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स्वर्णाकर्षणभैरव मन्त्रमय स्तोत्रम्

स्वर्णाकर्षणभैरव मन्त्रमय स्तोत्रम्
ब्रह्मा यस्य ऋषि स्वयं निगदितश्छन्दो मतं त्रैष्टुभं, स्वर्णाकर्षण-भैरवो हरिहरब्रह्मात्मको देवता । ह्रीं बीजं भृगुशक्तिरित्यभिहितं तस्यैव सूत्रात्मनः, स्तोत्रं ध्यान पुरस्सरं मनुमयं ब्रूमो वयं प्रत्यहम् ॥ १॥ मन्दारद्रुममूलपूजितमहामाणिक्य-सिंहासने, संविष्टो दरभिन्न चम्पकरुचा देव्या समालिङ्गितः । भक्तेभ्यो वररत्न पात्र भरितं स्वर्णं ददानोऽनिशं, स्वर्णाकर्षण-भैरवो विजयते स्वर्गापवर्गप्रदः ॥ २॥ ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूमिति व्याहरन् यो भक्तः स्वर्णाकर्षणम् । कारुण्याब्धिः कल्पमूलाधिवासः स्वर्णाकर्षो भैरवो मेऽस्तु भूत्यै ॥ ३॥ ह्रां ह्रीं हूं सः सन्ततं जापकानां वर्षन्तं तं स्वर्णवृष्टिं समग्राम् । अन्तः स्वान्तं सूर्यकोटिप्रकाशं स्वर्णाकर्षं भैरवं भावयामि ॥ ४॥ मरकतमणिपात्रे सम्भृतं स्वर्णपूर्णं कृपणतरजनेभ्यस्तारतः सम्प्रदातुः । कुरु हृदय सपर्यां सेवमानाय नित्यं सुरवरमनुजेन्द्र स्यापदुद्धारणाय ॥ ५॥ नमोऽजामलबद्धाय ब्रह्मसूत्राधिवाससे । स्वर्णाकर्षण-शीलाय साधकानां कृतात्मने ॥ ६॥ लोकेश्वराद्यर्चित-पादुकाय दारिद्र्यनिर्मूलनकारणाय । स्वर्णादि दानकरणोद्यत भैरवाय कारुण्यवारान्निधये नमस्ते ॥ ७॥ दीनानाथ विपन्नरक्षणपरै राज्यप्रतीक्षापरैः सिद्धैः साध्यगणैः सुरासुरगणैर्भुक्तिप्रयुक्तात्मभिः । मूले कल्पतरोर्महामणिमये मार्तण्ड-तेजोजुषे स्वर्णाकर्षणभैरवाय सततं कुर्मो नमस्यां वयम् ॥ ८॥ स्वर्णाकर्षि-स्वर्णदेव्याश्रिताय स्वर्णारूढोदार-सिंहासनाय । कुर्मो नित्यं स्वर्णदात्रे नमस्यां दारिद्र्यद्वेषि श्रीमते भैरवाय ॥ ९॥ स्वर्णप्रदानाध्वर-दीक्षिताय स्वतेजसाक्रान्त-जगत्त्रयाय । औदार्य-सम्पत्-सदनाय नित्यं, ॐ श्रीमहाभैरव ! ते नमोऽस्तु ॥ १०॥ चिन्तामणिस्थित-महानिधि-कामधेनु- मन्दारमूल-मणिमण्डप-मध्यगाय । स्वर्ण-प्रदान-निरताय सदा सपर्यां, कुर्मो वयं त्रिकरणैः परभैरवाय ॥ ११॥ मूले कल्पतरोः प्रभा-परिमले भद्रासने संस्थितो, हस्ताम्भोरुह-रत्नपात्रभरितैः कार्तस्वरैर्भास्वरैः । निर्मूलीकृत-दुर्गतो विरचयन् विद्युद्दिनेशद्युतिः, स्वर्णाकर्षण-भैरवो भवतु नो दारिद्र्य-विद्वेषणः ॥ १२॥ दुग्धाद्याराध्य स्वर्णाकृति कनकमये द्वीपवर्ये सुधाब्धौ, कापित्थे तत्र रम्ये मणिमयविलसद् भित्ति-पाश्चात्य भागे । यद्वत्तं सर्ववाञ्छाधिकवसुनिचयं मन्त्रिणां संसरन्तं, ध्यायेच्छ्रीभैरवं तं सकल-सुवसुदं दुःखदारिद्र्य शत्रुम् ॥ १३॥ सुवर्णमण्डपे ध्यायेत् सुवर्णरुचिभिर्युतम् । महात्मानं सुखासीनं प्रसन्नवरदायकम् ॥ १४॥ सर्वरत्न-विभूषाढ्यं सुरासुर-नमस्कृतम् । मणिहारक-सम्पूर्तिं ददतं स्वकरैः सदा ॥ १५॥ सुवर्णवृष्टिरूपैश्व धनसारैर्निरन्तरम् । दारिद्र्य-नाम-संहारं-कुण्डलोल्लास-संयुतम् ॥ १६॥ एवं ध्यात्वा महात्मानं महादारिद्र्य-नाशनम् । स्तौमि मन्दार-मूलस्थं ब्रह्मसूत्राधिवासनम् ॥ १७॥ स्वर्णसिद्धिं करैरेव ददानं स्वर्णभैरवम् । ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात् ॥ १८॥ स्वर्णादिमध्यमणिमण्डप कल्पवृक्षे, पीतारुणाम्बुजनिविष्टसुवर्णवर्णम् । माणिक्यपात्रमभयं दधतं च दोर्भ्यां, स्वर्णादिकर्षणविनोदनिधिं नमामि ॥ १९॥ सुवर्णकर्षकं नित्यं ऋणहर्तारमीश्वरम् । भजतो न ऋणं तस्य धनं शीघ्रं प्रजायते ॥ २०॥ पीतवर्णं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं पीतवाससम् । अक्षद्वयं स्वर्णमयं तडित्पूरित-पात्रकम् ॥ २१॥ अतितीक्ष्ण-महाशूलं तोमरं चामरद्वयम् । सततं चिन्तयेद् यस्तु भैरवं स्वर्णसिद्धिदम् ॥ २२॥ स्वर्णाकर्षणभैरव-मन्त्राढ्यं स्तोत्रमुत्तमम् । पठतां निधिसिद्धिश्च स्वर्णसिद्धिश्च जायते ॥ २३॥ अनेन स्तवराजेन नित्यं ब्रह्महरीश्वराः । स्वर्णाकर्षणनामानि स्तुवन्ति जगदीश्वराः ॥ २४॥ अथ फलश्रुतिः-

