Logoपवित्र ग्रंथ

श्री हरतालिका तीज व्रत कथा

अखंड सौभाग्य का पावन व्रत

श्री हरतालिका तीज व्रत की महिमा

हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद (भादों) महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। तृतीया तिथि होने के कारण इस व्रत को ‘तीज का व्रत’ कहा जाता है। भारतवर्ष में भाद्रपद मास के दौरान अच्छी वर्षा होती है, जिससे पेड़-पौधे हरे-भरे हो जाते हैं और चारों ओर हरियाली छा जाती है। इसी कारण कई स्थानों पर इस व्रत को ‘हरियाली तीज का व्रत’ भी कहा जाता है।

हरतालिका तीज का व्रत निर्जला या निराहार रहकर किया जाता है। इस दिन स्त्रियाँ बिना जल और अन्न ग्रहण किए व्रत का पालन करती हैं तथा पूर्ण श्रद्धा और नियम-संयम के साथ माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं।

यह व्रत सभी आयु की स्त्रियों के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। इस व्रत को करने से अविवाहित कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति होती है तथा विवाहित स्त्रियों के सौभाग्य की रक्षा होती है और वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है। इस दिन महिलाएँ पारंपरिक रूप से अपने घर या उद्यान (बगीचे) में झूला झूलती हैं और धार्मिक उल्लास के साथ इस पर्व को मनाती हैं।

श्री हरतालिका व्रत की पूजन सामग्री

पूजा सामग्री

  • लकड़ी का पाटा और लाल रंग का कपड़ा
  • साफ़ मिट्टी (मूर्ति के लिए)
  • भगवान शिव-पार्वती की मूर्तियाँ
  • दीपक, रूई, घी, धूप, कपूर
  • रोली, अक्षत (चावल)
  • गंगाजल या शुद्ध जल
  • फूलों की माला, मौसम के फल
  • पंचामृत (दूध, दही, शक्कर, शहद, घी)
  • मिठाई, पान, सुपारी
  • सुहाग-सामग्री: कंघा, शीशा, सिंदूर, बिंदी, चूड़ा, मेंहदी/महावर, बिछिया आदि

श्री हरतालिका व्रत करने की विधि

"ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः"

  1. प्रातःकाल: इस व्रत को करने वाली स्त्रियों को व्रत वाले दिन सूर्योदय के साथ ही जाग जाना चाहिए और नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नान कर लेना चाहिए। फिर साफ वस्त्र पहन लें और घर के पूजा स्थान को स्वच्छ कर आटे से चौक पूर लें।

  2. मूर्ति स्थापना: मिट्टी से श्री शंकर-पार्वती जी की प्रतिमा बना लें। लकड़ी के पाटे पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर प्रतिमा स्थापित करें। पंचामृत और जल पात्र रख लें।

  3. आवाहन: पूजा प्रारंभ करें। 'श्री गणेशाय नमः' कहकर गणेश जी का ध्यान करें। फिर शंकर-पार्वती को प्रणाम कर दीपक और धूप जलाएं।

  4. अर्पण: ‘ॐ नमः शिवाय’ कहते हुए चंदन, अक्षत, पुष्पमाला, फल, मिठाई, पंचामृत और पान-सुपारी समर्पित करें।

  5. कथा श्रवण: इसके बाद ‘श्री हरतालिका तीज की व्रत कथा’ पढ़ें। कथा के बाद जयकारा लगाएं।

  6. प्रार्थना:

"हे शिव... मैं इस नश्वर संसार के भय-संताप से मेरी और मेरे परिवार की रक्षा के लिए प्रार्थना करती हूँ।"

  1. विसर्जन: अंत में आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें। पंचामृत और प्रसाद वितरित करें। अगले दिन व्रत का पारण करें। मिट्टी की मूर्ति को जलाशय में विसर्जित करें।

महामृत्युंजय मंत्र

अखंड सौभाग्य और स्वास्थ्य रक्षा हेतु

❝ ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ ❞

श्री हरतालिका तीज व्रत कथा

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया

कथा

श्री परम पावन भूमि कैलाश पर्वत पर विशाल वट वृक्ष के नीचे भगवान शिव, पार्वती सभी गणों सहित वाघम्बर पर विराजमान थे। बलवान वीरभद्र, भृंगी, शृंगी, नन्दी आदि अपने-अपने पहरों पर सदाशिव के दरबार की शोभा बढ़ा रहे थे।

उसी शुभ अवसर पर महारानी पार्वती जी ने भगवान शिव से दोनों हाथ जोड़कर प्रश्न किया कि — "हे महेश्वर! मेरे बड़े सौभाग्य हैं जो मैंने आप सरीखे अर्धाङ्गिनी पति को वरण किया। क्या मैं जान सकती हूँ कि मैंने वह कौन-सा पुण्य अर्जन किया है, आप अन्तर्यामी हैं, मुझे दासी को वर्णन करने की कृपा करें।"

महारानी पार्वती की ऐसी प्रार्थना सुनने पर शिवजी बोले – "पार्वती! तुमने अति उत्तम पुण्य का संग्रह किया था। वह अति गुप्त व्रत है पर तुम्हारे आग्रह पर प्रकट करता हूँ। यह व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तीज व्रत के नाम से प्रसिद्ध है। यह व्रत आकाश में तारों जैसा, ग्रहों में सूर्य जैसा श्रेष्ठ है।"

ऐसा सुनकर माता पार्वती जी ने कहा – "हे महेश्वर! मैंने कब और कैसे तीज व्रत किया था?"

