श्री तुलसी स्तोत्रम् (ब्रह्मवैवर्त पुराण)

श्रीभगवानुवाच ।
वृन्दारूपाश्च वृक्षाश्च यदैकत्र भवन्ति च । विदुर्बुधास्तेन वृन्दां मत्प्रियां तां भजा म्यहम् ॥ १८॥ पुरा बभूव या देवी ह्यादौ वृन्दावने वने । तेन वृन्दावनी ख्याता तां सौभाग्यां भजाम्यहम् ॥ १९॥ असङ्ख्येषु च विश्वेषु पूजिता या निरन्तरम् । तेन विश्वपूजिताख्यां जगत्पूज्यां भजाम्यहम् ॥ २०॥ असङ्ख्यानि च विश्वानि पवित्राणि यया सदा । तां विश्वपावनीं देवीं विरहेण स्मराम्यहम् ॥ २१॥ देवा न तुष्टाः पुष्पाणां समूहेन यया विना । तां पुष्पसारां शुद्धां च द्रष्टुमिच्छामि शोकतः ॥ २२॥ विश्वे यत्प्राप्तिमात्रेण भक्त्याऽऽनन्दो भवेद्भुवम् । नन्दिनी तेन विख्याता सा प्रीता भविता हि मे ॥ २३॥ यस्या देव्या स्तुला नास्ति विश्वेषु निखिलेषु च । तुलसी तेन विख्याता तां यामि शरणं प्रिये ॥ २४॥ कृष्णजीवनरूपा या शश्वत्प्रियतमा सती । तेन कृष्णजीवनीति मम रक्षतु जीवनम् ॥ २५॥नामाष्टक स्तोत्रम्
वृन्दां वृन्दावनीं विश्वपावनींविश्वपूजिताम् । पुष्पसारां नन्दिनीं च तुलसीं कृष्णजीवनीम् ॥ ३२॥ एतन्नामाष्टकं चैत त्स्तोत्रं नामार्थसंयुतम् । यः पठेत्तां च सम्पूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ ३३॥ तुलसीं पुष्पसारां च सतीं पूज्यां मनोहराम् । कृत्स्नपापेध्मदाहाय ज्वलदग्निशिखोपमाम् ॥ ४१॥ पुष्पेषु तुलनाप्यस्या नासीद्देवीषु वा मुने । पवित्ररूपा सर्वासु तुलसी सा च कीर्त्तिता ॥ ४२॥ शिरोधार्या च सर्वेषामीप्सितां विश्वपावनीम् । जीवन्मुक्तां मुक्तिदां च भज तां हरिभक्तिदाम् ॥ ४३॥ ॥ इति ब्रह्मवैवर्तपुराणे प्रकृतिखण्डे द्वाविंशाध्यायान्तर्गतं तुलसीस्तोत्रं समाप्तम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्री तुलसी स्तोत्रम् एक अत्यंत दुर्लभ और पवित्र स्तुति है, जिसका वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के 'प्रकृति खण्ड' के अध्याय २२ में मिलता है। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी रचना स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने की है। यह स्तोत्र केवल एक प्रशंसा गीत नहीं, बल्कि माँ तुलसी के दिव्य स्वरूप और उनके आठ प्रमुख नामों के पीछे छिपे आध्यात्मिक रहस्यों का उद्घाटन है। भगवान विष्णु (रमापति) अपनी प्रिय तुलसी के विरह में व्याकुल होकर उनके गुणों का स्मरण करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, जो इसकी भावपूर्ण गहराई और महत्व को दर्शाता है। यह स्तोत्र भक्ति, पवित्रता और मोक्ष (liberation) का मार्ग प्रशस्त करता है।
पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, जब देवी तुलसी (जो पूर्व जन्म में वृन्दा थीं) पृथ्वी पर एक पौधे के रूप में प्रकट हुईं, तब भगवान विष्णु उनके विरह में अत्यंत दुखी हुए। वे शोक में डूबकर (
विरहेण स्मराम्यहम्) उनके दिव्य गुणों और नामों का स्मरण करने लगे। उन्होंने तुलसी के आठ नामों का उच्चारण करते हुए उनकी महिमा का गान किया। यह स्तुति इतनी शक्तिशाली और हृदय से निकली हुई थी कि इसके पाठ के उपरांत स्वयं देवी तुलसी एक सती-साध्वी के रूप में भगवान के समक्ष प्रकट हो गईं (ददर्श तुलसीं साक्षात्पाद्मपद्मनतां सतीम्)। यह प्रसंग इस स्तोत्र की शक्ति को प्रमाणित करता है कि सच्चे हृदय से इसका पाठ करने पर भक्त को देवी तुलसी और भगवान हरि की साक्षात कृपा प्राप्त होती है।स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
यह स्तोत्र देवी तुलसी के आठ नामों (तुलसी नामाष्टक) के माध्यम से उनके सम्पूर्ण स्वरूप को समझाता है, जैसा स्वयं श्री हरि देखते हैं:
- वृन्दा (Vrinda): जहाँ तुलसी के पौधे समूह में होते हैं, वह स्थान 'वृन्दा' कहलाता है। यह सामूहिकता और पवित्र वातावरण का प्रतीक है।
- वृन्दावनी (Vrindavani): वे देवी जो सबसे पहले वृन्दावन में प्रकट हुईं। यह नाम उनके दिव्य उद्गम और कृष्ण लीला से उनके गहरे संबंध को दर्शाता है।
- विश्वपूजिता (Vishwapoojita): वे, जिनकी पूजा अनगिनत ब्रह्मांडों (universes) में निरंतर होती है। यह उनकी सार्वभौमिक स्वीकार्यता और दिव्यता को सिद्ध करता है।
- विश्वपावनी (Vishwapavani): अपनी उपस्थिति मात्र से जो अनगिनत ब्रह्मांडों को पवित्र (purifies the universe) करती हैं। वे आध्यात्मिक और भौतिक शुद्धि की स्रोत हैं।
- पुष्पसारा (Pushpasara): वे सभी पुष्पों का सार हैं। उनके बिना कोई भी पूजा या पुष्पों का समूह देवताओं को संतुष्ट नहीं कर सकता, जो पूजा में उनकी अनिवार्यता को दर्शाता है।
- नन्दिनी (Nandini): भक्तों को आनंद (bliss and joy) प्रदान करने वाली। उनकी कृपा से जीवन में सच्चा सुख और संतोष मिलता है।
- तुलसी (Tulasi): जिसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती (
तुला नास्ति)। वे सभी देवियों में अद्वितीय और अतुलनीय हैं। - कृष्णजीवनी (Krishna-Jivani): वे भगवान श्री कृष्ण की जीवन-शक्ति (life-force of Krishna) हैं। यह नाम उनके और कृष्ण के बीच के अभिन्न और सर्वोच्च प्रेम संबंध को प्रकट करता है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
इस स्तोत्र के पाठ से मिलने वाले लाभ अत्यंत श्रेष्ठ हैं, जैसा कि पुराण में वर्णित है:
- अश्वमेध यज्ञ का फल (Fruit of Ashwamedha Yagya): स्तोत्र की फलश्रुति (verse 33) में स्पष्ट कहा गया है कि जो भी व्यक्ति तुलसी जी की पूजा करके इस नामाष्टक स्तोत्र का पाठ करता है, उसे एक अश्वमेध यज्ञ करने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
- पापों का नाश (Destroyer of Sins): माँ तुलसी को पाप रूपी ईंधन को जलाने के लिए प्रज्वलित अग्नि की शिखा के समान (
कृत्स्नपापेध्मदाहाय ज्वलदग्निशिखोपमाम्) बताया गया है। इसका पाठ सभी संचित पापों को नष्ट कर देता है। - हरिभक्ति की प्राप्ति (Attainment of Devotion): वे 'हरिभक्तिदाम्' हैं, अर्थात् भगवान विष्णु की निश्छल और अटूट भक्ति प्रदान करती हैं। यह वैष्णवों के लिए एक सर्वोच्च वरदान है।
- मुक्ति और मोक्ष (Liberation and Moksha): उन्हें 'जीवन्मुक्तां' (जो स्वयं जीवनमुक्त हैं) और 'मुक्तिदां' (मुक्ति देने वाली) कहा गया है। इसका पाठ साधक को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करने में सहायक होता है।
- भगवान विष्णु की कृपा (Grace of Lord Vishnu): चूँकि यह स्तोत्र स्वयं भगवान विष्णु को प्रिय है और उन्होंने ही इसकी रचना की है, इसके पाठ से वे अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्त पर अपनी कृपा बरसाते हैं।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- इस स्तोत्र का पाठ करने का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल, स्नान के बाद है।
- कार्तिक मास (Kartik Maas) में इसका पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।
- तुलसी के पौधे के समीप बैठकर, उन्हें जल अर्पित करने के बाद और घी का दीपक जलाकर इस स्तोत्र का पाठ करें।
- एकादशी और पूर्णिमा तिथियों पर इसका पाठ करने से भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है।
- इसे प्रतिदिन की पूजा में शामिल करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा (positive energy), पवित्रता और सुख-शांति का वास होता है।