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श्री महाकाल स्तोत्रम् (बौद्ध धर्मपाल)

श्री महाकाल स्तोत्रम् (बौद्ध धर्मपाल)

॥ श्रीमहाकालस्तोत्रम् ॥

नमस्यामि महाकालं सर्वसम्पत्तिदायकम् । खर्वं लम्बोदरं नीलमष्टनागविभूषितम् ॥ १॥ द्विभुजैकमुखं वीरं कपालकृतशेखरम् । व्याघ्रचर्मकटीवेष्टं शतार्धमुण्डमालिनम् ॥ २॥ भावाभावपरिच्छिन्नं जगत्सम्बोधकारकम् । सर्वभावात्मकं नाथं जगन्नाथ नमोऽस्तु ते ॥ ३॥ कृष्णवर्णं महातेजं सिद्धसाधकरक्षकम् । कर्तिकपालिनं नाथं महाकाल नमोऽस्तु ते ॥ ४॥ व्याघ्रचर्माम्बरधरं महाक्रोधस्वरूपिणम् । द्वादशादित्यसङ्काशं महाकाल नमोऽस्तु ते ॥ ५॥ महादंष्ट्राकरालास्यं ललज्जिह्व सभैरवम् । महारक्ताभनयनं महाकाल नमोऽस्तु ते ॥ ६॥ विभ्रन्नरशिरोमालां नागराजविभूषितम् । श्मश्रुतुन्दिलकं वन्यं महाकाल नमोऽस्तु ते ॥ ७॥ सभ्रूभङ्गं त्रिनेत्रं चैवोर्ध्वपिङ्गोर्ध्वकेसरम् । युगान्तानलपुञ्जाभं महाकाल नमोऽस्तु ते ॥ ८॥ त्रासकं सर्वदैत्याना(मस्थ्य)सृड्यांसभक्षकम् । रक्षितारं भक्तिमतां महाकाल नमोऽस्तु ते ॥ ९॥ सिद्धिसाधनमन्त्रस्य विहेठीज्यनराशनम् । युग्मस्याश्वासदातारं महाकाल नमोऽस्तु ते ॥ १०॥ संसारजलधेः पारं नौका यानैकगामिनी । नौकायाने स्वतेजास्त्वं महाकाल नमोऽस्तु ते ॥ ११॥

फलश्रुतिः

महाकालस्तवं चैतद् यः पठेद् भक्तिमान् नरः । भयार्तो मुच्यते भीतेररिचिन्ता निवर्तते ॥ १२॥ महाकालं नमस्कृत्य यथोक्तकुलजन्मतः । तेन सुजन्मा भवति सर्वसिद्धिपरायणः ॥ १३॥ ॥ इति श्रीमहाकालस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

श्री महाकाल स्तोत्रम्, वज्रयान (बौद्ध) परम्परा के एक प्रमुख देवता, महाकाल को समर्पित है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि ये हिंदू धर्म के उज्जैन स्थित महाकाल (शिव) से भिन्न हैं। बौद्ध धर्म में, महाकाल एक धर्मपाल (Dharmapala) अर्थात् 'धर्म के रक्षक' हैं। वे एक प्रबुद्ध प्राणी हैं जिन्होंने बोधिसत्व अवलोकितेश्वर के क्रोधपूर्ण रूप में प्रकट होकर धर्म और उसके अनुयायियों की रक्षा करने की शपथ ली है। यह स्तोत्र उनके इसी उग्र और कृपापूर्ण स्वरूप की वंदना करता है। उन्हें 'सर्वसम्पत्तिदायकम्' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे साधकों को भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार की सम्पदा प्रदान करते हैं। यह स्तुति बाधाओं को दूर करने और साधना के मार्ग को सुरक्षित करने के लिए एक शक्तिशाली आह्वान है।

पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)

