श्री योगमीनाक्षी स्तोत्रम्

॥ श्रीयोगमीनाक्षीस्तोत्रम् ॥
शिवानन्दपीयूषरत्नाकरस्थां शिवब्रह्मविष्ण्वामरेशाभिवन्द्याम् । शिवध्यानलग्नां शिवज्ञानमूर्तिं शिवाख्यामतीतां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १॥ शिवादिस्फुरत्पञ्चमञ्चाधिरूढां धनुर्बाणपाशाङ्कुशोत्भासिहस्ताम् । नवीनार्कवर्णां नवीनेन्दुचूडां परब्रह्मपत्नीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ २॥ किरीटाङ्गदोद्भासिमाङ्गल्यसूत्रां स्फुरन्मेखलाहारताटङ्गभूषाम् । परामन्त्रकां पाण्ड्यसिंहासनस्थां परन्धामरूपां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ३॥ ललामाञ्चितस्निग्धफालेन्दुभागां लसन्नीरजोत्फुल्लकल्हारसंस्थाम् । ललाटेक्षणार्धाङ्गलग्नोज्ज्वलाङ्गीं परन्धामरूपां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ४॥ त्रिखण्डात्मविद्यां त्रिबिन्दुस्वरूपां त्रिकोणे लसन्तीं त्रिलोकावनम्राम् । त्रिबीजाधिरूढां त्रिमूर्त्यात्मविद्यां परब्रह्मपत्नीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ५॥ सदा बिन्दुमध्योल्लसद्वेणिरम्यां समुत्तुङ्गवक्षोजभारावनम्राम् । क्वणन्नूपुरोपेतलाक्षारसार्द्रस्पुरत्पादपद्मां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ६॥ यमाद्यष्टयोगाङ्गरूपामरूपामकारात्क्षकारान्तवर्णामवर्णाम् । अखण्डामनन्यामचिन्त्यामलक्ष्याममेयात्मविद्यां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ७॥ सुधासागरान्ते मणिद्वीपमध्ये लसत्कल्पवृक्षोज्ज्वलद्विन्दुचक्रे । महायोगपीठे शिवाकारमञ्चे सदा सन्निषण्णां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ८॥ सुषुम्नान्तरन्ध्रे सहस्रारपद्मे रवीन्द्वग्निसम्युक्तचिच्चक्रमध्ये । सुधामण्डलस्थे सुनिर्वाणपीठे सदा सञ्चरन्तीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ९॥ षडन्ते नवान्ते लसद्वादशान्ते महाबिन्दुमध्ये सुनादान्तराळे । शिवाख्ये कलातीतनिश्शब्ददेशे सदा सञ्चरन्तीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १०॥ चतुर्मार्गमध्ये सुकोणान्तरङ्गे खरन्द्रे सुधाकारकूपान्तराळे । निरालम्बपद्मे कलाषोडशान्ते सदा सञ्चरन्तीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ११॥ पुटद्वन्द्वनिर्मुक्तवायुप्रलीनप्रकाशान्तराले ध्रुवोपेतरम्ये । महाषोडशान्ते मनोनाशदेशे सदा सञ्चरन्तीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १२॥ चतुष्पत्रमध्ये सुकोणत्रयान्ते त्रिमूर्त्याधिवासे त्रिमार्गान्तराळे । सहस्रारपद्मोचितां चित्प्रकाशप्रवाहप्रलीनां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १३॥ लसद्वादशान्तेन्दुपीयूषधारावृतां मूर्तिमानन्दमग्नान्तरङ्गाम् । परां त्रिस्तनीं तां चतुष्कूटमध्ये परन्धामरूपां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १४॥ सहस्त्रारपद्मे सुषुम्नान्तमार्गे स्फुरच्चन्द्रपीयूषधारां पिबन्तीम् । सदा स्त्रावयन्तीं सुधामूर्तिमम्बां परञ्ज्योतिरूपां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १५॥ नमस्ते सदा पाण्ड्यराजेन्द्रकन्ये नमस्ते सदा सुन्दरेशाङ्कवासे । नमस्ते नमस्ते सुमीनाक्षि देवि नमस्ते नमस्ते पुनस्ते नमोऽस्तु ॥ १६॥ ॥ इति श्रीयोगमीनाक्षीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्री योगमीनाक्षी स्तोत्रम् देवी मीनाक्षी की एक अत्यंत गहन और दुर्लभ स्तुति है, जो उनके बाह्य, पूजनीय स्वरूप से परे जाकर उनके आंतरिक, योगमय स्वरूप पर ध्यान केंद्रित करती है। जहाँ सामान्य स्तोत्र देवी के भौतिक सौंदर्य और लीलाओं का वर्णन करते हैं, वहीं यह स्तोत्र देवी को कुण्डलिनी शक्ति (Kundalini Shakti) के रूप में देखता है, जो साधक के शरीर में स्थित विभिन्न चक्रों और नाड़ियों में विचरण करती हैं। इसका नाम 'योगमीनाक्षी' इसी गहरे संबंध को दर्शाता है - वे 'योग' की देवी हैं। यह स्तुति केवल भक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि ध्यान और आंतरिक साधना का एक पूरा नक्शा प्रस्तुत करती है, जिसमें देवी को परंज्योति (Supreme Light) और परब्रह्म की शक्ति के रूप में अनुभव करने का मार्ग बताया गया है।
पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)
यह स्तोत्र देवी मीनाक्षी की उस कथा से जुड़ा है जिसमें वे यज्ञ की अग्नि से तीन स्तनों (
