श्री यन्त्रोधारक हनुमत् स्तोत्रम्

नमामि दूतं रामस्य सुखदं च सुरद्रुमम् ।
श्री मारुतात्मसम्भूतं विद्युत्काञ्चन सन्निभम् ॥ १
पीनवृतं महाबाहुं सर्वशत्रुनिवारणम् ।
रामप्रियतमं देवं भक्ताभीष्टप्रदायकम् ॥ २
नानारत्नसमायुक्तं कुण्डलादिविराजितम् ।
द्वात्रिंशल्लक्षणोपेतं स्वर्णपीठविराजितम् ॥ ३
त्रिंशत्कोटिबीजसंयुक्तं द्वादशावर्ति प्रतिष्ठितम् ।
पद्मासनस्थितं देवं षट्कोणमण्डलमध्यगम् ॥ ४
चतुर्भुजं महाकायं सर्ववैष्णवशेखरम् ।
गदाऽभयकरं हस्तौ हृदिस्थो सुकृताञ्जलिम् ॥ ५
हंसमन्त्र प्रवक्तारं सर्वजीवनियामकम् ।
प्रभञ्जनशब्दवाच्येन सर्वदुर्मतभञ्जकम् ॥ ६
सर्वदाऽभीष्टदातारं सतां वै दृढमाहवे ।
अज्ञानागर्भसम्भूतं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥ ७
कपीनां प्राणदातारं सीतान्वेषणतत्परम् ।
अक्षादिप्राणहन्तारं लङ्कादहनतत्परम् ॥ ८
लक्ष्मणप्राणदातारं सर्ववानरयूथपम् ।
किङ्करा: सर्वदेवायाः जानकीनाथस्य किङ्करम् ॥ ९
वासिनं चक्रतीर्थस्य दक्षिणस्थ गिरौ सदा ।
तुङ्गाम्भोदि तरङ्गस्य वातेन परिशोभिते ॥ १०
नानादेशगतैः सद्भिः सेव्यमानं नृपोत्तमैः ।
धूपदीपादि नैवेद्यैः पञ्चखाद्यैश्च शक्तितः ॥ ११
भजामि श्रीहनूमन्तं हेमकान्तिसमप्रभम् ।
व्यासतीर्थयतीन्द्रेण पूजितं च विधानतः ॥ १२
त्रिवारं यः पठेन्नित्यं स्तोत्रम् भक्त्या द्विजोत्तमः ।
वाञ्छितं लभतेऽभीष्टं षण्मासाभ्यन्तरे खलु ॥ १३
पुत्रार्थी लभते पुत्रं यशोऽर्थी लभते यशः ।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ॥ १४
सर्वथा माऽस्तु सन्देहो हरिः साक्षी जगत्पतिः ।
यः करोत्यत्र सन्देहं स याति नरकं ध्रुवम् ॥ १५
यन्त्रोधारकस्तोत्रम् षोडशश्लोकसम्युतम् ।
श्रवणं कीर्तनं वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १६
॥ इति श्री व्यासराजकृत यन्त्रोधारक हनुमत् स्तोत्रम् ॥
श्री मारुतात्मसम्भूतं विद्युत्काञ्चन सन्निभम् ॥ १
पीनवृतं महाबाहुं सर्वशत्रुनिवारणम् ।
रामप्रियतमं देवं भक्ताभीष्टप्रदायकम् ॥ २
नानारत्नसमायुक्तं कुण्डलादिविराजितम् ।
द्वात्रिंशल्लक्षणोपेतं स्वर्णपीठविराजितम् ॥ ३
त्रिंशत्कोटिबीजसंयुक्तं द्वादशावर्ति प्रतिष्ठितम् ।
पद्मासनस्थितं देवं षट्कोणमण्डलमध्यगम् ॥ ४
चतुर्भुजं महाकायं सर्ववैष्णवशेखरम् ।
गदाऽभयकरं हस्तौ हृदिस्थो सुकृताञ्जलिम् ॥ ५
हंसमन्त्र प्रवक्तारं सर्वजीवनियामकम् ।
प्रभञ्जनशब्दवाच्येन सर्वदुर्मतभञ्जकम् ॥ ६
सर्वदाऽभीष्टदातारं सतां वै दृढमाहवे ।
अज्ञानागर्भसम्भूतं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥ ७
कपीनां प्राणदातारं सीतान्वेषणतत्परम् ।
अक्षादिप्राणहन्तारं लङ्कादहनतत्परम् ॥ ८
लक्ष्मणप्राणदातारं सर्ववानरयूथपम् ।
किङ्करा: सर्वदेवायाः जानकीनाथस्य किङ्करम् ॥ ९
वासिनं चक्रतीर्थस्य दक्षिणस्थ गिरौ सदा ।
तुङ्गाम्भोदि तरङ्गस्य वातेन परिशोभिते ॥ १०
नानादेशगतैः सद्भिः सेव्यमानं नृपोत्तमैः ।
धूपदीपादि नैवेद्यैः पञ्चखाद्यैश्च शक्तितः ॥ ११
भजामि श्रीहनूमन्तं हेमकान्तिसमप्रभम् ।
व्यासतीर्थयतीन्द्रेण पूजितं च विधानतः ॥ १२
त्रिवारं यः पठेन्नित्यं स्तोत्रम् भक्त्या द्विजोत्तमः ।
वाञ्छितं लभतेऽभीष्टं षण्मासाभ्यन्तरे खलु ॥ १३
पुत्रार्थी लभते पुत्रं यशोऽर्थी लभते यशः ।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ॥ १४
सर्वथा माऽस्तु सन्देहो हरिः साक्षी जगत्पतिः ।
यः करोत्यत्र सन्देहं स याति नरकं ध्रुवम् ॥ १५
यन्त्रोधारकस्तोत्रम् षोडशश्लोकसम्युतम् ।
