा है, जिसमें भक्त जलते हुए धूप को अपने 'अहंभाव' (ego) का प्रतीक मानता है और भगवान से प्रार्थना करता है कि वे कृपा करके इस अहंकार को जला दें।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती भक्त के समर्पण और दार्शनिक भावों को दर्शाती है:
- अहंकार का दहन (Burning of the Ego): "अहंभाव धूप कृपें जाळीसी॥" यह इस आरती का केंद्रीय भाव है। भक्त प्रार्थना करता है कि हे प्रभु, जिस प्रकार यह धूप जल रही है, उसी प्रकार आप कृपा करके मेरे अहंकार (Ahambhav) को जला दें।
- परब्रह्म स्वरूप (Form of the Supreme Being): "पूर्णानंद देवा तूं सच्चिदानंदा। परमात्मा तूं अससी आनंदकंदा॥" यहाँ भक्त भगवान विट्ठल को पूर्ण आनंद स्वरूप, सच्चिदानंद, और परमात्मा के रूप में देखता है, जो सभी आनंद का मूल स्रोत हैं।
- दर्शन का सुख (The Joy of Divine Sight): "त्याचा आनंद माझे मानसीं। तव दर्शनमोदें सुख हैं सर्वांसी॥" जब अहंकार जल जाता है, तब मन में आनंद का उदय होता है, और आपके दर्शन का सुख सभी को प्राप्त होता है।
- भक्त की इच्छा पूर्ति (Fulfillment of Devotee's Wishes): "पूर्ण करीं तूंची भक्तांच्या छंदा।" भक्त यह विश्वास रखता है कि भगवान ही अपने भक्तों की सभी इच्छाओं (wishes) को पूर्ण करते हैं।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती प्रतिदिन सायंकाल की पूजा (evening prayer) के समय, धूप जलाते हुए की जाती है। यह पंढरपुर के विट्ठल मंदिर की दैनिक पूजा-विधि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- एकादशी (Ekadashi), विशेषकर आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी के दिन, इसका गायन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
- भगवान विट्ठल (पांडुरंग) की प्रतिमा के समक्ष धूप (incense sticks or sambrani) प्रज्वलित करें और उसकी सुगंध को चारों ओर फैलाएं।
- इस आरती को गाते समय, मन में यह भाव रखें कि आप धूप के साथ-साथ अपने अहंकार और सभी नकारात्मक विचारों को भी भगवान के चरणों में अर्पित कर रहे हैं।
