विप्रकृत हनुमत् स्तोत्रम् (स्कन्दपुराण)

॥ विप्रैः कृतं हनुमत्स्तोत्रम् ॥
स्कन्दपुराणे ब्रह्मखण्डे धर्मारण्यखण्डे (Skanda Purana)
नमः श्रीरामभक्ताय अक्षविध्वंसनाय च । नमो रक्षःपुरीदाहकारिणे वज्रधारिणे ॥ ३॥ जानकीहृदयत्राणकारिणे करुणात्मने । सीताविरहतप्तस्य श्रीरामस्य प्रियाय च ॥ ४॥ नमोऽस्तु ते महावीर रक्षास्मान्मज्जतः क्षितौ । नमो ब्राह्मणदेवाय वायुपुत्राय ते नमः ॥ ५॥ नमोऽस्तु रामभक्ताय गोब्राह्मणहिताय च । नमोऽस्तु रुद्ररूपाय कृष्णवक्त्राय ते नमः ॥ ६॥ अञ्जनिसूनवे नित्यं सर्वव्याधिहराय च । नागयज्ञोपवीताय प्रबलाय नमोऽस्तु ते ॥ ७॥ स्वयं समुद्रतीर्णाय सेतुबन्धनकारिणे ॥ ८॥ ॥ इति स्कन्दपुराणे ब्रह्मखण्डे धर्मारण्यखण्डे सप्तत्रिंशाध्यायान्तर्गतं विप्रैः कृतं हनुमत्स्तोत्रं समाप्तम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
विप्रकृत हनुमत् स्तोत्रम् (Viprakrita Hanumat Stotram) एक दुर्लभ और शक्तिशाली स्तुति है जो स्कन्दपुराण (Skanda Purana) के ब्रह्मखण्ड के अंतर्गत धर्मारण्यखण्ड (अध्याय 37) में वर्णित है। 'विप्र' का अर्थ होता है 'ब्राह्मण'। यह स्तोत्र विप्रों द्वारा भगवान हनुमान की उस समय की गई स्तुति है, जब वे रक्षा और कल्याण की कामना कर रहे थे। इस स्तोत्र में हनुमान जी को विशेष रूप से 'ब्राह्मणदेव' (ब्राह्मणों के देवता) और 'गोब्राह्मणहित' (गायों और ब्राह्मणों का हित करने वाले) कहकर संबोधित किया गया है, जो धर्म और संस्कृति के रक्षक के रूप में उनकी भूमिका को रेखांकित करता है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
इस लघु स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में हनुमान जी के विभिन्न दिव्य स्वरूपों का वर्णन है:
- अक्षविध्वंसक और लंकादाहक: श्लोक 3 में उन्हें रावण पुत्र 'अक्षकुमार' का वध करने वाला ("अक्षविध्वंसनाय") और 'रक्षःपुरी' (लंका) को जलाने वाला कहा गया है। यह उनकी असीम शक्ति और शत्रुओं के नाश (enemy destruction) की क्षमता को दर्शाता है।
- जानकी के रक्षक और रामप्रिय: वे माता जानकी के हृदय को सांत्वना ("जानकीहृदयत्राणकारिणे") देने वाले और विरह-तप्त श्री राम के अत्यंत प्रिय हैं। यह उनकी भक्ति और करुणा (compassion) का प्रतीक है।
- रुद्ररूप और कृष्णवक्त्र: श्लोक 6 में उन्हें 'रुद्ररूप' (भगवान शिव का अवतार) और 'कृष्णवक्त्र' (काले मुख वाले वानर रूप में) कहा गया है। यह उनके शिव अंश होने की पुष्टि करता है।
- नागयज्ञोपवीत: श्लोक 7 में उनका वर्णन "नागयज्ञोपवीताय" (सांपों का जनेऊ धारण करने वाले) के रूप में किया गया है, जो उनकी अलौकिक शक्तियों और निर्भीकता को दर्शाता है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
शास्त्रों के अनुसार, इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- सर्वव्याधि निवारण (Cure for All Diseases): श्लोक 7 में स्पष्ट रूप से कहा गया है—"सर्वव्याधिहराय च" (सभी रोगों को हरने वाले)। यह स्तोत्र विशेष रूप से गंभीर बीमारियों और शारीरिक कष्टों से मुक्ति के लिए अत्यंत प्रभावी है।
- संकट से रक्षा (Protection from Crisis): "रक्षास्मान्मज्जतः क्षितौ"—जैसे डूबते हुए को बचाया जाता है, वैसे ही यह स्तोत्र जीवन की कठिनाइयों और सांसारिक दुखों में डूबते हुए भक्त की रक्षा (protection) करता है।
- बल और शक्ति (Strength): हनुमान जी को "प्रबलाय" (अत्यंत बलशाली) और "महावीर" कहा गया है। इसका पाठ साधक को मानसिक और शारीरिक बल प्रदान करता है।
- पाप नाश: रुद्ररूप होने के कारण, उनका स्मरण पापों और अज्ञान रूपी अंधकार ("तमः") का नाश करता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- शुभ दिन: मंगलवार (Tuesday) और शनिवार (Saturday) को इस स्तोत्र का पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
- रोग निवारण हेतु: यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से बीमार है, तो उसके सिरहाने बैठकर इस स्तोत्र का 11 या 21 बार पाठ करें और हनुमान जी को तुलसी दल अर्पित करें।
- सामान्य पूजा: नित्य पूजा में इसे एक बार पढ़ने से घर में सुख-शांति और सुरक्षा बनी रहती है।
- सामग्री: पाठ से पूर्व हनुमान जी को सिंदूर, लाल फूल और गुड़-चने का भोग लगाना शुभ माना जाता है।