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श्री सङ्कष्टमोचन स्तोत्रम् (काशी पीठाधीश्वर कृत)

श्री सङ्कष्टमोचन स्तोत्रम् (काशी पीठाधीश्वर कृत)

॥ श्रीसङ्कष्टमोचनस्तोत्रम् ॥

काशीपीठाधीश्वर जगद्गुरुशङ्कराचार्यस्वामि श्रीमहेश्वरानन्दसरस्वतीविरचितं (By Swami Shri Maheshvarananda Saraswati)

सिन्दूरपूररुचिरो बलवीर्यसिन्धुः बुद्धिप्रभावनिधिरद्भुतवैभवश्रीः । दीनार्तिदावदहनो वरदो वरेण्यः सङ्कष्टमोचनविभुस्तनुतां शुभं नः ॥ १॥

सोत्साहलङ्घितमहार्णवपौरुषश्रीः लङ्कापुरीप्रदहनप्रथितप्रभावः । घोराहवप्रमथितारिचयप्रवीरः प्राभञ्जनिर्जयति मर्कटसार्वभौमः ॥ २॥

द्रोणाचलानयनवर्णितभव्यभूतिः श्रीरामलक्ष्मणसहायकचक्रवर्ती । काशीस्थदक्षिणविराजितसौधमल्लः श्रीमारुतिर्विजयते भगवान् महेशः ॥ ३॥

नूनं स्मृतोऽपि ददते भजतां कपीन्द्रः सम्पूजितो दिशति वाञ्छित-सिद्धिवृद्धिम् । संमोदकप्रिय उपैति परं प्रहर्षं रामायणश्रवणतः पठतां शरण्यः ॥ ४॥

श्रीभारतप्रवरयुद्धरथोद्धतश्रीः पार्थैककेतनकरालविशालमूर्तिः । उच्चैर्घनाघनघटाविकटाट्टहासः श्रीकृष्णपक्षभरणः शरणं ममाऽस्तु ॥ ५॥

जङ्घालजङ्घ उपमातिविदूरवेगो मुष्टिप्रहारपरिमूर्च्छितराक्षसेन्द्रः । श्रीरामकीर्तितपराक्रमणोद्धवश्रीः प्राकम्पनिर्विभुरुदञ्चतु भूतये नः ॥ ६॥

सीतार्तिदारणपटुः प्रबलः प्रतापी श्रीराघवेन्द्रपरिरम्भवरप्रसादः । वर्णीश्वरः सविधिशिक्षितकालनेमिः पञ्चाननोऽपनयतां विपदोऽधिदेशम् ॥ ७॥

उद्यद्भानुसहस्रसन्निभतनुः पीताम्बरालङ्कृतः प्रोज्ज्वालानलदीप्यमाननयनो निष्पिष्टरक्षोगणः । संवर्तोद्यतवारिदोद्धतरवः प्रोच्चैर्गदाविभ्रमः श्रीमान् मारुतनंदनः प्रतिदिनं ध्येयो विपद्भञ्जनः ॥ ८॥

रक्षःपिशाचभयनाशनमामयाधि प्रोच्चैर्ज्वरापहरणं हननं रिपूणाम् । सम्पत्तिपुत्रकरणं विजयप्रदानं सङ्कष्टमोचनविभोः स्तवनं नराणाम् ॥ ९॥

दारिद्र्यदुःखदहनं शमनं विवादे कल्याणसाधनममङ्गलवारणाय । दाम्पत्यदीर्घसुखसर्वमनोरथाप्तिं श्रीमारुतेः स्तवशतावृतिरातनोति ॥ १०॥

स्तोत्रं य एतदनुवासरमाप्तकामः श्रीमारुतिं समनुचिन्त्य पठेत् सुधीरः । तस्मै प्रसादसुमुखो वरवानरेन्द्रः साक्षात्कृतो भवति शाश्वतिकः सहायः ॥ ११॥

सङ्कष्टमोचनस्तोत्रं शङ्कराचार्यभिक्षुणा । महेश्वरेण रचितं मारुतेश्चरणेऽर्पितम् ॥ १२॥

॥ इति काशीपीठाधीश्वर जगद्गुरुशङ्कराचार्यस्वामि श्रीमहेश्वरानन्दसरस्वतीविरचितं श्रीसङ्कष्टमोचनस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

