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भागवताची आरती

Bhagavatachi Aarti (Marathi)

भागवताची आरती
जयदेव जयदेव श्रीमद्भागवता।
श्रवणें मननें पठणें भक्ती ये हाता॥

वेदाचें हें सार पाहे रसभरित।
दशलक्षण हें आहे लक्षीत॥१॥

द्वादश स्कंधामध्यें हरीची लीळा।
तिनशें पस्तिस अध्ये गाती गोपाळा॥२॥

अठरा सहस्र श्लोक गाती ऐकती।
ज्यासी हरीभक्ती त्यासी तत्प्राप्ती॥३॥

गायत्रीचें मंत्ररूप हें पाहें।
परीक्षिति-शुकसंवाद आहे॥४॥

भागवतरूपी देवा तूंचि अहेसी।
करूं ही आरति एका-जनार्दनासी॥५॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"भागवताची आरती" एक अनूठी मराठी आरती है जो किसी देवता को नहीं, बल्कि वैष्णव संप्रदाय के परम पूजनीय ग्रंथ, श्रीमद्भागवत पुराण (Srimad Bhagavatam Purana) को समर्पित है। इस आरती की रचना महान संत श्री एकनाथ महाराज (Sant Eknath Maharaj) ने की थी। यह आरती ग्रंथ को एक जीवित, दिव्य स्वरूप मानकर उसकी वंदना करती है। इसमें श्रीमद्भागवत के सार, उसकी संरचना और उसके पठन-श्रवण के महत्व को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यह आरती भागवत कथा या सप्ताह के समापन पर गाने की एक महत्वपूर्ण परंपरा है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती श्रीमद्भागवत पुराण के माहात्म्य को दर्शाती है:

  • वेदों का सार (Essence of the Vedas): "वेदाचें हें सार पाहे रसभरित।" यह पंक्ति बताती है कि श्रीमद्भागवत सभी वेदों का रसपूर्ण सार है, जिसमें भगवान की लीलाओं का मधुर वर्णन है।
  • ग्रंथ की संरचना (Structure of the Scripture): "द्वादश स्कंधामध्यें हरीची लीळा। तिनशें पस्तिस अध्ये गाती गोपाळा॥" इसमें बताया गया है कि यह ग्रंथ 12 स्कंधों (cantos) और 335 अध्यायों में भगवान हरि की लीलाओं का गान करता है।
  • भक्ति का मार्ग (The Path of Devotion): "श्रवणें मननें पठणें भक्ती ये हाता॥" इस आरती का मुख्य संदेश यह है कि श्रीमद्भागवत के श्रवण, मनन और पठन से ही सच्ची भक्ति (devotion) प्राप्त होती है।
  • फल की प्राप्ति (Attainment of the Fruit): "ज्यासी हरीभक्ती त्यासी तत्प्राप्ती॥" जिसके मन में हरि-भक्ति है, उसे निश्चित रूप से हरि (भगवान) की प्राप्ति होती है। यह इस ग्रंथ का परम फल है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह (Bhagwat Katha Saptah) के समापन पर या दैनिक भागवत पाठ के बाद की जाती है।
  • इसे एकादशी (Ekadashi), गुरुवार (Thursday) और जन्माष्टमी (Janmashtami) जैसे वैष्णव पर्वों पर भी गाया जा सकता है।
  • श्रीमद्भागवत पुराण ग्रंथ को एक ऊँचे आसन पर स्थापित कर, उसे पुष्प-माला अर्पित करें। ग्रंथ के समक्ष घी का दीपक और धूप जलाएं।
  • पूर्ण श्रद्धा और सम्मान के साथ इस आरती को गाएं, मानो आप स्वयं भगवान के वाङ्मय स्वरूप की आरती उतार रहे हों।
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