श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्रम्

।। श्री मार्कण्डेय उवाच ।।
भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम !
पूर्वमुक्तस्त्वया मन्त्रं, भैरवस्य महात्मनः ।।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि, तस्य स्तोत्रमनुत्तमं ।
तत् केनोक्तं पुरा स्तोत्रं, पठनात्तस्य किं फलम् ।।
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि, ब्रूहि मे नन्दिकेश्वर !।।
।। श्री नन्दिकेश्वर उवाच ।।
इदं ब्रह्मन् ! महा-भाग, लोकानामुपकारक !
स्तोत्रं वटुक-नाथस्य, दुर्लभं भुवन-त्रये ।।
सर्व-पाप-प्रशमनं, सर्व-सम्पत्ति-दायकम् ।
दारिद्र्य-शमनं पुंसामापदा-भय-हारकम् ।।
अष्टैश्वर्य-प्रदं नृणां, पराजय-विनाशनम् ।
महा-कान्ति-प्रदं चैव, सोम-सौन्दर्य-दायकम् ।।
महा-कीर्ति-प्रदं स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः ।
न वक्तव्यं निराचारे, हि पुत्राय च सर्वथा ।।
शुचये गुरु-भक्ताय, शुचयेऽपि तपस्विने ।
महा-भैरव-भक्ताय, सेविते निर्धनाय च ।।
निज-भक्ताय वक्तव्यमन्यथा शापमाप्नुयात् ।
स्तोत्रमेतत् भैरवस्य, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मनः ।।
श्रृणुष्व ब्रूहितो ब्रह्मन् ! सर्व-काम-प्रदायकम् ।।
विनियोगः -
ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षणभैरवस्तोत्रं मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः, श्रीस्वर्णाकर्षणभैरवदेवता,
ह्रीं बीजं, क्लीं शक्तिः, सः कीलकं,
मम दारिद्र्यनाशार्थे पाठे विनियोगः ॥
ऋष्यादिन्यासः -
ब्रह्मर्षये नमः शिरसि ।
अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे ।
स्वर्णाकर्षणभैरवाय नमः हृदि ।
ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये ।
क्लीं शक्तये नमः पादयोः ।
सः कीलकाय नमः नाभौ ।
विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।
ह्रां ह्रीं ह्रूं इति कर षडङ्गन्यासः ॥
कर-हृदयादिन्यासः -
ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । हृदयाय नमः ।
ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः । शिरसे स्वाहा ।
ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः । शिखायै वषट् ।
ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः । कवचाय हुम् ।
ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । अस्त्राय फट ॥
अथ ध्यानम् -
पारिजातद्रुमान्तारे स्थिते माणिक्यमण्डपे ।
सिंहासनगतं वन्दे भैरवं स्वर्णदायकम् ॥
गाङ्गेयपात्रं डमरूं त्रिशूलं वरं करैः सन्दधतं त्रिनेत्रम् ।
देव्या युतं तप्तसुवर्णवर्णं स्वर्णाकृषं भैरवमाश्रयामि ॥
मुद्रा - कमण्डलुडमरुत्रिशूलवरमुद्रा दर्शयेत् ।
मन्त्रः -
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं श्रीं आपदुद्धारणाय ह्रां ह्रीं ह्रूं
अजामलवद्धाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षणभैरवाय
मम दारिद्र्यविद्वेषणाय महाभैरवाय नमः श्रीं ह्रीं ऐम् ॥
।। स्तोत्र-पाठ ।।
ॐ नमस्तेऽस्तु भैरवाय, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मने,