भगवान शंकर बोले – "हे उमा! उत्तर में हिमालय पर्वत पर तुम्हारा जन्म हुआ। तुमने बाल्यकाल से ही तपस्या की। ग्रीष्म में अग्नि के बीच, वर्षा में जल में और शीत में जल में खड़े होकर तपस्या की। फिर सूखे पत्ते खाकर और अंत में वायु पीकर तप किया।

तुम्हारे पिता पर्वतराज हिमालय तुम्हारी कठोर तपस्या देखकर चिंतित थे। तभी नारद मुनि आए और बोले – विष्णु जी आपकी कन्या से विवाह करना चाहते हैं। तुम्हारे पिता ने स्वीकार कर लिया। यह सुनकर तुम बहुत दुखी हुईं और अपनी सखी को बताया। सखी तुम्हें एक घने वन में गुफा में ले गई।

वहाँ तुमने भाद्रपद शुक्ल तृतीया को रेत से शिवलिंग बनाकर मेरी पूजा की। रात्र जागरण किया। मेरी प्रसन्नता से मेरा आसन डोल गया। मैंने तुम्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। तुमने मुझे पति रूप में मांगा। मैंने 'तथास्तु' कहा।

बाद में तुम्हारे पिता तुम्हें ढूंढते हुए आए। तुमने उन्हें बताया कि मैंने शिव को पति रूप में वरण किया है। यदि आप मेरा विवाह उनसे करने को तैयार हैं तो ही मैं घर चलूँगी। तुम्हारे पिता ने मान लिया और विधि-विधान से हमारा विवाह हुआ।

हे पार्वती! उस व्रत के प्रभाव से ही तुम मेरी अर्धाङ्गिनी बनी हो। जो स्त्री इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करती है, उसे मेरा ही सालोक्य प्राप्त होता है।

यह व्रत सब व्रतों में श्रेष्ठ है। इसे करने से स्त्रियाँ सौभाग्यवती होती हैं और अंत में शिवलोक को प्राप्त करती हैं।"

🌺 बोलिये माता पार्वती-शंकर भगवान की जय! 🌺

व्रत का माहात्म्य एवं नियम

श्री हरतालिका तीज का व्रत, विधि, फल व महात्म्य

यह व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की द्वितीया की शाम से आरम्भ करें। यह व्रत निराहार (बिना फलाहार) और निर्जला होकर रहना चाहिए। भगवान शिव-पार्वती की प्रतिमा सुवर्ण की स्थापित करके केले, पुष्प आदि के खम्भे स्थापित करके, रेशमी वस्त्र के चन्देवा तानकर, वन्दन वारे लगा भगवान शिव की मूर्ति, बालू का लिंग स्थापित करके पूजन वैदिक मंत्र स्तुति गान वाद्य, भेरी, घंटा, मृदंग, झाँझर आदि से रात्रि को जागरण करना चाहिए और भगवान शिव के पूजन के बाद फल, फूल, पकवान, लड्डू, मेवा, मिठान तरह-तरह के भोग की सामग्री समर्पण करें।

ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र, पान आदि श्रद्धायुक्त देना चाहिए। भगवान शिव के प्रति वस्तु को सिद्ध पंचाक्षरी मंत्र से (ॐ नमः शिवाय) कहकर समर्पित करना चाहिए। प्रार्थना करते समय अपनी कामना, इच्छा जो हो भगवान के सामने प्रेरित करके प्रणाम करें, फिर माता पार्वती जी से नीचे लिखी प्रार्थना करें।

प्रार्थना पद

जय जग माता, जय जग माता, मेरी भाग्य विधाता ॥ टेक ॥

तुम हो पार्वती, शिव प्यारी तुम दाता नंक पुरारी। सती सत में रख तुम्हारी जय हो आनन्द दाता ॥ जय जग… ॥

इच्छित वर मैं तुमसे पाऊँ, भूल चूक को दुख न उठाऊँ, भाव-भक्ति से तुमको पाऊँ, कर दो पूरण बाता ॥ जय जग… ॥