यः पठेत् परमं स्तोत्रमिदं नित्यं नरोत्तमः । स मर्त्यो मन्दभाग्योऽपि भैरवस्य प्रसादतः ॥ २५॥ इच्छातोऽप्यधिकां लक्ष्मीं लभते नात्र संशयः । रससिद्धिर्भवेच्छीघ्रं निधीनामधिपो भवेत् ॥ २६॥ सर्वान् कामानवाप्नोति दैवतैरपि दुर्लभम् । एतज्जपैर्महालक्ष्मीश्चञ्चलाप्यचला भवेत् ॥ २७॥ रत्नान्यश्वान् गजान् भूतीर्लभते शीघ्रमेव हि । स्वर्णराशिमवाप्नोति चाक्षयां नात्र संशयः ॥ २८॥ धेनुं चिन्तामणिं कल्पद्रुमं शीघ्रमवाप्नुयात् । नित्यमष्टोत्तरशतं यो जपेत् स्तोत्रमुत्तमम् ॥ २९॥ मण्डलार्धाच्च प्रागेव स्वर्णराशिमनुत्तमम् । सततं ध्यायते तस्मै दर्शयत्येव न संशयः ॥ ३०॥ नित्यं च त्रिपुराभक्तैः स्वर्णाकर्षणभैरवः । यत्नेन सर्वदोपास्यः सर्वकामप्रदायकः ॥ ३१॥ इति श्रीत्रिपुरासिद्धान्ते दक्षिणामूर्तिप्रोक्तं स्वर्णाकर्षणभैरवस्तोत्रं समाप्तम् ।

स्वर्णाकर्षणभैरव स्तोत्र का महत्व और परिचय (Significance and Introduction)

