श्री मारुती स्तोत्रम् (वासुदेवानन्द सरस्वती कृत)

॥ श्रीमारुतीस्तोत्रम् ॥
श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं ॐ नमो वायुपुत्राय भीमरूपाय धीमते । नमस्ते रामदूताय कामरूपाय श्रीमते ॥ १॥ मोहशोकविनाशाय सीताशोकविनाशिने । भग्नाशोकवनायास्तु दग्धलङ्काय वाग्मिने ॥ २॥ गतिर्निर्जितवाताय लक्ष्मणप्राणदाय च । वनौकसां वरिष्ठाय वशिने वनवासिने ॥ ३॥ तत्त्वज्ञानसुधासिन्धुनिमग्नाय महीयसे । आञ्जनेयाय शूराय सुग्रीवसचिवाय ते ॥ ४॥ जन्ममृत्यूभयघ्नाय सर्वक्लेशहराय च । नेदिष्ठाय प्रेतभूतपिशाचभयहारिणे ॥ ५॥ यातनानाशनायास्तु नमो मर्कटरूपिणे । यक्षराक्षसशार्दूलसर्पवृश्चिकभीहृते ॥ ६॥ महाबलाय वीराय चिरञ्जीविन उद्धृते । हारिणे वज्रदेहाय चोल्लङ्घितमहाब्धये ॥ ७॥ बलिनामग्रगण्याय नमो नः पाहि मारुते । लाभदोऽसि त्वमेवाशु हनुमन् राक्षसान्तक ॥ ८॥ यशो जयं च मे देहि शत्रून्नाशय नाशय । स्वाश्रितानामभयदं य एवं स्तौति मारुतिम् । हानिः कुतो भवेत्तस्य सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ९॥ ॥ इति श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं श्रीमारुतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्री मारुती स्तोत्रम् एक अत्यंत प्रभावशाली और चैतन्यमयी रचना है, जिसके रचयिता आधुनिक काल के महान दत्त अवतारी स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती (जिन्हें श्री टेम्बे स्वामी महाराज के नाम से भी जाना जाता है) हैं। टेम्बे स्वामी एक सिद्ध योगी और प्रकांड विद्वान थे। उनके द्वारा रचित स्तोत्रों में "मंत्र-शक्ति" निहित होती है। यह स्तोत्र विशेष रूप से भगवान हनुमान (मारुति) के उस उग्र और रक्षक रूप को समर्पित है, जो अपने भक्तों को अदृश्य बाधाओं, भूत-प्रेत और शत्रुओं से तत्काल मुक्ति दिलाता है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
इस स्तोत्र के 9 श्लोकों में हनुमान जी के बल, बुद्धि और रक्षक स्वरूप का अद्वितीय संगम है:
- क्लेश और भय नाशक: श्लोक 5 में स्पष्ट कहा गया है—"नेदिष्ठाय प्रेतभूतपिशाचभयहारिणे"। अर्थात्, जो प्रेत, भूत और पिशाच (evil spirits) के भय को हरने के लिए सदैव निकट रहते हैं। यह स्तोत्र नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) के विरुद्ध एक वज्र कवच है।
- जंतु और शत्रु भय निवारण: श्लोक 6 में उल्लेख है कि वे "यक्षराक्षसशार्दूलसर्पवृश्चिकभीहृते"—यक्ष, राक्षस, शेर, सांप और बिच्छू जैसे हिंसक जीवों के भय को हरने वाले हैं। यह साधक को भौतिक और दैविक दोनों प्रकार के खतरों से सुरक्षा (protection) प्रदान करता है।
- तत्वज्ञान के सागर: श्लोक 4 में उन्हें "तत्त्वज्ञानसुधासिन्धुनिमग्नाय" (तत्वज्ञान रूपी अमृत के सागर में डूबे हुए) कहा गया है। यह दर्शाता है कि उनका बल केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक और आध्यात्मिक है।
- शोक विनाशक: वे माता सीता के शोक का नाश करने वाले ("सीताशोकविनाशिने") हैं, अत: वे अपने भक्तों के अवसाद (depression) और दुखों को भी दूर करते हैं।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
स्तोत्र के अंतिम श्लोक (फलश्रुति) में इसके पाठ के लाभ स्पष्ट रूप से बताए गए हैं:
- यश और विजय (Fame and Victory): "यशो जयं च मे देहि"—साधक को समाज में यश और हर कार्य में विजय प्राप्त होती है। "सर्वत्र विजयी भवेत्"—वह जहां भी जाता है, विजयी होता है।
- शत्रु नाश (Destruction of Enemies): "शत्रून्नाशय नाशय"—यह पंक्ति शत्रुओं के दमन के लिए अत्यंत शक्तिशाली बीज मंत्र की तरह कार्य करती है। यह बाह्य शत्रुओं के साथ-साथ आंतरिक शत्रुओं (काम, क्रोध) का भी नाश करता है।
- अभय दान (Fearlessness): "स्वाश्रितानामभयदं"—जो उनकी शरण में आता है, उसे वे अभय प्रदान करते हैं। "हानिः कुतो भवेत्तस्य"—उस भक्त की कभी हानि नहीं हो सकती।
- आरोग्य और शक्ति: "महाबलाय वीराय"—उनके स्मरण मात्र से शरीर में नई ऊर्जा और बल का संचार होता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- शुभ दिन: मंगलवार (Tuesday) और शनिवार (Saturday) को, विशेषकर संध्या काल में या रात में सोने से पहले इसका पाठ करना चाहिए।
- भय निवारण हेतु: यदि किसी को बुरे सपने आते हों या अनजाना भय सताता हो, तो सोने से पहले 3 बार इस स्तोत्र का पाठ करें।
- शत्रु बाधा हेतु: शत्रुओं से रक्षा के लिए, हनुमान जी के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाकर, इस स्तोत्र का 11 बार पाठ लगातार 21 दिनों तक करें।
- सामग्री: पाठ के दौरान हनुमान जी को सिंदूर और लाल पुष्प अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।