श्री सङ्कष्टमोचन स्तोत्रम् एक अत्यंत प्रभावशाली और विद्वतापूर्ण रचना है, जिसके रचयिता काशी पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीमहेश्वरानन्द सरस्वती हैं। यह स्तोत्र गोस्वामी तुलसीदास कृत 'हनुमान बाहुक' या 'संकटमोचन हनुमानाष्टक' से भिन्न है; यह एक संस्कृत स्तोत्र है जो शास्त्रीय छंदों में रचा गया है। इसमें भगवान हनुमान के उस स्वरूप की आराधना की गई है जो भक्तों के 'संकट' (Sankashta) और 'दीनता' (मजबूरी) को हरने के लिए तत्पर रहता है। इसके रचियता स्वयं एक महान शंकराचार्य हैं, जिससे इस स्तोत्र की प्रामाणिकता और आध्यात्मिक ऊर्जा (spiritual energy) और भी बढ़ जाती है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

इस स्तोत्र के 12 श्लोकों में हनुमान जी के वीरतापूर्ण और मंगलकारी कार्यों का सुंदर वर्णन है:
  • सिंदूरी आभा और शक्ति: पहले ही श्लोक में उन्हें "सिन्दूरपूररुचिरो" (सिंदूर के ढेर समान लाल कांति वाले) और "बलवीर्यसिन्धुः" (बल और वीर्य के सागर) कहा गया है। वे दीनों के दुखों रूपी वन को जलाने के लिए दावानल (forest fire) के समान हैं।
  • महाभारत और रामायण का समन्वय: श्लोक 5 में एक अद्भुत चित्रण है जहाँ हनुमान जी को "पार्थैककेतन" (अर्जुन के ध्वज पर विराजमान) और महाभारत युद्ध में "भीषण अट्टहास" करने वाले के रूप में वर्णित किया गया है। वे श्री राम के कार्य (लंका दहन, द्रोणाचल लाना) और श्री कृष्ण के पक्ष (महाभारत) दोनों में सहायक हैं।
  • सूर्य और कालनेमि का प्रसंग: श्लोक 8 में उन्हें उदय होते हुए हजारों सूर्यों के समान तेजस्वी और श्लोक 7 में "कालनेमि" राक्षस को शिक्षा देने वाला (मारने वाला) बताया गया है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

स्तोत्र के अंतिम भाग (श्लोक 9, 10, 11) में इसके पाठ के स्पष्ट लाभ बताए गए हैं:
  • रोग और भय का नाश: "रक्षःपिशाचभयनाशनमामयाधि" - यह स्तोत्र राक्षसों, भूतों के भय और शारीरिक व मानसिक रोगों (diseases) का नाश करता है। ज्वर (fever) को दूर करने में यह विशेष प्रभावी है।
  • दरिद्रता और विवाद से मुक्ति: "दारिद्र्यदुःखदहनं शमनं विवादे" - यह गरीबी (poverty) रूपी दुख को जला देता है और कोर्ट-कचहरी या आपसी विवादों को शांत करता है।
  • दाम्पत्य सुख और संतान: "दाम्पत्यदीर्घसुख... सम्पत्तिपुत्रकरणं" - इसके पाठ से वैवाहिक जीवन में खुशहाली आती है और निःसंतान को संतान (progeny) सुख मिलता है।
  • विजय और सिद्धि: यह शत्रुओं का हनन ("हननं रिपूणाम्") करके विजय (victory) दिलाता है और सभी मनोरथों को सिद्ध करता है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • नित्य पाठ: श्लोक 11 में कहा गया है "अनुवासरम्"—अर्थात् इसका पाठ प्रतिदिन करना चाहिए।
  • विशेष अवसर: मंगलवार या शनिवार को लाल फूल, सिंदूर और गुड़-चने का भोग लगाकर पाठ करना विशेष फलदायी है।
  • संकल्प: यदि कोई विशेष संकट (जैसे बीमारी या शत्रु बाधा) हो, तो संकल्प लेकर 41 दिनों तक इसका पाठ करें।
  • ध्यान: पाठ करते समय सिंदूरी वर्ण वाले, गदा धारण किए हुए हनुमान जी का ध्यान करें जो अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान हैं।