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यमकृतं जगन्नाथस्तोत्रम्

यमकृतं जगन्नाथस्तोत्रम्

यम उवाच ।

नमस्ते देवदेवेश सृष्टिस्थित्यन्तकारण ॥ १६॥ त्वयि प्रोतमिदं सर्वं सूत्रे मणिगणा यथा । त्वया धृतं त्वया सृष्टं त्वया चाप्यायितं जगत् ॥ १७॥ चन्द्रसूर्यादिरूपेण नित्यं भासयसेऽखिलम् । विश्वेश्वरं जगद्योनिं विश्वावासं जगद्गुरुम् ॥ १८॥ विश्वसाक्षिणमाद्यन्तवर्जितं प्रणमाम्यहम् । नमः परमकारुण्यजलसम्भृतसिन्धवे ॥ १९॥ परापरपरातीतविभवे विश्वसम्भव ॥ २.२.२०॥ भवसन्तापनीहारभानवे दीनबन्धवे । स्वमायारचिताशेषविभवे गुणरज्जवे ॥ २१॥ नमः कमलकिञ्जल्कपीतनिर्मलवाससे । महाहवरिपुस्कन्ध कृन्तचक्राय चक्रिणे ॥ २२॥ दंष्ट्रोद्धृत क्षितिभृते त्रयीमूर्तिमते नमः । नमो यज्ञवराहाय चन्द्रसूर्याग्निचक्षुषे ॥ २३॥ नरसिंहाय दंष्ट्रोग्रमूर्तिद्रावितशत्रवे । यदपाङ्गविलासैकसृष्टिस्थित्युपसंहृतिः ॥ २४॥ उच्चावचात्मको ह्येष भवः सम्भवते मुहुः । तममुं नीलमेघाभं नीलाश्ममणिविग्रहम् ॥ २५॥ नीलाचलगुहावासं प्रणमामि कृपानिधिम् । शङ्खचक्रगदापद्मधारिणं शुभदायिनम् ॥ २६॥ प्रणताशेषपापौघदारिणं मुरवैरिणम् । नमस्ते कमलापाङ्ग सङ्गसंस्कारचक्षुषे ॥ २७॥ श्रीवत्सकौस्तुभोद्भासि मनोहृद्व्यूढवक्षसे । यत्पादपङ्कजद्वन्द्वसंश्रयैश्वर्यभागिनी ॥ २८॥ श्रीः संश्रिता जनैः शश्वत्पृथगैश्वर्यदायिनी । या परापरसम्भिन्ना प्रकृतिस्ते सिसृक्षया ॥ २९॥ निर्विकारं परं ब्रह्म विकारि ससृजेंऽजसा । सर्वलक्षणसम्पूर्णा लक्षितां शुभलक्षणैः । लक्ष्मीशोरसि नित्यस्था लक्ष्मीं तां प्रणमाम्यहम् ॥ २.२.३०॥ ॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे वैष्णवखण्डे पुरुषोत्तमजगन्नाथमाहात्म्ये द्वितीयाध्यायान्तर्गतं यमकृतं जगन्नाथस्तोत्रं समाप्तम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और यमराज की स्तुति

यमकृतं जगन्नाथस्तोत्रम् का वर्णन स्कन्दपुराण (Skanda Purana) के वैष्णवखण्ड (पुरुषोत्तम महात्म्य) में मिलता है। यह स्तुति स्वयं मृत्यु के देवता यमराज (Lord Yama) ने भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannatha) के प्रति की है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, पुरी (पुरुषोत्तम क्षेत्र) में यमराज का अधिकार नहीं चलता। जो भी वहां शरीर त्यागता है, वह सीधे मोक्ष प्राप्त करता है। इससे विचलित होकर यमराज भगवान के पास गए और उनकी महिमा का गान किया, जिसे हम इस स्तोत्र के रूप में जानते हैं।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Meaning)

यमराज ने इस स्तोत्र में भगवान के विराट स्वरूप और उनकी करुणा का अद्भुत चित्रण किया है:
  • सृष्टि का आधार: श्लोक १६ और १७ में कहा गया है—"त्वयि प्रोतमिदं सर्वं सूत्रे मणिगणा यथा"। जैसे धागे में मोती पिरोए होते हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड भगवान जगन्नाथ में पिरोया हुआ है।
  • नीलाचल निवास: श्लोक २५ और २६ में भगवान को "नीलमेघाभं" (नीले बादलों के समान आभा वाले) और "नीलाचलगुहावासं" (नीलाचल की गुफा में निवास करने वाले) कहा गया है। यह पुरी के मुख्य विग्रह का सीधा संदर्भ है।
  • लक्ष्मी नित्य निवास: ३०वें श्लोक में कहा गया है—"लक्ष्मीशोरसि नित्यस्था"। भगवान के वक्षस्थल पर माता लक्ष्मी नित्य निवास करती हैं, जो भक्तों के लिए समृद्धि और कल्याण सुनिश्चित करती हैं।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

स्कन्दपुराण के अनुसार, इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित लाभ होते हैं:
  • यम-भय से मुक्ति (Protection from Death): चूंकि यह स्तुति स्वयं यमराज ने की है, इसका पाठ करने वाले को अकाल मृत्यु और यमदूतों का भय नहीं रहता।
  • पाप नाश (Cleansing of Sins): २६वें श्लोक में भगवान को "प्रणताशेषपापौघदारिणं" (शरणागत के समस्त पाप समूहों को नष्ट करने वाले) कहा गया है।
  • भव-ताप निवारण: २१वें श्लोक में उन्हें "भवसन्तापनीहारभानवे" कहा गया है—संसार के दुखों रूपी कोहरे को मिटाने वाले सूर्य।

पाठ करने की विधि और शुभ समय

  • जगन्नाथ यात्रा: यदि आप जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर जा रहे हैं, तो वहां मंदिर में प्रवेश करने से पहले इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करें।
  • एकादशी और शनिवार: इन दिनों में भगवान विष्णु की पूजा के बाद इसका पाठ करें।
  • स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र पहनकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी का मानसिक ध्यान करें।