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त्वमेव ब्रूहि स्तोत्रम्

त्वमेव ब्रूहि स्तोत्रम्

त्वमेव ब्रूहिस्तोत्रम्

श्री गणेशाय नमः । आसीद्धराधामललामरूपो नासीदहो कस्य गुरुर्गरीयान् । देशः स एवाद्य त्वदीयप्रेयान् हेयानधस्तिष्ठति सर्वदेशात् ॥ १॥ अभूदयोध्या भवदीयमेध्या पुरी पुरा देवपुरादपीह । म्लेच्छैरुपेतामवलोक्यते तां नो दूयते किं वद चारु चेतः ॥ २॥ पुरा सुराक्रान्तवसुन्धराया व्यथा त्वया किं न निराकृता सा । तत्ते बलं क्वास्ति खरः शरो वा गोघातिनो हन्त कथं न हन्सि ॥ ३॥ मन्ये महापापकलापकारी चेद्रावणो हन्त हतस्त्वयैव । किं तद्विधानद्य न पश्यसीह यद्वा त्वमस्माकमिवासि भीतः ॥ ४॥ सीतातिमीता दशकन्धरेण वीता त्वया शान्तिमितो न भेदः । नानाबला हाद्य खला हरन्ति नायांसि कारुण्यमितोऽस्ति खेदः ॥ ५॥ नोचेद् दयाघन दयामधुना करोषि सन् दीनबन्धुरपि निष्ठुरतां तनोऽसि । कस्यान्तिकं व्रजतु भारतमेतदद्य लोकाभिराम घनश्याम त्वमेव ब्रूहि ॥ ६॥ ॥ इति श्रीराजमणिशर्मकृतं त्वमेवब्रूहिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और उद्गम

त्वमेव ब्रूहि स्तोत्रम् (Tvameva Bruhi Stotram) श्री राजमणि शर्मा द्वारा रचित एक आधुनिक संस्कृत रचना है। यह पारंपरिक स्तोत्रों से भिन्न है, क्योंकि इसमें केवल स्तुति नहीं, बल्कि भगवान राम (Lord Rama) से एक करुण पुकार (compassionate plea) और प्रश्न भी है। कवि भारतवर्ष की दुर्दशा और अयोध्या की पवित्रता पर हुए आघात से व्यथित होकर भगवान से पूछते हैं, "हे प्रभु! आप ही कहिए (त्वमेव ब्रूहि), आप अब मौन क्यों हैं?" यह स्तोत्र राष्ट्र भक्ति (Patriotism) और दैवीय हस्तक्षेप (Divine Intervention) का अद्भुत संगम है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Spiritual Meaning)

  • अतीत और वर्तमान का द्वंद्व: पहले श्लोक में कवि कहते हैं कि यह वही देश है जो कभी पृथ्वी का आभूषण (धराधाम ललाम) था, लेकिन आज यह दीन-हीन (wretched) स्थिति में है। यह पतन क्यों?
  • अयोध्या की पीड़ा: दूसरे श्लोक में अयोध्या का उल्लेख है, जो कभी देवपुरी से भी बढ़कर थी, लेकिन अब उसे म्लेच्छों (invaders) से घिरा देखकर क्या आपका मन (Heart) दुखी नहीं होता?
  • रावण वध का स्मरण: कवि भगवान को याद दिलाते हैं कि आपने देवताओं की रक्षा के लिए रावण का संहार किया था। क्या आज आपका वह बल, वह धनुष-बाण समाप्त हो गया है? (श्लोक 3-4)। यह एक "निंदा-स्तुति" (praise through complaint) का भाव है।
  • करुणा की याचना: अंतिम श्लोक में कवि कहते हैं, "हे घनश्याम (Ghanashyam)! यह भारत अब किसकी शरण में जाए? आप ही हमारे एकमात्र रक्षक हैं।"

फलश्रुति और लाभ (Benefits)

यद्यपि यह एक प्रार्थना गीत है, इसके पाठ से भक्त को विशेष मानसिक और आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है:
  • राष्ट्र प्रेम का जागरण (Awakening of Patriotism): यह स्तोत्र पाठक के मन में अपनी संस्कृति और धर्म के प्रति कर्तव्य बोध जगाता है।
  • संकट में धैर्य (Patience in Crisis): जब चारों ओर अधर्म और अन्याय हो, तो यह स्तोत्र भगवान पर विश्वास दृढ़ करता है कि अंततः सत्य की ही विजय होगी।
  • सामूहिक प्रार्थना की शक्ति: इसका पाठ सामूहिक रूप से करने पर समाज में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) और एकता का संचार होता है।

पाठ करने की विधि

  • भाव प्रधान: इस स्तोत्र का पाठ यांत्रिक रूप से नहीं, बल्कि अत्यंत भाव (Emotion) के साथ करना चाहिए, जैसे आप साक्षात् राम जी से बात कर रहे हों।
  • शुभ अवसर: राम नवमी, दशहरा, या किसी भी राष्ट्रीय पर्व पर इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
  • भगवान राम के चित्र के समक्ष दीपक जलाकर, देश और समाज के कल्याण की कामना (Wish for welfare) करते हुए इसे पढ़ें।