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श्री नृसिंहाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

श्री नृसिंहाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

श्रीनृसिंहाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

श्रीनृसिंहो महासिंहो दिव्यसिंहो महाबलः । उग्रसिंहो महादेव उपेन्द्रश्चाऽग्निलोचनः ॥ १॥ रौद्रश्शौरिर्महावीरस्सुविक्रमपराक्रमः । हरिकोलाहलश्चक्री विजयश्चाजयोऽव्ययः ॥ २॥ दैत्यान्तकः परब्रह्माप्यघोरो घोरविक्रमः । ज्वालामुखो ज्वालमाली महाज्वालो महाप्रभुः ॥ ३॥ निटिलाक्षः सहस्राक्षो दुर्निरीक्ष्यः प्रतापनः । महादंष्ट्रायुधः प्राज्ञो हिरण्यकनिषूधनः ॥ ४॥ चण्डकोपी सुरारिघ्नस्सदार्तिघ्नसदाशिवः । गुणभद्रो महाभद्रो बलभद्रस्सुभद्रकः ॥ ५॥ कराळो विकराळश्च गतायुः सर्वकर्तृकः । भैरवाडंबरो दिव्यश्चागम्यस्सर्वशत्रुजित् ॥ ६॥ अमोघास्त्रश्शस्त्रधरः सव्यजूटस्सुरेश्वरः । सहस्रबाहुर्वज्रनखस्सर्वसिद्धिर्जनार्दनः ॥ ७॥ अनन्तो भगवान् स्थूलश्चागम्यश्च परावरः । सर्वमन्त्रैकरूपश्च सर्वयन्त्रविधारणः ॥ ८॥ अव्ययः परमानन्दः कालजित् खगवाहनः । भक्तातिवत्सलोऽव्यक्तस्सुव्यक्तस्सुलभश्शुचिः ॥ ९॥ लोकैकनायकस्सर्वश्शरणागतवत्सलः । धीरो धरश्च सर्वज्ञो भीमो भीमपराक्रमः ॥ १०॥ देवप्रियो नुतः पूज्यो भवहृत् परमेश्वरः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासो विभुस्सङ्कर्षणः प्रभुः ॥ ११॥ त्रिविक्रमस्त्रिलोकात्मा कामस्सर्वेश्वरेश्वरः । विश्वंभरः स्थिराभश्चाऽच्युतः पुरुषोत्तमः ॥ १२॥ अधोक्षजोऽक्षयस्सेव्यो वनमाली प्रकंपनः । गुरुर्लोकगुरुस्स्रष्टा परंज्योतिः परायणः ॥ १३॥ ज्वालाहोबिलमालोलक्रोडाकारञ्जभार्गवाः । योगनन्दश्च त्रवटः पावनो नवमूर्तयः ॥ १४॥ ॥ इति श्रीनृसिंहाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और अहोबिलम क्षेत्र

श्री नृसिंहाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् (Shri Nrisimha Ashtottara Shatanama Stotram) भगवान नृसिंह के 108 दिव्य और शक्तिशाली नामों का संग्रह है। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके १४वें श्लोक में अहोबिलम (Ahobilam) के प्रसिद्ध नौ नृसिंहों (नव-नृसिंह) का प्रत्यक्ष उल्लेख है—ज्वाला, अहोबिल, मालोल, क्रोड, कारञ्ज, भार्गव, योगानन्द, छत्रवट और पावन। यह स्तोत्र न केवल भगवान के नामों का जाप है, बल्कि यह आंध्र प्रदेश के अहोबिलम क्षेत्र की तीर्थ यात्रा करने के समान पुण्यदायी है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Meaning)

भगवान नृसिंह के नामों में उग्रता और सौम्यता का अद्भुत संतुलन है:
  • उग्र स्वरूप (Fierce Form): 'ज्वालामुखो', 'ज्वालमाली', 'वज्रनख', 'दैत्यान्तक' आदि नाम उनके उस रूप का वर्णन करते हैं जो बुराई और अधर्म का नाश करने के लिए प्रकट होता है। यह रूप शत्रुओं के लिए काल (Death for enemies) है।
  • सौम्य और रक्षक स्वरूप (Gentle Form): 'भक्तातिवत्सल', 'शरणागतवत्सल', 'सौम्य', 'सुलभ'—ये नाम बताते हैं कि वे अपने भक्तों के लिए माता-पिता के समान कोमल और सुलभ हैं।
  • परब्रह्म स्वरूप: 'परब्रह्म', 'अव्यक्त', 'अनन्त', 'सर्वयन्त्रविधारण'—ये नाम सिद्ध करते हैं कि नृसिंह केवल एक अवतार नहीं, बल्कि स्वयं परब्रह्म परमेश्वर हैं।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

इस अष्टोत्तरशतनाम के नियमित पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • शत्रु और तंत्र बाधा नाश (Destroyer of Enemies): 'सर्वशत्रुजित्' और 'अमोघास्त्र' जैसे नामों का स्मरण करने से गुप्त और प्रकट शत्रुओं का नाश होता है और तांत्रिक बाधाएं दूर होती हैं।
  • अग्नि और ऋण से मुक्ति: भगवान को 'ऋणमोचन' भी कहा जाता है। इस स्तोत्र का पाठ कर्ज (Debt) से मुक्ति दिलाने और अग्नि भय को दूर करने में सहायक है।
  • ग्रह शांति (Planetary Relief): नृसिंह भगवान मंगल और शनि जैसे उग्र ग्रहों के दुष्प्रभाव को शांत करते हैं।

पाठ करने की विधि और शुभ समय

  • स्वाति नक्षत्र (Swati Nakshatra): जिस दिन स्वाति नक्षत्र हो, उस दिन नृसिंह पूजा और इस स्तोत्र का पाठ सर्वोत्तम फल देता है, क्योंकि इसी नक्षत्र में भगवान का प्राकट्य हुआ था।
  • मंगलवार और शनिवार: इन दिनों में संध्या काल में लाल पुष्प (जैसे गुडहल) और गुड़ का भोग (Panakam) लगाकर पाठ करें।
  • यदि संभव हो तो 108 तुलसी दल या 108 पुष्पों के साथ प्रत्येक नाम पर "ॐ [नाम] नमः" कहकर अर्चन करें।