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श्री राघवेन्द्र संसारोद्धरण स्तोत्रम्

श्री राघवेन्द्र संसारोद्धरण स्तोत्रम्

॥ श्रीराघवेन्द्रसंसारोद्धरणस्तोत्रम् ॥

श्रितलोकामरभूरुहसदृशाङ्ग्रे कृपया भोः । गुरुराजोद्धर मां प्रतिपतितं संसृतिकूपे ॥ १॥ रमणी रै सुत मोहित मनसं मोदद भो भोः । गुरुराजोद्धर मां प्रतिपतितं संसृतिकूपे ॥ २॥ घनसच्छित्सुखपूरित करुणासागर भो भोः । गुरुराजोद्धर मां प्रतिपतितं संसृतिकूपे ॥ ३॥ वरदेशामित चित्रचरित भूभासुर भो भोः । गुरुराजोद्धर मां प्रतिपतितं संसृतिकूपे ॥ ४॥ दरचक्राङ्कित कण्ठग तुलसीमालिक भो भोः । गुरुराजोद्धर मां प्रतिपतितं संसृतिकूपे ॥ ५॥ यतिवरामितबोध सुमतविस्तारक भो भो । गुरुराजोद्धर मां प्रतिपतितं संसृतिकूपे ॥ ६॥ नमतामिष्टद कुष्ठमुख महाकष्टहर भो भोः । गुरुराजोद्धर मां प्रतिपतितं संसृतिकूपे ॥ ७॥ ममता भक्तजने सुत इव जाग्रति ते भो भोः । गुरुराजोद्धर मां प्रतिपतितं संसृतिकूपे ॥ ८॥ स्तवनं कृष्णावधूतरचितं यः पठतीदम् । गुरुराजोद्धर मां प्रतिपतितं संसृतिकूपे ॥ ९॥ ॥ इति श्रीकृष्णावधूतविरचिते श्रीराघवेन्द्रतन्त्रे नवमपटले संसारोद्धरणस्तोत्रं नाम पञ्चमोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

श्री राघवेन्द्र संसारोद्धरण स्तोत्रम्, 'राघवेन्द्र तंत्र' से उद्धृत, श्री कृष्णावधूत द्वारा रचित एक और अत्यंत शक्तिशाली स्तुति है। इसका नाम, "संसार-उद्धरण", इसके उद्देश्य को स्पष्ट करता है - अर्थात् संसार सागर से उद्धार। जहाँ 'दारिद्र्यमोचन स्तोत्र' भौतिक दुःखों और गरीबी से मुक्ति पर केंद्रित है, वहीं यह स्तोत्र आध्यात्मिक मुक्ति और जन्म-मृत्यु के चक्र से बाहर निकलने के लिए एक गहन प्रार्थना है। स्तोत्र में बार-बार आने वाली पंक्ति, "गुरुराजोद्धर मां प्रतिपतितं संसृतिकूपे" (हे गुरुराज! संसार रूपी कुएं में गिरे हुए मेरा उद्धार करें), एक जीवात्मा की मार्मिक पुकार है जो सांसारिक मोह-माया और दुःखों में फँसकर असहाय महसूस कर रही है। यह स्तोत्र गुरु को एकमात्र उद्धारकर्ता के रूप में देखता है जो इस गहरे अंधकार से बाहर निकाल सकते हैं।

संत श्री राघवेन्द्र स्वामी का संदर्भ (Context of Guru Raghavendra)

श्री राघवेन्द्र स्वामी को उनके भक्त केवल भौतिक सुख-समृद्धि देने वाले के रूप में ही नहीं, बल्कि मोक्ष (Moksha) के दाता के रूप में भी पूजते हैं। उन्होंने अपने जीवन में द्वैत वेदांत के माध्यम से भगवान हरि की सर्वोच्चता और भक्ति के मार्ग का उपदेश दिया। उनका पूरा जीवन और उनके ग्रंथ, भक्तों को संसार के बंधनों से मुक्त होकर भगवान के चरणों में स्थान पाने के लिए प्रेरित करते हैं। 'संसार' को अक्सर एक अथाह सागर या एक गहरे कुएं (कूप) के रूप में चित्रित किया जाता है, जिसमें जीवात्मा अपने कर्मों के कारण डूबा रहता है। इस स्तोत्र में, श्री राघवेन्द्र स्वामी को वह 'गुरुराज' माना गया है जो अपनी करुणा (करुणासागर भो भोः) से इस कुएं में गिरे हुए (प्रतिपतितं) शिष्य का उद्धार करने में सक्षम हैं। मन्त्रालयम् स्थित उनका वृंदावन आज भी आध्यात्मिक शांति और मार्गदर्शन चाहने वालों के लिए एक प्रकाश स्तंभ है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

