जय देव जय देव जय पांडुरंगा।
दीपारति ओवाळू तुजला जिवलगा॥
स्वयंप्रकाशा तूझी सर्वही दीप्ति।
पूर्णानंद प्राप्त करितां तव भक्ति॥
देहत्रय वाती पाजळोनी प्रीती।
ओवाळितों प्रेमें देवा तुजप्रती॥१॥
देव तुज पाहता येतो प्रेमपूर।
नाम निरंतर गातां होतो भवपार॥
वाटे तव भक्ती ही प्रियकर।
विष्णुदासा देई अखंड हा वर॥२॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
दीपारति ओवाळू तुजला जिवलगा॥
स्वयंप्रकाशा तूझी सर्वही दीप्ति।
पूर्णानंद प्राप्त करितां तव भक्ति॥
देहत्रय वाती पाजळोनी प्रीती।
ओवाळितों प्रेमें देवा तुजप्रती॥१॥
देव तुज पाहता येतो प्रेमपूर।
नाम निरंतर गातां होतो भवपार॥
वाटे तव भक्ती ही प्रियकर।
विष्णुदासा देई अखंड हा वर॥२॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Jai Dev Jai Dev Jai Panduranga,
Deeparati ovalun tujala jivalaga. ||
Swayamprakasha tujhi sarvahi dipti,
Purnanand prapt karitan tav bhakti. ||
Dehatraya vaati paajaloni priti,
Ovaliton premen deva tujaprati. ||1||
Dev tuj pahata yeto prempur,
Naam nirantar gaatan hoto bhavapaar. ||
Vaate tav bhakti hi priyakar,
Vishnudasa dei akhand ha var. ||2||
॥ Iti Sampurnam ॥
Deeparati ovalun tujala jivalaga. ||
Swayamprakasha tujhi sarvahi dipti,
Purnanand prapt karitan tav bhakti. ||
Dehatraya vaati paajaloni priti,
Ovaliton premen deva tujaprati. ||1||
Dev tuj pahata yeto prempur,
Naam nirantar gaatan hoto bhavapaar. ||
Vaate tav bhakti hi priyakar,
Vishnudasa dei akhand ha var. ||2||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"जय देव जय देव जय पांडुरंगा" यह एक 'दीपारती' (Deeparati) है, जो भगवान विट्ठल, जिन्हें प्रेम से पांडुरंग (Panduranga) कहा जाता है, को समर्पित है। 'दीपारती' का अर्थ है 'दीपों से की जाने वाली आरती'। यह आरती विशेष रूप से सायंकाल में, भगवान के समक्ष दीपक प्रज्वलित करते समय गाई जाती है। यह आरती छोटी होते हुए भी गहरे आध्यात्मिक अर्थों से भरी है। इसमें भक्त अपने प्रिय 'जिवलगा' (प्रियतम) पांडुरंग को प्रेमपूर्वक दीपों से ओवाळणी (आरती उतारना) कर रहा है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती भक्त के गहरे दार्शनिक और प्रेमपूर्ण भावों को दर्शाती है:
- परमात्मा का प्रकाश स्वरूप (The Luminous Form of the Supreme): "स्वयंप्रकाशा तूझी सर्वही दीप्ति।" इसका अर्थ है कि हे प्रभु, आप स्वयं प्रकाशमान हैं और यह सारा प्रकाश (light) आपका ही है। यह मानता है कि ईश्वर ही परम ज्योति है।
- देह का समर्पण (Surrender of the Body): "देहत्रय वाती पाजळोनी प्रीती। ओवाळितों प्रेमें देवा तुजप्रती॥" यह पंक्ति अत्यंत गहन है। भक्त कहता है कि मैं अपने तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म और कारण) को बाती बनाकर, उसमें प्रेम का तेल डालकर आपकी आरती उतार रहा हूँ। यह पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।
- नाम-स्मरण का फल (Fruit of Chanting the Name): "नाम निरंतर गातां होतो भवपार॥" आपके नाम का निरंतर गान करने से मैं इस भवसागर से पार हो जाता हूँ। यह 'नाम-स्मरण' की महिमा को दर्शाता है।
- अखंड भक्ति का वरदान (Boon of Unbroken Devotion): "विष्णुदासा देई अखंड हा वर॥" अंत में, भक्त भगवान से केवल एक ही वरदान मांगता है - आपकी भक्ति का यह सुख मुझे अखंड रूप से प्राप्त होता रहे।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती प्रतिदिन सायंकाल की पूजा (evening prayer) के समय गाई जाती है, जब घर के मंदिर में दीपक जलाया जाता है।
- एकादशी (Ekadashi), विशेषकर आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी के दिन, इसका गायन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
- भगवान विट्ठल (पांडुरंग) की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाएं। आरती की थाली में पुष्प और प्रसाद रखें।
- इस आरती को शांत और प्रेमपूर्ण भाव से गाएं, यह महसूस करते हुए कि आप अपने शरीर, मन और आत्मा को भगवान के चरणों में अर्पित कर रहे हैं।