परां त्रिस्तनीं) वाली कन्या के रूप में प्रकट हुई थीं। उनका तीसरा स्तन उनके अपने पति, भगवान शिव, के दर्शन मात्र से लुप्त हो गया था। यह कथा प्रतीकात्मक है - तीसरा स्तन द्वैत और अज्ञान का प्रतीक है, जो परम शिव (शुद्ध चेतना) के साक्षात्कार से स्वतः ही समाप्त हो जाता है। यह स्तोत्र उसी आत्म-साक्षात्कार की योगिक प्रक्रिया का वर्णन करता है। देवी मीनाक्षी, पाण्ड्य राजकुमारी (पाण्ड्यबालाम्) के रूप में, सांसारिक और आध्यात्मिक, दोनों सत्ताओं की रानी हैं। स्तोत्र में उन्हें "परब्रह्मपत्नी" कहा गया है, जो उन्हें परब्रह्म (शिव) की अविभाज्य शक्ति के रूप में स्थापित करता है, जिसे साधक अपने भीतर ही योग द्वारा अनुभव कर सकता है।स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
यह स्तोत्र एक योगी की आंतरिक यात्रा का वर्णन है, जिसमें देवी विभिन्न चक्रों में प्रकट होती हैं:
- आंतरिक यात्रा का मार्ग (The Path of Inner Journey): स्तोत्र में
सुषुम्नान्तरन्ध्रे(सुषुम्ना नाड़ी के भीतर),सहस्रारपद्मे(सहस्रार चक्र में),महाबिन्दुमध्ये(महाबिंदु के केंद्र में), औरचतुष्पत्रमध्ये(चार पंखुड़ियों वाले कमल, अर्थात् मूलाधार चक्र में) जैसे शब्द देवी को कुंडलिनी शक्ति के रूप में चित्रित करते हैं, जो मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा करती है। - अमृत का पान (Drinking the Nectar): "स्फुरच्चन्द्रपीयूषधारां पिबन्तीम्" - वे सहस्रार चक्र से बहने वाली चंद्र-अमृत की धारा का पान कर रही हैं। यह योग की उस अवस्था का वर्णन है जब कुंडलिनी सहस्रार में शिव से मिलती है और साधक को अमरत्व और परमानंद का अनुभव होता है।
- मनोनाश की अवस्था (The State of No-Mind): "मनोनाशदेशे सदा सञ्चरन्तीं" - वे उस स्थान पर विचरण करती हैं जहाँ मन का नाश हो जाता है। यह समाधि या तुरीय अवस्था का प्रतीक है, जो योग का अंतिम लक्ष्य है।
- परम ज्योतिः स्वरूप (The Form of Supreme Light): अंत में, देवी को "परञ्ज्योतिरूपां" कहा गया है। उनकी पूजा का अंतिम फल इसी परम प्रकाश में विलीन हो जाना है, जो मोक्ष का प्रतीक है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
यद्यपि इस स्तोत्र में कोई पारंपरिक फलश्रुति नहीं है, इसका पाठ योग और ध्यान के साधकों के लिए अत्यंत लाभकारी है:
- कुंडलिनी जागरण में सहायक (Aids in Kundalini Awakening): यह स्तोत्र कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया के लिए एक शक्तिशाली उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है। इसका ध्यानपूर्वक पाठ करने से प्राण ऊर्जा ऊर्ध्वगामी होती है।
- गहन ध्यान और एकाग्रता (Deep Meditation and Concentration): स्तोत्र के श्लोक साधक को अपने शरीर के भीतर, चक्रों और नाड़ियों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करते हैं, जिससे ध्यान की गहराई बढ़ती है।
- आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-ज्ञान (Spiritual Progress and Self-Realization): इसका नियमित पाठ साधक को भौतिक चेतना से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है और आत्म-ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है।
- आंतरिक शांति और आनंद (Inner Peace and Bliss): देवी के आनंदमय स्वरूप का ध्यान करने से साधक के भीतर भी शांति, संतोष और दिव्य आनंद (
सुधामूर्तिम्) का अनुभव होता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- यह एक ध्यानपरक स्तोत्र है, इसलिए इसे शांत और एकांत स्थान पर बैठकर पढ़ना चाहिए।
- पाठ का सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त या रात्रि में सोने से पूर्व है, जब मन बाहरी विचारों से मुक्त हो।
- प्रत्येक श्लोक का उच्चारण करते समय, उसमें वर्णित चक्र या सूक्ष्म शरीर के स्थान पर अपना ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करें। उदाहरण के लिए, "सहस्रारपद्मे" पढ़ते समय अपने सिर के शीर्ष पर ध्यान लगाएं।
- योग, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करने वाले साधकों के लिए यह स्तोत्र विशेष रूप से उपयोगी है।
- इसका पाठ केवल मुख से नहीं, बल्कि पूरे भाव और एकाग्रता के साथ करना चाहिए ताकि इसके योगिक लाभ प्राप्त हो सकें।