यह स्तोत्र संसार में फंसे एक जीव की विभिन्न अवस्थाओं और गुरु की महिमा को दर्शाता है:
  • संसार रूपी कुआँ (The Well of Samsara): 'संसृतिकूप' एक शक्तिशाली प्रतीक है। कुआँ अंधकार, सीमितता और बाहर निकलने में असमर्थता का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि जीव अपनी शक्ति से इस संसार से बाहर नहीं निकल सकता; उसे किसी बाहरी शक्ति (गुरु) की आवश्यकता है।
  • मोह का बंधन (The Bondage of Attachment): "रमणी रै सुत मोहित मनसं" - स्त्री, धन और पुत्र के मोह में फंसा हुआ मन। यह स्तोत्र पहचानता है कि सांसारिक लगाव ही हमें इस कुएं में गिराए रखता है।
  • करुणा के सागर (Ocean of Compassion): "करुणासागर भो भोः" - गुरु को करुणा का सागर कहकर भक्त यह विश्वास व्यक्त करता है कि चाहे उसके पाप कितने भी गहरे क्यों न हों, गुरु की करुणा उससे भी विशाल है और उसे बचा सकती है।
  • एक पुत्र के समान स्नेह (Affection like a Son): "ममता भक्तजने सुत इव जाग्रति ते" - आप अपने भक्तों पर एक पुत्र के समान ममता रखते हैं। यह गुरु और शिष्य के बीच के गहरे, वात्सल्यपूर्ण संबंध को दर्शाता है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को गहरे आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं:
  • आध्यात्मिक मार्गदर्शन और उद्धार (Spiritual Guidance and Liberation): यह स्तोत्र का प्राथमिक लाभ है। जो लोग जीवन में खोया हुआ, दिशाहीन या सांसारिक समस्याओं में अत्यधिक डूबा हुआ महसूस करते हैं, उन्हें इस स्तोत्र के पाठ से आध्यात्मिक मार्गदर्शन और मानसिक संबल मिलता है।
  • मोह और आसक्ति से मुक्ति (Freedom from Delusion and Attachment): संसार के मूल कारण, यानी मोह, पर प्रहार करने के कारण यह स्तोत्र साधक को सांसारिक लगाव से ऊपर उठने और वैराग्य का भाव विकसित करने में मदद करता है।
  • कष्टों का निवारण (Removal of Sufferings): अंतिम श्लोक में स्वयं रचयिता कहते हैं कि जो इस स्तोत्र का पाठ करता है, गुरुराज उसके कष्टों को हर लेते हैं। यह न केवल आध्यात्मिक, बल्कि भौतिक कष्टों पर भी लागू होता है।
  • गुरु के प्रति भक्ति में वृद्धि (Increase in Devotion to the Guru): इस स्तोत्र का मार्मिक भाव साधक के हृदय में गुरु के प्रति प्रेम, विश्वास और भक्ति को और भी गहरा करता है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ दिन गुरुवार है।
  • इसे प्रातःकाल या संध्याकाल में, शांत चित्त से, श्री राघवेन्द्र स्वामी का ध्यान करते हुए पढ़ना चाहिए।
  • पाठ करते समय, "गुरुराजोद्धर मां" पंक्ति पर विशेष भाव रखें और कल्पना करें कि गुरु राघवेन्द्र आपको संसार रूपी कुएं से हाथ पकड़कर बाहर निकाल रहे हैं।
  • जो लोग जीवन में बार-बार एक ही तरह की समस्याओं या दुष्चक्र में फंस रहे हैं, उनके लिए यह स्तोत्र उस चक्र को तोड़ने में मदद कर सकता है।
  • इस स्तोत्र को 'दारिद्र्यमोचन स्तोत्र' के साथ जोड़कर पढ़ने से भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार की उन्नति होती है।