यमस्तोत्रं (सावित्री कृत)

श्री नारायण उवाच ।
हरेरुत्कीर्तनं श्रुत्वा सावित्री यमवक्रतः । साश्रुनेत्रा सुपुलका यमं पुनरुवाच सा ॥ १॥सावित्र्युवाच ।
हरेरुत्कीर्तनं धर्म स्वकुलोद्धारककारणम् । श्रोतृणां च वक्तृणां जन्ममृत्युजराहरम् ॥ २॥ दानां च व्रतानां च सिद्धीनां तपसां परम् । योगानां च वेदानां सेवनं कीर्तनं हरेः ॥ ३॥ मुक्तत्वममरत्वं वा सर्वसिद्धित्वमेव वा । श्रीकृष्णसेवनस्यैव कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ४॥ भजामि केन विधिना श्रीकृष्णं प्रकृतेः परम् । मूढां मामबलां तात वद वेदविदां वरः ॥ ५॥ शुभकर्मविपाकं च श्रुतं नृणां मनोहरम् । कर्माशुभविपाकं च तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ६॥ इत्युत्क्त्वा सा सती ब्रह्मन्भक्तिनम्रात्मकंधरा । तुष्टाव धर्मराजं च वेदोक्तेन स्तवेन च ॥ ७॥सावित्रीकृत यमस्तोत्रम्
तपसा धर्ममाराध्य पुष्करे भास्वरः पुरा । धर्मांशं यं सुतं प्राप धर्मराजं नमाम्यहम् ॥ ८॥ समता सर्वभूतेषु यस्य सर्वस्य साक्षिणः । अतो यन्नाम शमनमिति तं प्रणमाम्यहम् ॥ ९॥ येनान्तश्च कृतो विश्वे सर्वेषां जीविनां परम् । कर्मानुरूपकालेन तं कृतान्तं नमाम्यहम् ॥ १०॥ बिभर्ति दण्डं दण्ड्याय पापिनां शुद्धिहेतवे । नमामि तं दण्डधरं यः शास्ता सर्वकर्मणाम् ॥ ११॥ विश्वे यः कलयत्येव सर्वायुश्चापि संततम् । अतीव दुर्निवार्यं च तं कालं प्रणमाम्यहम् ॥ १२॥ तपस्वी वैष्णवो धर्मो संयमी विजितेन्द्रियः । जीविनां कर्मफलदं तं यमं प्रणमाम्यहम् ॥ १३॥ स्वात्मारामश्च सर्वज्ञो मित्रं पुण्यकृतां भवेत् । पापिनं क्लेशदो यस्य पुत्रो मित्रो नमाम्यहम् ॥ १४॥ यज्जन्म ब्रह्मणो वंशे ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा । यो ध्यायति परं ब्रह्म ब्रह्मवंशं नमाम्यहम् ॥ १५॥फलश्रुतिः
इदं यमाष्टकं नित्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् । यमात्तस्य भयं नास्ति सर्वपापात्प्रमुच्यते ॥ १७॥ महापापी यदि पठेत् नित्यं भक्त्या च नारद । यमः करोति तं शुद्धं कायव्यूहेन निश्चितम् ॥ १८॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे प्रकृतिखण्डे नारदनारायणसंवादे सावित्रिकृतयमस्तोत्रं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
सावित्रीकृत यमस्तोत्रम्, ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड (अध्याय २८) में वर्णित एक अत्यंत दुर्लभ और महत्वपूर्ण स्तुति है। इसका महत्व इस बात में है कि यह मृत्यु के देवता यमराज की स्तुति स्वयं एक पतिव्रता स्त्री, सावित्री, द्वारा की गई है। सामान्यतः यमराज को भय का प्रतीक माना जाता है, किन्तु यह स्तोत्र उनके वास्तविक स्वरूप को उजागर करता है - वे केवल प्राण हरने वाले नहीं, बल्कि धर्मराज हैं, जो कर्मों के impartial judge हैं और पापियों को दण्ड देकर उन्हें शुद्ध करते हैं। यह स्तोत्र यमराज को सूर्यदेव के पुत्र, एक महान वैष्णव, और धर्म के ज्ञाता के रूप में प्रस्तुत करता है। सावित्री द्वारा रचित होने के कारण यह स्तोत्र पतिव्रता धर्म और स्त्री की आध्यात्मिक शक्ति का भी प्रतीक है।
पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)
यह स्तोत्र उस प्रसिद्ध कथा का अंश है जब सावित्री अपने पति सत्यवान के प्राणों को यमराज से वापस ले आती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तो सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगीं। यमराज के बहुत समझाने पर भी वे नहीं लौटीं। उनकी दृढ़ता और पतिव्रत धर्म से प्रभावित होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने को कहा, लेकिन सत्यवान के जीवन को छोड़कर। सावित्री ने बुद्धिमानी से अपने श्वसुर के लिए राज्य और नेत्र-ज्योति, और अपने पिता के लिए सौ पुत्र मांग लिए। उनकी धर्मयुक्त बातों और ज्ञान से यमराज इतने प्रसन्न हुए कि वे उन्हें धर्म और कर्म के गूढ़ रहस्य बताने लगे। इसी संवाद के दौरान, यमराज के मुख से भगवान हरि की महिमा सुनकर सावित्री का हृदय भक्ति से भर गया और उन्होंने यमराज की दिव्यता को पहचानकर, उन्हें एक गुरु के रूप में देखते हुए, इस स्तोत्र से उनकी स्तुति की।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
