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श्री मीनाक्षी स्तोत्रम्

श्री मीनाक्षी स्तोत्रम्

श्रीमीनाक्षीस्तोत्रम्

मन्दस्मितोदञ्चितमञ्जुलास्यां कनन्निटालां वरकुङ्कुमेन । श्रीसुन्दरेशेन समं निशीथे प्रेङ्खाधिरूढां भज मीननेत्राम् ॥ १॥ दविष्ठलोकांश्च दयोर्मिलेन विलोकनेनैव विशालनेत्रा । मत्स्या इवार्भान्परिपालयन्ती डोलाविहारं तनुते झषाक्षी ॥ २॥ कृत्वा तपो दुश्चरमम्बिकायाः माता भवामीति मनीषया या । प्राप्ता पुरा काञ्चनमालया सा पाण्ड्याधिराज्ञी वितनोतु भव्यम् ॥ ३॥ दिव्यं रूपं दधाना ललिततररवैर्वेणुवीणादिजातैः प्रापय्यान्तर्मुखत्वं निखिलजनमनांस्यात्मरूपं विवेक्तुम् । वृत्तीर्मोदादिरूपा अपि परिगलिताः कुर्वती ब्रह्मविद्या मीनाक्षी जीवनीडं सुखममृतमहो बोधयन्ती विभाति ॥ ४॥ प्रेङ्खामारुह्य पत्या सह सुररमणीगर्वनिर्वापिकाभिः नारीभिर्गीयमाना नवनवनटनैस्तोष्यमाणा च नित्यम् । आनन्दं देवभोग्यं धिगिति सुमनसामादधाना विरक्तिं सान्द्रानन्दं महेशं परममृतमहो बोधयत्यम्बिकेयम् ॥ ५॥ या देवी द्वादशान्ते वसति विशदया प्रज्ञयैवाधिगम्या यस्याः प्राप्त्यै विधत्ते श्रुतिरपि विविधान् यज्ञदानादिधर्मान् । साक्षाच्छ्रीमीननेत्रा मघवदधिगता कुम्भजाद्यर्चिताङ्घ्रिः सा मे सोमावतंसा शिथिलयतु तमो हार्दमाशु प्रगाढम् ॥ ६॥ यस्या गेहं विशालं पुरमिव सकलं वस्तुजातं बिभर्ति यद्दृष्ट्वैवाशु मोदं वहति भुवि जनो नास्तिकोऽपि प्रकामम् । स्तम्भैर्हैमैर्विचित्रैरपि शिखरवरैर्गोपुरैः शौकनीडैः तीर्थैर्हेमाम्बुजिन्यादिभिरपि परितो भासमानं श्रियै स्तात् ॥ ७॥ सा हि श्रीरमृता सतामिति ऋचः सामानि यस्माद्यजूं- ष्याम्नायो विदधाति तत्परशिवे मीनाक्षि विद्यां त्रयीम् । सम्बोध्यामृतसौख्यहेतुमचिरादव्याजभव्यां दयां नित्यं धेहि सुते जगज्जननि ते भूयोऽपि भूयो नमः ॥ ८॥ शफरनयने शान्ताराध्ये शिवार्धशरीरिणि प्रचुरय सुखं दुःखं सर्वं विनाशय सत्वरम् । सफलय जनिं सक्तिं देहे निराकुरु सद्धने चितिसुखतनावात्मन्यास्तां मतिर्मम सन्ततम् ॥ ९॥ ॥ इति श्रीचन्द्रशेखरभारतीश्रीचरणकृतं मीनाक्षीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और रचयिता

श्री मीनाक्षी स्तोत्रम् (Shri Minakshi Stotram) की रचना शृंगेरी शारदा पीठ के 34वें जगद्गुरु श्री चंद्रशेखर भारती महास्वामी (Sri Chandrashekhar Bharati Mahaswamigal) ने की है। वे एक 'जीवनमुक्त' संत थे और उनकी वाणी में साक्षात् सरस्वती का वास माना जाता था। यह स्तोत्र तमिलनाडु के ऐतिहासिक मदुरै (Madurai) शहर में स्थित माता मीनाक्षी (Meenakshi Amman) को समर्पित है। इस स्तोत्र में देवी के भौतिक सौंदर्य के साथ-साथ उनके दार्शनिक स्वरूप—ब्रह्मविद्या (Brahma Vidya)—का भी अद्भुत वर्णन है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Spiritual Meaning)

  • मत्स्य नयनी (The Fish-Eyed Goddess): 'मीनाक्षी' शब्द का अर्थ है—जिसकी आँखें मछली (Min/Matsya) के समान सुंदर हैं। शास्त्रों के अनुसार, मछली अपने बच्चों को केवल देखकर (by mere glance) उनका पोषण करती है। उसी प्रकार, देवी मीनाक्षी अपनी दयामयी दृष्टि (Glance of Compassion) मात्र से भक्तों का पालन और रक्षण करती हैं। श्लोक 2 में इसका सुंदर वर्णन है—"मत्स्या इवार्भान्परिपालयन्ती"
  • वीणा पाणि और विद्या: श्लोक 4 में देवी को वीणा (Veena) बजाते हुए वर्णित किया गया है। यह दर्शाता है कि वे कला और संगीत की अधिष्ठात्री हैं। साथ ही, उन्हें 'ब्रह्मविद्या' का मूर्त रूप कहा गया है जो अज्ञान को नष्ट कर आत्म-ज्ञान प्रदान करती हैं।
  • पाण्ड्य राजकुमारी: श्लोक 3 में देवी के ऐतिहासिक अवतार का उल्लेख है। उन्होंने राजा मलयध्वज पाण्ड्य (Malayadwaja Pandya) और रानी कांचनमाला की पुत्री के रूप में जन्म लिया और पाण्ड्य साम्राज्य (Pandya Kingdom) पर शासन किया। यह उनके राजराजेश्वरी स्वरूप को दर्शाता है।
  • शिव विवाह: देवी का विवाह सुंदरेश्वर (Lord Sundaresha), जो भगवान शिव का रूप हैं, के साथ हुआ। यह जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है।

फलश्रुति और लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र के श्रद्धापूर्वक पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • विद्या और ज्ञान (Knowledge & Wisdom): चूंकि देवी मीनाक्षी विद्या की देवी हैं, यह स्तोत्र छात्रों और साधकों को बुद्धि और ज्ञान प्रदान करता है।
  • अज्ञान का नाश (Removal of Ignorance): श्लोक 6 में प्रार्थना की गई है—"शिथिलयतु तमो हार्दमाशु प्रगाढम्", अर्थात मेरे हृदय के घोर अज्ञान रूपी अंधकार को शीघ्र नष्ट करें।
  • सुख और मोक्ष: यह स्तोत्र भोग (सांसारिक सुख) और मोक्ष (Spiritual Liberation) दोनों प्रदान करने वाला है। देवी को "चितिसुख" (Consciousness-Bliss) कहा गया है।

पाठ करने की विधि

  • समय: नवरात्र (Navratri) के दिनों में या शुक्रवार (Friday) को इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
  • देवी मीनाक्षी का ध्यान करते हुए, विशेष रूप से उनके हाथ में तोता (Parrot) और वीणा की कल्पना करें।
  • यह एक अष्टकम (8 verses) जैसा है, जिसमें अंतिम श्लोक (9वां) फलश्रुति और आत्म-निवेदन है।