स्वर्णाकर्षणभैरव मन्त्रमय स्तोत्रम् शैव परंपरा में एक अत्यंत शक्तिशाली (Potent) और विशिष्ट (Specific) स्तोत्र माना जाता है। यह स्तोत्र केवल प्रशंसात्मक काव्य नहीं है, बल्कि इसमें भैरव के मूल बीज मन्त्रों (Bija Mantras) को समाहित किया गया है, जिसके कारण इसे 'मन्त्रमय' कहा जाता है। इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य साधक के जीवन से दारिद्र्य (Poverty) का पूर्णतः उन्मूलन करना और उसे स्वर्ण-सिद्धि (Gold Attainment) तथा अक्षय धन की प्राप्ति कराना है। प्रथम श्लोक में ही इसका विनियोग (Dedication) बताते हुए कहा गया है कि इसके ऋषि स्वयं ब्रह्मा हैं और देवता हरिहरब्रह्मात्मक स्वर्णाकर्षणभैरव हैं। यह स्तोत्र भौतिक समृद्धि (Bhukti) के साथ-साथ मोक्ष (Moksha) भी प्रदान करने की क्षमता रखता है, जैसा कि श्लोक 2 में 'स्वर्गापवर्गप्रदः' कहकर स्पष्ट किया गया है। यह उन साधकों के लिए वरदान है जो धर्मपूर्वक धन अर्जित कर जीवन में सुख और शांति चाहते हैं।

स्वर्णाकर्षणभैरव का दिव्य स्वरूप और ध्यान (Divine Form and Dhyanam)

स्तोत्र के कई श्लोक (विशेषकर 2, 12, 13, 19, 21) भैरव के ध्यानम् (Meditation Form) का विस्तृत वर्णन करते हैं। भैरव का यह स्वरूप अत्यंत सौम्य (Gentle) और प्रसन्न (Pleased) है, जो उन्हें अन्य उग्र भैरव रूपों से अलग करता है। उन्हें मन्दारद्रुम (कल्पवृक्ष) के नीचे, माणिक्य-सिंहासन (Jewel Throne) पर विराजमान दिखाया गया है। उनका वर्ण (Color) पीला या सुवर्ण जैसा है (पीतवर्णं, सुवर्णवर्णम्)। वे अपनी शक्ति, देवी, से आलिंगित हैं और उनके हाथों में रत्नपात्र (Jewel Vessel) है जो स्वर्ण से भरा हुआ है। वे निरंतर भक्तों को स्वर्ण दान करते रहते हैं (स्वर्णं ददानोऽनिशं)। श्लोक 21 और 22 में उन्हें चतुर्बाहु (Four-armed), त्रिनेत्र (Three-eyed), पीतवस्त्रधारी, और स्वर्ण से भरे पात्र तथा तीक्ष्ण शूल धारण किए हुए बताया गया है। यह ध्यान साधक को यह स्मरण कराता है कि भैरव ही समस्त निधि (Treasure) और सम्पत्ति (Wealth) के स्वामी हैं।

मन्त्रों का समावेश और गूढ़ार्थ (Inclusion of Mantras and Esoteric Meaning)

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसमें निहित बीज मन्त्रों (Bija Mantras) का प्रयोग है। श्लोक 3 में 'ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूमिति' जैसे शक्तिशाली मन्त्रों का स्पष्ट उल्लेख है, जो भैरव को स्वर्ण आकर्षित करने के लिए आह्वान करते हैं। इसी प्रकार, श्लोक 4 में 'ह्रां ह्रीं हूं सः' जैसे मन्त्रों का प्रयोग किया गया है, जो निरंतर जाप करने वाले साधकों के लिए स्वर्णवृष्टि (Gold Rain) सुनिश्चित करते हैं। यह मन्त्रमय संरचना स्तोत्र को केवल एक प्रार्थना से ऊपर उठाकर एक साधना पद्धति (Sadhana Method) का रूप देती है। जब साधक इन श्लोकों का पाठ करता है, तो वह न केवल भैरव की स्तुति कर रहा होता है, बल्कि उन विशिष्ट ध्वनि ऊर्जाओं (Sound Energies) को भी सक्रिय कर रहा होता है जो धन और समृद्धि को आकर्षित करने के लिए आवश्यक हैं। यह स्तोत्र तन्त्र (Tantra) और भक्ति (Devotion) का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।

स्तोत्र पाठ के विशिष्ट फल और लाभ (Specific Results and Benefits of Recitation)

