श्री यतिराज स्तोत्रम् (रङ्गार्य कृत)

॥ यतिराजस्तोत्रम् ॥
धनं यस्य सद्ब्रह्म विद्यानिदानं बुधानन्दरूपं स्वरूपं दधानम् । परप्रापकाङ्घ्रिद्वयीसन्निधानं विधानं विभूतिद्वयेशाभिधानम् । भजे भाष्यकारं भजे लक्ष्मणार्यं भजे सालसङ्ग्रामरामानुजार्यम् ॥ १॥ नमोनित्यदिव्यप्रबन्धादिकृद्भ्यो नमः पञ्चरात्रादिविद्भ्यो मुनिभ्यः । नमोमद्गुरुभ्यो नमस्तद्गुरुभ्यो नमः पञ्चसंस्कारविद्यागुरुभ्यः ॥ २॥ नमो वेङ्कटाधीशसत्पादरेणु- स्तवैः पद्यविद्यासहस्रप्रयोक्त्रे । मुमुक्षुञ्जनान्नित्यकल्पान्विधात्रे महाहोबलाचार्यवर्याय पित्रे ॥ ३॥ अहिर्बुध्न्यइत्यादि यस्मिन्प्रमाणं कलौ कश्चिदित्यादिशुद्धं पुराणम् । मृषा घोषवादादि येनाधरीणं धुरीणं गुरूणां पुमांसं पुराणम् ॥ ४॥ यतीशाश्रितानां कनिष्ठो भवेयं सदा पञ्चमोपायनिष्ठो भवेयम् । गुरोरङ्घ्रिरूपो भवेयं भवेयं हरेरन्तरङ्गो भवेयं भवेयम् ॥ ५॥ अनन्तोहि भूत्वा महाभाष्यकारः प्रबुद्धं चकार त्रयीशब्दजालम् । पुनस्सोऽयमागत्य मद्भाष्यकारः प्रबुद्धं चकार श्रुतेरर्थमूलम् ॥ ६॥ मृषावादिदुर्वादपङ्के निमग्नं गुणाभावहेयस्वरूप... पुनस्सोऽयमागत्य मद्भाष्यकारः प्रबुद्धं चकार श्रुतेरर्थमूलम् ॥ ६॥ मृषावादिदुर्वादपङ्के निमग्नं गुणाभावहेयस्वरूपादिभग्नम् । परं ब्रह्म यस्य प्रभावेण लग्नं बभौ दृष्टकल्याणलक्ष्मीवलग्नम् ॥ ७॥ सदैकान्तिभिर्दादशोद्यत्सहस्त्रै- श्चतुस्सप्ततिस्वीयसिंहासनस्थैः । तथाविष्णुभक्तैरनन्तैरुपेतं महारङ्गराजाङ्गरक्षाविनीतम् ॥ ८॥ न यागो न योगो न वा तन्त्रमन्त्रौ न हि ज्ञानदाने न भक्तिप्रपत्ती । तथाप्यात्मलब्धौ न सन्देहगन्धो बलम्मे महद्भाष्यकारानुबन्धः ॥ ९॥ कृतं वा तपो न्यद्बलंवागुरूणां श्रियःश्रीपतेः किन्नु साक्षादपेक्षा । घृणाभाष्यकारस्य निष्कारणा वा ममैषा मुखेघोषते कापि भाषा ॥ १०॥ परव्यूहलीलान्तरार्चाविशेषै- रशेषैर्हरिर्व्यासमन्वादिवेषैः । समुद्धर्तुमेतन्भवाब्धेरशक्त- स्ततोभूद्यतिः शेषभावानुषक्तः ॥ ११॥ भवाब्धौ निमग्नान्त्समुद्धर्तुकामः परोलक्ष्मणार्याद्गुरुर्नेति नेति । सनिस्साणभेरीमहाकाहलीभि- र्भटैर्घष्यतां घुष्यतां दिक्तटेषु ॥ १२॥ सती ब्रह्मविद्या सुतः शैलदीपो गुरुः पारिजातः श्रितं भाग्यरत्नम् । ततः कालमेघे स्वयं भोगिराजे प्रसन्ने तदस्मिन्नलभ्यं कुतो नः ॥ १३॥ तृणीकृत्यवैरिञ्जिरुद्रप्रतिष्ठां यदीयाङ्घ्रिपाथोजकैङ्कर्यनिष्ठाम् । इहामुत्र च प्राभवाः प्रक्रमन्ते- तदन्यं गुरुं मूढभावा भजन्ते ॥ १४॥ यतीन्द्रं विनिन्दत्यसद्ग्रन्थकन्था- धराविश्वमिथ्यानुसन्धानगन्धाः । जगच्चक्षुषं प्रत्नमेकं शतान्धा- नपश्यन्त्यहो कर्मबन्धादिवान्धाः ॥ १५॥ न तर्केऽप्युदर्को न शब्दे च शक्तो न कस्यावतारो न तन्त्रस्वतन्त्रः । कथं कल्पयेत्सर्वभाषासु गाथाः किमाचार्यमाहात्म्यभीतस्सवेधाः ॥ १६॥ अहं तूर्ध्वबाहुर्भणामि शृणुध्वं शठारातिनाथादिवाचः स्मरध्वम् । यतीन्द्राङ्घ्रिकैङ्कर्यमात्रे यतध्वं मनुध्वं मुरध्वंसिलोके रमध्वम् ॥ १७॥ सुधापुण्ड्ररेखा विराजल्ललाटं सुधांशुप्रतीकाशकाशत्किरीटम् । समुद्घाट्य वैकुण्ठकक्ष्याकवाटं सुपर्णादिसंसेव्यमानन्दकूटम् ॥ १८॥ उषस्सान्ध्यरागारुणन्मेघरेखा- कचाकर्षिकाषायखण्डोत्तरीयम् । बृहन्नारदीयोक्तरूपं तुरीयं परं वस्तु पश्यामि लक्ष्मीधरीयम् ॥ १९॥ अलं देशिकैरन्यचित्तैः प्रमत्तै- रलंस्थाणुकल्पैरलक्ष्मीशतल्यैः । अपद्माक्षहारैरचक्राङ्कधारै- रसद्भाष्यकारैरशेषावतारैः ॥ २०॥ प्रफुल्लाननेत्रं प्रभाशोभिगात्रं प्रकृत्या पवित्रं प्रभावैर्विचित्रम् । हरेरातपत्रं सतां जैतपत्रं सुपर्णस्यमित्रं सुमित्रासुपुत्रम् ॥ २१॥ अहो शाङ्कराः किङ्करत्वं प्रयाताः वरे भास्करास्तस्कराकारभाजः । ततो यादवाः पादवारिप्रपूता- स्तथैवागतास्सौगता भाट्टसाङ्ख्याः ॥ २२॥ शठः कापिलः कोऽपि लक्ष्यो न मोक्षे विनष्टस्वरोऽभूत्स माहेश्वरोऽपि । कणादः प्रमाणप्रणादोऽपि शान्तः प्रमाणं ब्रुवाणश्च गाणापतेयः ॥ २३॥ स्वयम्ब्रह्मसूत्रायभावेऽपि बुद्ध्या कथं ब्रह्मसूत्रादिभाष्यं विदध्यात् । कथं तस्य शिष्या बभूवुर्मनुष्याः कुतो नास्ति रोषः कलेरेष दोषः ॥ २४॥ पुरादर्शितं चोलभृत्कीटकण्ठं समारुह्य सह्याचलेन्द्रोपकण्ठम् । अकुण्ठप्रभावोऽत्र वैकुण्ठकल्पः सकण्ठीरवं प्राप्य सोल्लुण्ठमास्ते ॥ २५॥ नमः पुण्यकौण्डिन्यगोत्रोद्भवेभ्यो नमस्सालसङ्ग्रामसद्वंशजेभ्यः । नमो वैष्णवेभ्यो महद्भ्योऽर्भकेभ्यो नमः शेषभावादचिન્ત્ર्यश्च चित्र्यः । भजे भाष्यकारं भजे लक्ष्मणार्यं भजे सालसङ्ग्रामरामानुजार्यम् ॥ २६॥ इति श्रीसालग्रामस्थलाचार्यपुरुषनरपतिराजसंस्थानगुरूद्दण्डवेदान्त- रङ्गार्यविरचितं यतिराजस्तोत्रद्वयं सम्पूर्णम् ॥ ॥ इति यतिराजस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्री यतिराज स्तोत्रम्, श्री वैष्णव सम्प्रदाय के महान आचार्य श्री रामानुजाचार्य को समर्पित एक भावपूर्ण स्तुति है, जिनकी रचना आचार्य रङ्गार्य ने की है। 'यतिराज' का अर्थ है 'सन्यासियों के राजा', जो रामानुजाचार्य की सर्वोच्च आध्यात्मिक स्थिति का द्योतक है। इस स्तोत्र का मुख्य महत्व गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और उनकी कृपा को ही मोक्ष का एकमात्र साधन मानने में है। स्तोत्र की हर पंक्ति में दोहराई जाने वाली पंक्ति "भजे भाष्यकारं भजे लक्ष्मणार्यं, भजे सालसङ्ग्रामरामानुजार्यम्" (मैं भाष्यकार को भजता हूँ, मैं लक्ष्मणार्य को भजता हूँ, मैं सालग्राम निवासी रामानुजाचार्य को भजता हूँ) शिष्य की अपने गुरु के प्रति अनन्य भक्ति को दर्शाती है। यह स्तोत्र विशिष्टाद्वैत (Vishishtadvaita) दर्शन के सार और गुरु परम्परा के महत्व को उजागर करता है।
आचार्य रामानुज का संदर्भ (Context of Acharya Ramanuja)
श्री रामानुजाचार्य (1017-1137 ई.) वैष्णव धर्म के सबसे प्रभावशाली आचार्यों में से एक थे, जिन्होंने विशिष्टाद्वैत के दार्शनिक सिद्धांत को स्थापित किया। उन्होंने उस समय प्रचलित अद्वैत वेदांत (जिसके अनुसार ब्रह्म निर्गुण है और जगत् मिथ्या है) के विपरीत यह सिद्धांत दिया कि ब्रह्म (भगवान नारायण) सगुण हैं, और यह जगत् तथा जीव उनकी वास्तविक विभूतियाँ हैं। उन्होंने ब्रह्मसूत्रों पर "श्रीभाष्यम्" नामक प्रसिद्ध टीका लिखी, जिसके कारण वे "भाष्यकार" कहलाए। उनका जीवन भक्ति, ज्ञान और सामाजिक सुधारों के लिए समर्पित था, जिसमें उन्होंने सभी जातियों के लिए मंदिर के द्वार खोले। यह स्तोत्र उन्हीं के द्वारा स्थापित सिद्धांतों, उनके द्वारा रचित भाष्यों और उनकी महान गुरु-सत्ता की वंदना करता है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
