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वेदव्यासप्रोक्तं गणपतिस्तोत्रम्

वेदव्यासप्रोक्तं गणपतिस्तोत्रम्

व्यास उवाच ।

पुनरन्यत्प्रवक्ष्यामि स्तोत्रं गणाधिपस्य च । सर्वसिद्धिकरं पूतं सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥ १॥

गणाष्टकम्

एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम् । लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ २॥ मुञ्जकृष्णाजिनधरं नागयज्ञोपवीतकम् । बालेन्दुकलिकामौलिं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ३॥ सर्वविघ्नहरं देवं सर्वविघ्नविवर्जितं मूषकोत्तममारुह्य देवासुरमहाहवे । योद्धुकामं महाबाहुं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ४॥ अम्बिकाहृदयानन्दं मातृकापरिवेष्टितम् । भक्तप्रियं मदोन्मत्तं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ५॥ चित्ररत्नविचित्राङ्गं चित्रमालाविभूषणम् । कामरूपधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ६॥ गजवक्रं सुरश्रेष्ठं चारुकर्णविभूषितम् । पाशाङ्कुशधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ७॥ यक्षकिन्नरगन्धर्वैः सिद्धविद्याधरैस्सदा । स्तूयमानं महादेहं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ८॥

फलश्रुतिः

गणाष्टकमिदं पुण्यं भक्तितो यः पठेन्नरः । सर्वसिद्धिमवाप्नोति रुद्रलोके महीयते ॥ ९॥ न निःस्वतां तथाभ्येति सप्तजन्मसु मानवः । य इदं पठते नित्यं महाराजो भवेन्नरः ॥ १०॥ वश्यं करोति त्रैलोक्यं पठनाच्छ्रवणादपि । स्तोत्रं परं महापुण्यं गणपस्य महात्मनः ॥ ११॥ ॥ इति श्रीपाद्मपुराणे सृष्टिखण्डे चतुष्षष्टितमाध्यायान्तर्गतं वेदव्यासकृतं गणपतिस्तोत्रं समाप्तम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

वेदव्यासप्रोक्तं गणपतिस्तोत्रम्, पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड (अध्याय ६४) में वर्णित एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तुति है। इसका महत्व इस तथ्य से कई गुना बढ़ जाता है कि इसके रचयिता स्वयं महर्षि वेदव्यास हैं, जिन्हें वेदों का विभाजक, महाभारत और पुराणों का रचयिता तथा भगवान विष्णु का अंशावतार माना जाता है। जब स्वयं व्यासजी जैसे त्रिकालदर्शी महापुरुष किसी देवता की स्तुति करते हैं, तो यह उस देवता की सर्वोच्च महिमा को प्रमाणित करता है। यह स्तोत्र "गणाष्टकम्" (आठ श्लोकों का समूह) के रूप में भी जाना जाता है और इसकी फलश्रुति में अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली वरदानों का वचन दिया गया है, जो इसे भक्तों के लिए एक अमूल्य निधि बनाता है।

पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)

पद्म पुराण में, जब विभिन्न देवताओं की महिमा और उनके स्तोत्रों का वर्णन किया जा रहा था, तब महर्षि वेदव्यास ने इस गणपति स्तोत्र को प्रकट किया। उन्होंने कहा, "मैं अब गणाधिपति के उस स्तोत्र का वर्णन करूंगा जो सभी सिद्धियों को देने वाला, पवित्र और सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला है (सर्वाभीष्टफलप्रदम्)।" यह संदर्भ महत्वपूर्ण है क्योंकि महाभारत की रचना के समय, वेदव्यास को एक ऐसे लेखक की आवश्यकता थी जो उनके विचारों की गति के साथ लिख सके। तब ब्रह्मा जी के कहने पर, भगवान गणेश इस कार्य के लिए सहमत हुए। इस घटना से पहले ही व्यास जी गणेश की महिमा से परिचित थे। यह स्तोत्र उसी ज्ञान और श्रद्धा का परिणाम है, जिसमें व्यास जी ने गणेश के उस स्वरूप का ध्यान किया है जो ज्ञान, बुद्धि और लेखन का अधिपति है, और जो सभी विघ्नों को दूर कर सकता है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