व्रत का उद्यापन तथा फल

प्रार्थना करने के बाद पुष्पों को दोनों हाथों में लेकर पुष्पांजलि समर्पण करें। फिर चतुर्थी को शिवलिंग किसी नदी व तालाब में विसर्जन करें, फिर तीन ब्राह्मणों को भोजन करा कर दक्षिणा दें। इस प्रकार यह व्रत पूर्ण करने से नारी सौभाग्यवती होती है व धन-धान्य व पुत्र-पौत्रों से सुखी होकर जीवन व्यतीत करती है। कन्याओं को व्रत करने से कुलीन विद्वान धनवान वर को प्राप्त होने का सौभाग्य होता है।

फलादेश: हे देवी! जो सौभाग्यवती नारी इस व्रत को नहीं धारण करती वह बार-बार वैधव्य पुत्र शोक को प्राप्त होती है। जो नारी तृतीया के दिन व्रत रहकर चोरी से अन्न खाती है वह शुकरी का जन्म पाती है। जो फल खाती है, वह बंदरिया की योनि पाती है। जो जल पीती है वह जोंक का जन्म लेती है। जो दूध पीती है वह सर्पिणी का जन्म और जो मांस खाती है, बाघिनी का जन्म लेती है। जो दही खाती है वह बिल्ली का जन्म पाती है। जो मिठाई खाती है वह चींटी के जन्म को धारण करती है और जो सब चीजें खाती है, वह मक्खी का जन्म लेती है। जो उस दिन सोती है वह अजगरी योनि प्राप्त करती है।

हे उमा! जो नारी अपने पति को धोखा देती है, वह मुर्गी का जन्म धारण करती है। हे उमा! जो इस व्रत को श्रद्धा विधि से धारण करती है, वह मुझसा पति प्राप्त करती है व दूसरे जन्म में तुम्हारे समान स्वरूपवान होकर संसार में उत्तम सुख भोगती है। इस व्रत को करने के बाद नारियाँ श्री शिवलोक की वासी होती हैं।

बोलिये श्री शंकर भगवान पार्वती माता की जय
॥ इति श्री ॥

आरती संग्रह

श्री शिवजी की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे। हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी। त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे। सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी। जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा। भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला। शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

श्री गणेश जी की आरती

जय गणेश देवा

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ जय…

पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा। लड्डुअन को भोग लगे, सन्त करे सेवा॥ जय…

एक दन्त दयावन्त चार भुजा धारी। माथे सिन्दूर सोहे, मूषक की सवारी॥ जय…

अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया। बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥ जय…

दीनन की लाज राखो शम्भु सुतवारी। कामना को पूर करो जाऊँ बलिहारी॥ जय…

सूर श्याम शरण आये सफल कीजे सेवा। सिद्धि देत सिद्धि देत बुद्धि देत देवा॥ जय…

कपूर आरती & क्षमा प्रार्थना

श्री कपूर द्वारा देवी-देवताओं की आरती

ॐ कपूर गौरं करुणावतारं, संसार सारं भुजगेन्द्र हारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानी सहितं नमामि॥

मन्दार माला कुलिताल कायै, कपाल मालांकित शेखराय।
दिव्याम्बराय च दिगम्बराय, ॐ नमः शिवाय च नमः शिवाय॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव॥

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अखण्ड मण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः॥

क्षमा प्रार्थना

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजा चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥ 1 ॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं, भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव, परिपूर्ण तदस्तु मे॥ 2 ॥

॥ इति श्री हरतालिका तीज व्रत सम्पूर्णम् ॥

परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व

हरतालिका तीज का महत्व

हरतालिका तीज सनातन धर्म के प्रमुख व्रतों में से एक है, जिसका विस्तृत वर्णन 'भविष्य पुराण' के 'हरतालिका व्रत माहात्म्य' अध्याय में मिलता है। 'हरतालिका' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों—'हरत' (हरण करना) और 'आलिका' (सखी)—से हुई है।

१. अखंड सौभाग्य की प्राप्ति (Eternal Martial Bliss): "उमामहेश्वर सायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रतमहं करिष्ये।" भविष्य पुराण के अनुसार, जो सुहागिन स्त्रियाँ श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करती हैं, उन्हें सात जन्मों तक अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन का वरदान प्राप्त होता है।

२. मनोवांछित वर की प्राप्ति: कुंवारी कन्याओं द्वारा इस व्रत को करने का विशेष महत्व है। जैसे माता पार्वती ने कठोर तप से भगवान शिव जैसा 'आशुतोष' (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) वर प्राप्त किया।

३. शिवलोक की प्राप्ति: मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से स्त्री को अंतकाल में शिवलोक की प्राप्ति होती है।

४. संकल्प शक्ति और आत्म-शुद्धि: यह व्रत केवल शारीरिक तप नहीं है, बल्कि मानसिक दृढ़ता का भी परीक्षण है। निर्जला रहकर रात्रि जागरण करना (जागना) मन पर नियंत्रण और भक्ति भाव को बढ़ाता है।

।। ॐ नमः शिवाय ।।