वज्रयान बौद्ध धर्म की कथाओं के अनुसार, महाकाल का उद्भव करुणा के बोधिसत्व, अवलोकितेश्वर से हुआ है। जब अवलोकितेश्वर ने देखा कि कई प्राणी नकारात्मक कर्मों और बाधाओं के कारण धर्म के मार्ग से भटक रहे हैं, तो उन्होंने उनकी रक्षा के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली और क्रोधपूर्ण रूप धारण करने का संकल्प लिया। इस संकल्प से उनके हृदय से एक गहरा नीला 'हूँ' अक्षर प्रकट हुआ, जिससे महाकाल का जन्म हुआ। उनका भयानक स्वरूप बाहरी दुष्ट शक्तियों को डराने के लिए नहीं, बल्कि साधक के आंतरिक शत्रुओं—अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, और अज्ञान—को नष्ट करने के लिए है। स्तोत्र में वर्णित उनका स्वरूप (महादंष्ट्राकरालास्यं, महारक्ताभनयनं) इसी प्रतीकात्मक अर्थ को दर्शाता है। वे धर्म के मार्ग पर चलने वाले साधकों के लिए एक पिता के समान रक्षक हैं।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

यह स्तोत्र महाकाल के बाह्य स्वरूप के साथ-साथ उनके आंतरिक गुणों का भी वर्णन करता है:
  • व्याघ्रचर्म और मुण्डमालिनम् (Tiger Skin and Skull Garland): बाघ की खाल पहनना उनकी निर्भयता और सभी भयों पर विजय का प्रतीक है, जबकि मुंडों की माला संसार के जीवन-मृत्यु चक्र से परे उनकी अवस्था को दर्शाती है।
  • त्रासकं सर्वदैत्यानां... रक्षितारं भक्तिमतां (Terror to Demons, Protector of Devotees): वे 'दैत्यों' (आंतरिक क्लेशों) के लिए भय का स्रोत हैं, लेकिन भक्तों (भक्तिमतां) के लिए वे परम रक्षक हैं। यह उनके दोहरे स्वरूप—क्रोध और करुणा—को एक साथ प्रकट करता है।
  • जगत्सम्बोधकारकम् (Awakener of the World): वे केवल रक्षक ही नहीं, बल्कि संसार को परम सत्य का बोध कराने वाले गुरु भी हैं। उनकी कृपा से अज्ञान का अंधकार नष्ट होता है।
  • संसारजलधेः पारं नौका (Boat across the Ocean of Samsara): यह एक गहरा बौद्ध दर्शन है। महाकाल स्वयं वह नाव हैं जो साधक को इस दुःख भरे संसार सागर से निकालकर निर्वाण के तट तक ले जाती है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

स्तोत्र के अंतिम श्लोकों में इसके पाठ से मिलने वाले स्पष्ट लाभ बताए गए हैं:
  • भय और शत्रु से मुक्ति (Freedom from Fear and Enemies): "भयार्तो मुच्यते भीतेररिचिन्ता निवर्तते" - जो व्यक्ति भय से पीड़ित होकर इसका पाठ करता है, वह भय से मुक्त हो जाता है और शत्रुओं की चिंता समाप्त हो जाती है। यह जीवन में शक्तिशाली सुरक्षा (powerful protection) प्रदान करता है।
  • सर्वसिद्धि की प्राप्ति (Attainment of All Siddhis): जो यथोक्त विधि से महाकाल को नमस्कार करता है, वह "सर्वसिद्धिपरायणः" हो जाता है, अर्थात् उसे सभी प्रकार की भौतिक और आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
  • बाधाओं का निवारण (Removal of Obstacles): महाकाल का आह्वान करने से साधना, व्यवसाय और जीवन के मार्ग में आने वाली सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं।
  • सम्पन्नता और सफलता (Prosperity and Success): उन्हें "सर्वसम्पत्तिदायकम्" कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे साधक को हर प्रकार की सफलता और सम्पन्नता प्रदान करते हैं।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • यह स्तोत्र वज्रयान परम्परा का है, इसलिए इसे पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ना चाहिए।
  • इसका पाठ करने का सबसे अच्छा समय सुबह या शाम का होता है, जब मन शांत हो।
  • पाठ शुरू करने से पहले, अपने मन में सभी प्राणियों के कल्याण की भावना (बोधिसत्व) रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सभी की सुरक्षा और ज्ञान के लिए प्रार्थना करें।
  • साधक अपने सामने महाकाल के चित्र या मूर्ति को रखकर, धूप और दीपक जलाकर, उनके उग्र स्वरूप में छिपी करुणा का ध्यान करते हुए पाठ कर सकते हैं।
  • किसी विशेष संकट या भय के समय इस स्तोत्र का पाठ तत्काल राहत और सुरक्षा प्रदान कर सकता है।