यह गणाष्टक भगवान गणेश के भव्य और शक्तिशाली स्वरूप का वर्णन करता है:
  • तप्त स्वर्ण के समान देह (Body like Molten Gold): "एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम्" - उनका शरीर तपाए हुए सोने के समान देदीप्यमान है। यह उनके तेज, पवित्रता और दिव्य प्रकाश का प्रतीक है।
  • नाग का यज्ञोपवीत (Serpent as the Sacred Thread): "नागयज्ञोपवीतकम्" - उनका नाग का यज्ञोपवीत धारण करना दर्शाता है कि वे कुंडलिनी शक्ति और सभी योगिक ऊर्जाओं के स्वामी हैं।
  • बालचंद्र का मुकुट (Crescent Moon on the Head): "बालेन्दुकलिकामौलिं" - उनके मस्तक पर बालचंद्र का होना उन्हें भगवान शिव के समान ही कल्याणकारी और ज्ञान का स्रोत सिद्ध करता है।
  • देवताओं और असुरों के युद्ध में योद्धा (A Warrior in the battle of Gods and Demons): "देवासुरमहाहवे। योद्धुकामं महाबाहुं" - वे देवताओं और असुरों के महायुद्ध में भी युद्ध करने की इच्छा रखते हैं, जो उनके केवल शांत विघ्नहर्ता स्वरूप से परे, उनके वीर और शक्तिशाली योद्धा स्वरूप को भी दर्शाता है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

इस स्तोत्र की फलश्रुति अत्यंत दुर्लभ और प्रभावशाली है:
  • सर्व-सिद्धि और रुद्रलोक की प्राप्ति (Attainment of All Siddhis and Rudraloka): "सर्वसिद्धिमवाप्नोति रुद्रलोके महीयते" - जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, वह सभी सिद्धियों को प्राप्त करता है और रुद्रलोक में सम्मान पाता है।
  • सात जन्मों तक दरिद्रता का नाश (Removal of Poverty for Seven Births): "न निःस्वतां तथाभ्येति सप्तजन्मसु मानवः" - इसका नित्य पाठ करने वाला मनुष्य सात जन्मों तक कभी भी दरिद्रता (poverty) को प्राप्त नहीं होता।
  • राज-सुख की प्राप्ति (Attainment of Kingly Comforts): "य इदं पठते नित्यं महाराजो भवेन्नरः" - जो इसका नित्य पाठ करता है, वह एक महान राजा के समान जीवन व्यतीत करता है।
  • त्रिलोक को वश में करने की क्षमता (Ability to Influence the Three Worlds): "वश्यं करोति त्रैलोक्यं पठनाच्छ्रवणादपि" - इस महापुण्यशाली स्तोत्र को पढ़ने या सुनने मात्र से व्यक्ति तीनों लोकों को अपने वश में करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • यह स्तोत्र एक 'गणाष्टक' है, इसलिए इसका पाठ विशेष रूप से किसी भी कार्य के प्रारंभ में 8 बार करना अत्यंत शुभ होता है।
  • बुधवार और संकष्टी/विनायक चतुर्थी के दिन इसका पाठ करने से विशेष फल मिलता है।
  • विद्यार्थियों, लेखकों, और ज्ञान से जुड़े किसी भी कार्य को करने वाले व्यक्तियों के लिए यह स्तोत्र एक वरदान है, क्योंकि इसके रचयिता स्वयं ज्ञान के भंडार, वेदव्यास हैं।
  • जो लोग दरिद्रता, आर्थिक संकट या जीवन में बार-बार असफलता का सामना कर रहे हैं, उन्हें इस स्तोत्र का नित्य पाठ करना चाहिए।