यह स्तोत्र विशिष्टाद्वैत दर्शन के कई प्रमुख सिद्धांतों को समाहित करता है:
- गुरु ही परम धन हैं (The Guru as the Ultimate Wealth): "धनं यस्य सद्ब्रह्म विद्यानिदानं" - जिनका धन सच्चा ब्रह्मज्ञान है। आचार्य रामानुज को ही परम धन और ज्ञान का स्रोत माना गया है।
- गुरु-परम्परा को नमन (Obeisance to the Guru Lineage): "नमोमद्गुरुभ्यो नमस्तद्गुरुभ्यो" - स्तोत्र में केवल रामानुज को ही नहीं, बल्कि उनकी पूरी गुरु-शिष्य परम्परा को नमन किया गया है, जो इस सम्प्रदाय की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।
- प्रपत्ति मार्ग (The Path of Surrender): "सदा पञ्चमोपायनिष्ठो भवेयम्" - 'पञ्चमोपाय' का अर्थ है प्रपत्ति या पूर्ण शरणागति, जो भक्ति, ज्ञान, कर्म और योग से भी श्रेष्ठ और सरल मार्ग माना जाता है। भक्त यहाँ उसी मार्ग पर चलने की कामना करता है।
- अन्य दर्शनों का खंडन (Refutation of Other Philosophies): स्तोत्र में शंकराचार्य के अनुयायियों (
शाङ्कराः), बौद्धों (सौगता), और अन्य दार्शनिकों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि रामानुजाचार्य के प्रभाव से उन सभी ने हार मान ली। यह रामानुज की बौद्धिक विजय और उनके दर्शन की स्थापना का प्रतीक है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
इस स्तोत्र में कोई पारंपरिक फलश्रुति नहीं है, क्योंकि यह स्वयं एक भक्त की आकांक्षा और समर्पण है। इसके पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ इसके भाव में ही निहित हैं:
- गुरु कृपा की प्राप्ति (Attainment of Guru's Grace): इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य आचार्य रामानुज और गुरु-परम्परा की कृपा प्राप्त करना है, जिसे मोक्ष का एकमात्र साधन माना गया है।
- ज्ञान और वैराग्य (Knowledge and Detachment): आचार्य के स्वरूप का ध्यान करने से साधक को ब्रह्म-विद्या और संसार के प्रति वैराग्य का भाव प्राप्त होता है।
- भक्ति मार्ग में दृढ़ता (Steadfastness in Devotion): यह स्तुति साधक को भक्ति और प्रपत्ति के मार्ग पर दृढ़ रहने की शक्ति प्रदान करती है। "बलम्मे महद्भाष्यकारानुबन्धः" - भाष्यकार का संबंध ही मेरा सबसे बड़ा बल है।
- आत्मविश्वास और निर्भयता (Confidence and Fearlessness): जब साधक यह महसूस करता है कि आचार्य रामानुज जैसे महान गुरु उसके रक्षक हैं, तो उसके सभी संदेह और भय (
न सन्देहगन्धो) समाप्त हो जाते हैं।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ दिन गुरुवार (गुरु का दिन) और एकादशी है।
- श्री वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी इसे अपनी नित्य पूजा में शामिल करते हैं।
- पाठ करते समय आचार्य रामानुज के शांत, ज्ञानी और करुणामय स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।
- जो लोग वेदान्त का अध्ययन कर रहे हैं या आध्यात्मिक मार्ग पर मार्गदर्शन चाहते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र अत्यंत प्रेरणादायक है।
- पाठ का मुख्य भाव केवल कुछ माँगना नहीं, बल्कि गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता और समर्पण व्यक्त करना होना चाहिए।