नमः त्रैलोक्य-वन्द्याय, वरदाय परात्मने ।।
रत्न-सिंहासनस्थाय, दिव्याभरण-शोभिने ।
नमस्तेऽनेक-हस्ताय, ह्यनेक-शिरसे नमः ।
नमस्तेऽनेक-नेत्राय, ह्यनेक-विभवे नमः ।।
नमस्तेऽनेक-कण्ठाय, ह्यनेकान्ताय ते नमः ।
नमोस्त्वनेकैश्वर्याय, ह्यनेक-दिव्य-तेजसे ।।
अनेकायुध-युक्ताय, ह्यनेक-सुर-सेविने ।
अनेक-गुण-युक्ताय, महा-देवाय ते नमः ।।
नमो दारिद्रय-कालाय, महा-सम्पत्-प्रदायिने ।
श्रीभैरवी-प्रयुक्ताय, त्रिलोकेशाय ते नमः ।।
दिगम्बर ! नमस्तुभ्यं, दिगीशाय नमो नमः ।
नमोऽस्तु दैत्य-कालाय, पाप-कालाय ते नमः ।।
सर्वज्ञाय नमस्तुभ्यं, नमस्ते दिव्य-चक्षुषे ।
अजिताय नमस्तुभ्यं, जितामित्राय ते नमः ।।
नमस्ते रुद्र-पुत्राय, गण-नाथाय ते नमः ।
नमस्ते वीर-वीराय, महा-वीराय ते नमः ।।
नमोऽस्त्वनन्त-वीर्याय, महा-घोराय ते नमः ।
नमस्ते घोर-घोराय, विश्व-घोराय ते नमः ।।
नमः उग्राय शान्ताय, भक्तेभ्यः शान्ति-दायिने ।
गुरवे सर्व-लोकानां, नमः प्रणव-रुपिणे ।।
नमस्ते वाग्-भवाख्याय, दीर्घ-कामाय ते नमः ।
नमस्ते काम-राजाय, योषित्कामाय ते नमः ।।
दीर्घ-माया-स्वरुपाय, महा-माया-पते नमः ।
सृष्टि-माया-स्वरुपाय, विसर्गाय सम्यायिने ।।
रुद्र-लोकेश-पूज्याय, ह्यापदुद्धारणाय च ।
नमोऽजामल-बद्धाय, सुवर्णाकर्षणाय ते ।।
नमो नमो भैरवाय, महा-दारिद्रय-नाशिने ।
उन्मूलन-कर्मठाय, ह्यलक्ष्म्या सर्वदा नमः ।।
नमो लोक-त्रेशाय, स्वानन्द-निहिताय ते ।
नमः श्रीबीज-रुपाय, सर्व-काम-प्रदायिने ।।
नमो महा-भैरवाय, श्रीरुपाय नमो नमः ।
धनाध्यक्ष ! नमस्तुभ्यं, शरण्याय नमो नमः ।।
नमः प्रसन्न-रुपाय, ह्यादि-देवाय ते नमः ।
नमस्ते मन्त्र-रुपाय, नमस्ते रत्न-रुपिणे ।।
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, सुवर्णाय नमो नमः ।
नमः सुवर्ण-वर्णा य, महा-पुण्याय ते नमः ।।
नमः शुद्धाय बुद्धाय, नमः संसार-तारिणे ।
नमो देवाय गुह्याय, प्रबलाय नमो नमः ।।
नमस्ते देवाय गुह्याय, प्रबalaय नमो नमः ।।
नमस्ते बल-रुपाय, परेषां बल-नाशिने ।
नमस्ते स्वर्ग-संस्थाय, नमो भूर्लोक-वासाय ।।
नमः पाताल-वासाय, निराधाराय ते नमः ।
नमो नमः स्वतन्त्राय, ह्यनन्ताय नमो नमः ।।
द्वि-भुजाय नमस्तुभ्यं, भुज-त्रय-सुशोभिने ।
नमोऽणिमादि-सिद्धाय, स्वर्ण-हस्ताय ते नमः ।।
पूर्ण-चन्द्र-प्रतीकाश-वदनाम्भोज-शोभिने ।
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, स्वर्णालंकार-शोभिने ।।
नमः स्वर्णाकर्षणाय, स्वर्णाभाय च ते नमः ।
नमस्ते स्वर्ण-कण्ठाय, स्वर्णालंकार-धारिणे ।।
स्वर्ण-सिंहासनस्थाय, स्वर्ण-पादाय ते नमः ।
नमः स्वर्णाभ-पाराय, स्वर्ण-काञ्ची-सुशोभिने ।।
नमस्ते स्वर्ण-जंघाय, भक्त-काम-दुघात्मने ।
नमस्ते स्वर्ण-भक्तानां, कल्प-वृक्ष-स्वरुपिणे ।।
चिन्तामणि-स्वरुपाय, नमो ब्रह्मादि-सेविने ।
कल्पद्रुमाधः-संस्थाय, बहु-स्वर्ण-प्रदायिने ।।
भय-कालाय भक्तेभ्यः, सर्वाभीष्ट-प्रदायिने ।
नमो हेमादि-कर्षाय, भैरवाय नमो नमः ।।
स्तवेनानेन सन्तुष्टो, भव लोकेश-भैरव !
पश्य मां करुणाविष्ट, शरणागत-वत्सल !