स्वर्णाकर्षणभैरव स्तोत्र का पाठ करने से साधक को अनेक प्रत्यक्ष लाभ (Immediate Benefits) प्राप्त होते हैं, जिनका वर्णन फलश्रुति (Benefits section) और स्तोत्र के भीतर किया गया है। यह स्तोत्र विशेष रूप से आर्थिक समस्याओं के निवारण के लिए रचा गया है।
  • ऋण मुक्ति (Debt Freedom): श्लोक 18 और 20 स्पष्ट करते हैं कि जो साधक इसका पाठ करते हैं, उन्हें कभी ऋण नहीं होता, और यदि है तो वह शीघ्र ही समाप्त हो जाता है (ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्)।
  • दारिद्र्य नाश (Poverty Destruction): भैरव को 'दारिद्र्य-विद्वेषणः' (पूरी तरह से गरीबी से द्वेष रखने वाला) कहा गया है। यह स्तोत्र महादारिद्र्य का नाशन करता है (श्लोक 17)।
  • स्वर्ण और निधि सिद्धि (Gold and Treasure Attainment): श्लोक 23 के अनुसार, इसके पाठ से निधिसिद्धि (Treasure Attainment) और स्वर्णसिद्धि (Gold Attainment) प्राप्त होती है।
  • कल्याणकारी सहायता (Benevolent Aid): भैरव को 'सुरवरमनुजेन्द्र स्यापदुद्धारणाय' (देवताओं और मनुष्यों के संकटों को दूर करने वाला) कहा गया है, जिससे सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है।

उपासना की विधि और नित्य पाठ (Method of Worship and Daily Recitation)

इस स्तोत्र का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए नित्य पाठ (Daily Recitation) आवश्यक है। साधक को स्नान आदि से शुद्ध होकर, पीले वस्त्र धारण करके, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
  • विनियोग (Dedication): पाठ शुरू करने से पहले श्लोक 1 में दिए गए विनियोग को पढ़ना चाहिए, जिसमें ऋषि, छन्द और देवता का स्मरण किया जाता है।
  • ध्यान (Meditation): पाठ से पूर्व भैरव के स्वर्णमय, प्रसन्न और धन प्रदान करने वाले स्वरूप का गहन ध्यान (Deep Meditation) करना चाहिए (श्लोक 12-15)।
  • आराधना सामग्री (Worship Items): भैरव को पीली वस्तुएं, जैसे पीले फूल, पीला नैवेद्य (भोग) और हल्दी की माला अर्पित करना शुभ माना जाता है।
  • संकल्प (Intention): पाठ शुरू करते समय दारिद्र्य नाश और धन प्राप्ति का स्पष्ट संकल्प (Intention) लेना चाहिए। यह स्तोत्र विशेष रूप से शुक्रवार या अष्टमी तिथि को शुरू करना अत्यंत फलदायी होता है।

भैरव का औदार्य और ब्रह्मसूत्राधिवास (Bhairava's Generosity and Dwelling in Brahma Sutra)

स्वर्णाकर्षणभैरव को श्लोक 10 में 'औदार्य-सम्पत्-सदनाय' (Generosity and Wealth Abode) कहा गया है, जो उनके असीम औदार्य (Generosity) को दर्शाता है। वे केवल धन नहीं देते, बल्कि धन देने की दीक्षा (स्वर्णप्रदानाध्वर-दीक्षिताय) लेते हैं। श्लोक 6 में उन्हें 'नमोऽजामलबद्धाय ब्रह्मसूत्राधिवाससे' कहा गया है। 'ब्रह्मसूत्राधिवाससे' का अर्थ है कि वे ब्रह्मसूत्र (The fundamental text of Vedanta) में निवास करते हैं, जो दर्शाता है कि उनका यह धन-प्रदायक स्वरूप भी परम आध्यात्मिक सत्य (Spiritual Truth) से जुड़ा हुआ है। यह भैरव का वह रूप है जो साधक को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर पूर्णता प्रदान करता है। वे लोकेश्वराद्यर्चित-पादुकाय (Worshipped by Lokas and Ishwaras) हैं, जिसका अर्थ है कि सभी लोकपाल और देवता भी उनकी पादुकाओं की पूजा करते हैं, जो उनकी सर्वोच्च सत्ता को स्थापित करता है।