नरनारायण स्तोत्रम्

वसन्तकामाप्सरस ऊचुः
प्रसीदतु जगद्धाता यस्य देवस्य मायया । मोहिताः स्म विजानीमो नान्तरं विद्यते द्वयोः ॥ ४६॥प्रसीदतु स वां देवो यस्य रूपमिदं द्विधा । धामभूतस्य लोकानामनादेरप्रतिष्ठतः ॥ ४७॥
नरनारायणौ देवौ शङ्खचक्रायुधावुभौ । आस्तां प्रसादसुमुखावस्माकमपराधिनाम् ॥ ४८॥
निधानं सर्वविद्यानां सर्वपापवनानलः । नारायणोऽतो भगवान् सर्वपापं व्यपोहतु ॥ ४९॥
शार्ङ्गचिह्नायुधः श्रीमानात्मज्ञानमयोऽनघः । नरः समस्तपापानि हतात्मा सर्वदेहिनाम् ॥ ५०॥
जटाकलापबद्धोऽयमनयोर्नः क्षमावतोः । सौम्यास्यदृष्टिः पापानि हन्तुं जन्मार्जितानि वै ॥ ५१॥
तथाऽऽत्मविद्यादोषेण योऽपराधः कृतो महान् । त्रैलोक्यवन्द्यौ यौ नाथौ विलोभयितुमागताः ॥ ५२॥
प्रसीद देव विज्ञानघन मूढदृशामिव । भवन्ति सन्तः सततं स्वधर्मपरिपालकाः ॥ ५३॥
दृष्ट्वैतन्नः समुत्पन्नं यथा स्त्रीरत्नमुत्तमम् । त्वयि नारायणोत्पन्ना श्रेष्ठा पारवती मतिः ॥ ५४॥
तेन सत्येन सत्यात्मन्परमात्मन्सनातन । नारायण प्रसीदेश सर्वलोकपरायण ॥ ५५॥
प्रसन्नबुद्धे शान्तात्मन्प्रसन्नवदनेक्षण । प्रसीद योगिनामीश नर सर्वगताच्युत ॥ ५६॥
नमस्यामो नरं देवं तथा नारायणं हरिम् । नमो नराय नम्याय नमो नारायणाय च ॥ ५७॥
प्रसन्नानामनाथानां तथा नाथवतां प्रभो । शं करोतु नरोऽस्माकं शं नारायण देहि नः ॥ ५८॥
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे द्विनवत्यधिकशततमाध्यायान्तर्गतं वसन्तकामाप्सरसकृतं नरनारायणस्तोत्रं समाप्तम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और पौराणिक कथा
वसन्तकामाप्सरसकृतं नरनारायणस्तोत्रम् का वर्णन स्कन्दपुराण (Skanda Purana) के आवन्त्यखण्ड (रेवाखण्ड) में मिलता है। यह स्तोत्र एक अत्यंत नाटकीय और आध्यात्मिक घटना से जुड़ा है। जब भगवान विष्णु के अंशावतार नर और नारायण (Nara and Narayana) बदरिकाश्रम में घोर तपस्या कर रहे थे, तब देवराज इंद्र को अपना आसन डोलता हुआ प्रतीत हुआ। उन्होंने ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव (Kama), वसंत (Spring season) और सुंदर अप्सराओं (Apsaras) को भेजा।
उन्होंने अपनी कलाओं से वातावरण को मोहक बना दिया, किंतु भगवान नारायण तनिक भी विचलित नहीं हुए। उल्टे, उन्होंने अपनी जांघ (thigh) से अप्सराओं से भी अधिक सुंदर स्त्री 'उर्वशी' को उत्पन्न कर दिया। यह देखकर कामदेव और अप्सराएं लज्जित और भयभीत हो गए। अपने अपराध के लिए क्षमा याचना (Seek forgiveness) करते हुए उन्होंने यह स्तोत्र गाया।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Meaning)
इस स्तोत्र में द्वैत और अद्वैत, तथा पाप और पुण्य का गहरा दर्शन है:
- नर-नारायण की एकता (Oneness of Nara-Narayana): श्लोक ४६ में कहा गया है—"नान्तरं विद्यते द्वयोः" अर्थात नर और नारायण दो नहीं, बल्कि एक ही तत्व के दो रूप हैं। यह जीवात्मा और परमात्मा के अभेद संबंध को दर्शाता है।
- पाप नाशक (Destroyer of Sins): नारायण को 'सर्वपापवनानलः' (सभी पापों रूपी वन को जलाने वाली अग्नि) और नर को 'आत्मज्ञानमय' (Embodiment of Self-Knowledge) कहा गया है।
- क्षमाशीलता (Forgiveness): "आस्तां प्रसादसुमुखावस्माकमपराधिनाम्" (श्लोक ४८) - यहाँ कामदेव और अप्सराएं स्वयं को अपराधी स्वीकार करते हुए प्रभु से प्रसन्नमुख होने की प्रार्थना करते हैं। यह अहंकार के समर्पण का प्रतीक है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)
इस स्तोत्र के पाठ से भक्तों को निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- इन्द्रिय निग्रह (Control over Senses): चूंकि यह स्तोत्र कामदेव की हार के बाद गाया गया था, इसका पाठ साधक को काम, क्रोध और लोभ जैसे विकारों पर विजय प्राप्त करने में सहायता करता है।
- अपराध क्षमा (Forgiveness of Sins): अनजाने में किए गए पापों और ईश्वरीय अपराधों से मुक्ति पाने के लिए यह स्तोत्र अमोघ है।
- मानसिक शांति (Mental Peace): "शं करोतु नरोऽस्माकं" (श्लोक ५८) - अंतिम श्लोक में स्पष्ट रूप से 'शं' (कल्याण और शांति) की याचना की गई है। यह मन को शांत और स्थिर करता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय
- बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) की यात्रा के दौरान इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
- घर पर एकादशी (Ekadashi) या गुरुवार (Thursday) के दिन भगवान विष्णु के चित्र के सामने तुलसी दल अर्पित कर इसका पाठ करें।
- यदि मन अशांत हो या किसी गलती का पश्चाताप हो रहा हो, तो इस स्तोत्र का ३ या ११ बार पाठ करने से आत्मग्लानि दूर होती है।