श्रीभैरव धनाध्यक्ष, शरणं त्वां भजाम्यहम् ।
प्रसीद सकलान् कामान्, प्रयच्छ मम सर्वदा ।।
।। फल-श्रुति ।।
श्रीमहा-भैरवस्येदं, स्तोत्र सूक्तं सु-दुर्लभम् ।
मन्त्रात्मकं महा-पुण्यं, सर्वैश्वर्य-प्रदायकम् ।।
यः पठेन्नित्यमेकाग्रं, पातकैः स विमुच्यते ।
लभते चामला-लक्ष्मीमष्टैश्वर्यमवाप्नुयात् ।।
चिन्तामणिमवाप्नोति, धेनुं कल्पतरुं ध्रुवम् ।
स्वर्ण-राशिमवाप्नोति, सिद्धिमेव स मानवः ।।
संध्याय यः पठेत्स्तोत्र, दशावृत्त्या नरोत्तमैः ।
स्वप्ने श्रीभैरवस्तस्य, साक्षाद् भूतो जगद्-गुरुः ।
स्वर्ण-राशि ददात्येव, तत्क्षणान्नास्ति संशयः ।
सर्वदा यः पठेत् स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः ।।
लोक-त्रयं वशी कुर्यात्, अचलां श्रियं चाप्नुयात् ।
न भयं लभते क्वापि, विघ्न-भूतादि-सम्भव ।।
म्रियन्ते शत्रवोऽवश्यम लक्ष्मी-नाशमाप्नुयात् ।
अक्षयं लभते सौख्यं, सर्वदा मानवोत्तमः ।।
अष्ट-पञ्चाशताणढ्यो, मन्त्र-राजः प्रकीर्तितः ।
दारिद्र्य-दुःख-शमनं, स्वर्णाकर्षण-कारकः ।।
य येन संजपेत् धीमान्, स्तोत्र वा प्रपठेत् सदा ।
महा-भैरव-सायुज्यं, स्वान्त-काले भवेद् ध्रुवं ।।
मूल-मन्त्रः-
“ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं सः वं आपदुद्धारणाय अजामल-बद्धाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण-भैरवाय मम
दारिद्र्य-विद्वेषणाय श्रीं महा-भैरवाय नमः ।
संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र का महत्व (Significance of Swarna Akarshan Bhairav Stotra)
स्वर्णाकर्षण भैरव भगवान शिव का वह सात्विक स्वरूप है जो दरिद्रता का नाश कर धन, समृद्धि और वैभव प्रदान करता है। 'स्वर्ण' का अर्थ है सोना और 'आकर्षण' का अर्थ है खींचना। इस स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में धन और अवसरों का आकर्षण बढ़ता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो कर्ज (Debt), व्यापार में घाटा, या आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहे हैं। यह साधक को न केवल भौतिक सुख देता है, बल्कि 'अक्षय पत्र' की तरह उसके जीवन को कभी खाली नहीं होने देता।
स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र की उत्पत्ति (Origin of Swarna Akarshan Bhairav Stotra)
श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र, प्राचीन रुद्रयामल तन्त्र (Rudrayamala Tantra) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह स्तोत्र भगवान शिव और माता पार्वती के बीच हुए संवाद के रूप में प्रकट हुआ है, जहाँ भगवान शिव ने दरिद्रता निवारण और अष्ट-लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस गुप्त विद्या का ज्ञान दिया था। इसे 'आपदुद्धारक' भी माना जाता है क्योंकि यह जीवन के घोर संकटों और आर्थिक आपदाओं से साधक की रक्षा करता है।
स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र का अर्थ (Meaning of Stotra)
इस स्तोत्र में भगवान भैरव की स्तुति 'ब्रह्मा-विष्णु-शिवात्मने' (त्रिदेवों के स्वरूप) के रूप में की गई है। वे 'त्रैलोक्य-वन्द्याय' (तीनों लोकों में पूजनीय) और 'वरुणाय' (जल के देवता, जो जीवन का आधार हैं) हैं। स्तोत्र में भक्त प्रार्थना करता है कि हे महेश्वर! आप मेरे घर में स्थिर रूप से निवास करें और मेरी दरिद्रता का नाश कर मुझे स्वर्ण और धान की समृद्धि प्रदान करें। 'देहि देहि' का बार-बार उच्चारण अत्यंत प्रभावशाली है, जो ब्रह्मांड से प्रचुरता (Abundance) को आकर्षित करने का कार्य करता है।
स्तोत्र पाठ के लाभ (Benefits of Recitation)
श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र के पाठ के प्रमुख लाभ:
- कर्ज मुक्ति: पुराने से पुराना कर्ज उतरने के रास्ते खुलते हैं।
- धन प्राप्ति: ये 'वित्तश' (धन के स्वामी) हैं, अतः आय के नए स्रोत बनते हैं।
- स्थिर लक्ष्मी: धन-धान्य घर में 'स्थिर' रहता है, यानी अनावश्यक खर्च रुकते हैं।
- व्यापार वृदधि: रुका हुआ व्यवसाय फिर से गति पकड़ता है।
- दरिद्रता नाश: घर से नकारात्मकता और अभाव (Scarcity) की ऊर्जा दूर होती है।
पाठ विधि (Method of Recitation)
- शुभ दिन: शुक्रवार (Friday) या रविवार की रात।
- वस्त्र: पीले वस्त्र धारण करें।
- दिशा: उत्तर दिशा (North) की ओर मुख करके बैठें।
- दीपक: सरसों के तेल का दीपक जलाएं। हो सके तो दीपक में थोड़े काले तिल डालें।
- नैवेद्य: दूध की मिठाई या गुड़ का भोग लगाएं।
- यंत्र: यदि स्वर्ण आकर्षण भैरव यंत्र उपलब्ध हो, तो उसके सामने पाठ करना अति उत्तम है।