यह यमाष्टक यमराज के आठ प्रमुख स्वरूपों और कार्यों की व्याख्या करता है:
- धर्मराज (Dharmaraja): सूर्यदेव ने धर्म की आराधना करके यम को पुत्र रूप में प्राप्त किया, इसलिए वे 'धर्मराज' हैं। वे धर्म के साक्षात् स्वरूप हैं।
- शमन (Shaman): "समता सर्वभूतेषु" - वे सभी प्राणियों के प्रति समान भाव रखते हैं, चाहे वह राजा हो या रंक। वे किसी से द्वेष नहीं करते, इसलिए उनका नाम 'शमन' (सबको शांत/समान करने वाला) है।
- कृतान्त (Kritanta): वे प्राणियों के कर्मों के अनुसार उचित समय पर उनके जीवन का अंत करते हैं, इसलिए वे 'कृतान्त' (कर्मों का अंत करने वाले) हैं।
- दण्डधर (Dandadhara): वे पापियों को शुद्ध करने के उद्देश्य से दण्ड धारण करते हैं। उनका दण्ड विनाश के लिए नहीं, बल्कि शुद्धि (purification) के लिए है।
- काल (Kala): वे 'काल' स्वरूप हैं, जो सभी की आयु का निर्धारण करते हैं और जिसे कोई टाल नहीं सकता (
अतीव दुर्निवार्यं)। - यम (Yama): वे सभी जीवों को उनके कर्मों का फल प्रदान करते हैं, इसलिए वे 'यम' हैं।
- पुण्यमित्र (Punya-mitra): वे पुण्य करने वालों के लिए मित्र (
मित्रं पुण्यकृतां) और पापियों के लिए क्लेशदायी हैं। - ब्रह्मवंश (Brahmavansha): उनका जन्म ब्रह्मा के वंश में हुआ है और वे स्वयं परब्रह्म का ध्यान करते हैं।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
स्तोत्र के अंत में (श्लोक १७-१८) इसकी फलश्रुति स्पष्ट रूप से बताई गई है:
- यम-भय से मुक्ति (Freedom from Fear of Yama): "इदं यमाष्टकं नित्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् । यमात्तस्य भयं नास्ति" - जो व्यक्ति प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इस यमाष्टक का पाठ करता है, उसे यमराज से कोई भय नहीं रहता।
- सर्वपाप से मुक्ति (Freedom from All Sins): इसके पाठ से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है (
सर्वपापात्प्रमुच्यते)। - महापापियों की शुद्धि (Purification of Great Sinners): "महापापी यदि पठेत् नित्यं भक्त्या च नारद । यमः करोति तं शुद्धं कायव्यूहेन निश्चितम्" - यदि कोई महापापी भी भक्तिपूर्वक इसका नित्य पाठ करे, तो यमराज स्वयं 'कायव्यूह' विधि से उसे निश्चित रूप से शुद्ध कर देते हैं। कायव्यूह एक योगिक प्रक्रिया है जिसमें योगी अपने कर्मों को शीघ्रता से भोगने के लिए एक साथ अनेक शरीर धारण करता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- फलश्रुति के अनुसार, इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर (
प्रातरुत्थाय) करना चाहिए। - शनिवार का दिन यमराज और उनके भाई शनिदेव से संबंधित है, इसलिए इस दिन पाठ करना विशेष फलदायी हो सकता है।
- पितृ पक्ष (Pitru Paksha) के दौरान अपने पूर्वजों की शांति के लिए और यमराज की कृपा प्राप्त करने के लिए इसका पाठ करना अत्यंत शुभ है।
- जो व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो या जिसे अकाल मृत्यु का भय हो, उसे इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करना चाहिए।
- पाठ करते समय यमराज के धर्म-स्वरूप, न्यायप्रिय और शांत रूप का ध्यान करना चाहिए।