श्री राधाकृष्ण स्तोत्रम् (ब्रह्मादिकृत)

॥ अथ ब्रह्मादिकृतं श्रीराधाकृष्णस्तोत्रम् ॥
ब्रह्मोवाच ।
तव चरणसरोजे मन्मनश्चञ्चरीको भ्रमतु सततमीश प्रेमभक्त्या सरोजे । भवनमरणरोगात् पाहि शान्त्यौषधेन सुदृढसुपरिपक्वां देहि भक्तिं च दास्यम् ॥ १॥शंकर उवाच ।
भवजलनिधिमग्नं चित्तमीनो मदीयो भ्रमति सततमस्मिन् घोर्स्संसारकूपे । विषयमतिविनिन्द्यं सृष्टिसंहाररूपम्- अपनय तव भक्तिं देहि पादारविन्दे ॥ २॥धर्म उवाच ।
तव निजजनसार्धं संगमो मे सदैव भवतु विषयबन्धच्छेदने तिक्ष्णखड्गः । तव चरणसरोजस्थानदानैकहेतुर्- जनुषि जनुषि भक्तिं देहि पादारविन्दे ॥ ३॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते ब्रह्मादिकृतम् श्रीराधकृष्णस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्री राधाकृष्ण स्तोत्रम्, जैसा कि ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित है, एक अत्यंत ही विलक्षण और महत्वपूर्ण स्तुति है। इसका महत्व इस बात में है कि यह स्तुति किसी ऋषि या भक्त द्वारा नहीं, बल्कि स्वयं सृष्टि के सर्वोच्च देवताओं - ब्रह्मा, शंकर (शिव), और धर्मराज - द्वारा की गई है। यह स्तोत्र इन महान देवताओं की विनम्रता और श्री राधाकृष्ण के प्रति उनकी सर्वोच्च भक्ति को दर्शाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्री राधा-कृष्ण को परब्रह्म, यानी सभी देवताओं के भी स्रोत के रूप में चित्रित किया गया है। यह स्तोत्र इसी दार्शनिक सत्य की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। इसकी मुख्य भावना भौतिक सुखों की मांग नहीं, बल्कि जन्म-जन्मान्तर में श्री राधाकृष्ण के चरण-कमलों में अनन्य, परिपक्व और निस्वार्थ प्रेम-भक्ति (Prema Bhakti) और दास्य-भाव (servitude) की प्राप्ति है।
पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)
ब्रह्मवैवर्त पुराण में अनेक प्रसंग हैं जहाँ ब्रह्मा, शिव और अन्य देवतागण गोलोक धाम में श्री राधाकृष्ण की दिव्य लीलाओं के दर्शन करने और उनकी स्तुति करने आते हैं। यह स्तोत्र एक ऐसे ही प्रसंग को दर्शाता है जहाँ सृष्टि के प्रबंधक (ब्रह्मा), संहारक (शिव), और धर्म के पालक (धर्मराज) अपने-अपने पदों के अहंकार से मुक्त होकर एक साधारण भक्त की भांति श्री राधाकृष्ण के समक्ष उपस्थित होते हैं। वे संसार के चक्र, विषय-वासनाओं के बंधन और जन्म-मृत्यु के रोग से मुक्ति पाने के लिए राधा-रानी और कृष्ण-कन्हाई को ही एकमात्र औषधि (
शान्त्यौषधेन) और आश्रय मानते हैं। यह दर्शाता है कि चाहे कोई देवता हो या मनुष्य, आध्यात्मिक मार्ग की अंतिम अभिलाषा राधा-कृष्ण की निश्छल भक्ति ही है।स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
तीनों देवताओं की प्रार्थनाएँ भक्ति के तीन सुंदर रूपकों को प्रस्तुत करती हैं:
- ब्रह्मा की प्रार्थना - मन रूपी भौंरा (Brahma's Prayer - The Mind-Bee): ब्रह्मा जी अपने मन की तुलना एक चंचल भौंरे (
चञ्चरीको) से करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि यह भौंरा कहीं और न भटककर सदा आपके चरण-कमल (चरणसरोजे) पर ही मंडराता रहे। यह मन को संसार से हटाकर निरंतर प्रभु के ध्यान में लगाने का प्रतीक है। - शंकर की प्रार्थना - चित्त रूपी मछली (Shankara's Prayer - The Mind-Fish): भगवान शंकर अपने चित्त की तुलना एक मछली (
चित्तमीनो) से करते हैं जो संसार रूपी भयानक कुएं (घोर्स्संसारकूपे) में फंसी हुई है। वे प्रार्थना करते हैं कि आप मुझे इस संसार के प्रपंच से निकालकर अपने भक्ति-रूपी अमृत सागर में स्थान दें। - धर्मराज की प्रार्थना - सत्संग रूपी तलवार (Dharma's Prayer - The Sword of Satsang):** धर्मराज प्रार्थना करते हैं कि उन्हें सदैव आपके भक्तों का संग (
निजजनसार्धं संगमो) मिले, जो विषय-वासनाओं के बंधन को काटने के लिए एक तीखी तलवार (तिक्ष्णखड्गः) के समान है। यह सत्संग की महिमा और भक्ति के लिए उसकी अनिवार्यता को दर्शाता है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
यद्यपि इस स्तोत्र में कोई अलग से फलश्रुति नहीं दी गई है, इसके प्रत्येक श्लोक में मांगे गए वरदान ही इसके सर्वोच्च लाभ हैं:
- अचल प्रेम-भक्ति की प्राप्ति (Attainment of Unwavering Loving Devotion): इस स्तोत्र का मुख्य फल है श्री राधाकृष्ण के चरणों में दृढ़ और परिपक्व (
सुदृढसुपरिपक्वाम्) भक्ति की प्राप्ति। - जन्म-मृत्यु के रोग से मुक्ति (Freedom from the Disease of Birth and Death):** ब्रह्मा जी राधा-कृष्ण को "भवनमरणरोगात् पाहि" कहकर जन्म-मृत्यु के रोग की औषधि बताते हैं। इस स्तोत्र के पाठ से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
- विषय-वासनाओं का नाश (Destruction of Worldly Desires):** यह स्तुति संसार के बंधनों को काटने और मन को विषयों से हटाकर भगवान में स्थिर करने की शक्ति प्रदान करती है।
- दास्य-भाव की प्राप्ति (Attainment of the Mood of Servitude):** "देहि भक्तिं च दास्यम्" - भगवान के दास बनने का भाव भक्ति की सर्वोच्च अवस्थाओं में से एक है। इस स्तोत्र से यह दुर्लभ भाव प्राप्त होता है।
- सत्संग का लाभ (Benefit of Holy Company):** धर्मराज की प्रार्थना के अनुरूप, इसके पाठ से साधक को भक्तों का संग प्राप्त होता है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए परम आवश्यक है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ समय एकादशी, पूर्णिमा, जन्माष्टमी और राधाष्टमी के दिन है।
- प्रातःकाल या संध्या के समय, श्री राधाकृष्ण के युगल स्वरूप के समक्ष बैठकर, उन्हें तुलसी दल और पुष्प अर्पित करके इसका पाठ करना चाहिए।
- पाठ करते समय पूरी विनम्रता से यह भाव रखना चाहिए कि जब ब्रह्मा और शिव जैसे देवता भी भक्ति की याचना कर रहे हैं, तो हम साधारण जीवों के लिए यह कितनी आवश्यक है।
- यह स्तोत्र भौतिक कामनाओं के लिए नहीं, बल्कि शुद्ध भक्ति की प्राप्ति के लिए है। अतः इसे निस्वार्थ भाव से पढ़ना चाहिए।