श्रवणं कीर्तनं वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १६
॥ इति श्री व्यासराजकृत यन्त्रोधारक हनुमत् स्तोत्रम् ॥
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इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
श्री यन्त्रोधारक हनुमत् स्तोत्रम् की रचना महान माध्व संत, दार्शनिक और विजयनगर साम्राज्य के राजगुरु, श्री व्यासराज तीर्थ (Shri Vyasaraja Tirtha) (लगभग 1460-1539 ई.) ने की थी। "यन्त्रोधारक" का अर्थ है "यंत्र को धारण करने वाले"। यह स्तोत्र कर्नाटक के हम्पी (Hampi) में तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध यन्त्रोधारक आञ्जनेय स्वामी को समर्पित है, जिनकी प्राण-प्रतिष्ठा स्वयं श्री व्यासराज ने की थी। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ हनुमान जी एक षट्कोण यंत्र के भीतर ध्यान मुद्रा में विराजमान हैं, जिसके चारों ओर 12 वानरों की माला है, जो 12 दिनों के निरंतर जाप का प्रतीक है। यह स्तोत्र हनुमान जी के इसी शक्तिशाली, ध्यानावस्थित और मंत्र-गर्भित स्वरूप का गुणगान करता है।
स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति पर आधारित)
इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 13-16) इसके पाठ से प्राप्त होने वाले निश्चित और समयबद्ध लाभों का स्पष्ट रूप से वर्णन करती है:
- निश्चित मनोकामना पूर्ति (Guaranteed Fulfillment of Wishes): फलश्रुति में कहा गया है, "वाञ्छितं लभतेऽभीष्टं षण्मासाभ्यन्तरे खलु" - अर्थात्, जो भी भक्त इस स्तोत्र का नित्य तीन बार पाठ करता है, उसकी सभी अभीष्ट (मनोवांछित) इच्छाएं छह महीने के भीतर निश्चित रूप से पूरी होती हैं।
- संतान, यश, विद्या और धन की प्राप्ति (Bestowal of Progeny, Fame, Knowledge, and Wealth): स्तोत्र स्पष्ट रूप से कहता है कि "पुत्रार्थी लभते पुत्रं, यशोऽर्थी लभते यशः, विद्यार्थी लभते विद्यां, धनार्थी लभते धनम्" - अर्थात्, पुत्र की इच्छा रखने वाले को पुत्र, यश की इच्छा रखने वाले को यश, विद्या की इच्छा रखने वाले को विद्या और धन (wealth) की इच्छा रखने वाले को धन की प्राप्ति होती है।
- पापों का नाश (Destruction of Sins): "श्रवणं कीर्तनं वा सर्वपापैः प्रमुच्यते" - इस स्तोत्र का केवल श्रद्धा से श्रवण (सुनना) या कीर्तन (गायन) करने मात्र से ही मनुष्य सभी पापों (sins) से मुक्त हो जाता है।
- अटल विश्वास का फल (Fruit of Unwavering Faith): स्तोत्र में चेतावनी दी गई है कि इन फलों पर संदेह नहीं करना चाहिए ("सर्वथा माऽस्तु सन्देहः"), क्योंकि भगवान हरि (Lord Hari) स्वयं इसके साक्षी हैं। जो इसमें संदेह करता है, वह निश्चय ही नरक को प्राप्त होता है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
- सर्वोत्तम फल प्राप्ति के लिए इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन तीन बार (सुबह, दोपहर और शाम) करना चाहिए, जैसा कि फलश्रुति में निर्देश दिया गया है।
- सुबह स्नान के बाद, हनुमान जी के यन्त्रोधारक स्वरूप (एक षट्कोण यंत्र के भीतर ध्यान मुद्रा में बैठे हुए) का ध्यान करते हुए पाठ आरम्भ करें।
- मंगलवार (Tuesday) और शनिवार (Saturday) इस पाठ के लिए विशेष रूप से शुभ दिन हैं।
- किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति के लिए, छह महीने का संकल्प लेकर पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ इसका नित्य पाठ करना चाहिए।