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श्रीमधुसूदनस्तोत्रम् (शुकदेव रचित)

श्रीमधुसूदनस्तोत्रम् (शुकदेव रचित)

॥ श्रीमधुसूदनस्तोत्रम् ॥

ओमिति ज्ञानमात्रेण रोगाजीर्णेन निर्जिता । कालनिद्रां प्रपन्नोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥ १॥ न गतिर्विद्यते चान्या त्वमेव शरणं मम । पापपङ्के निमग्नोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥ २॥ मोहितो मोहजालेन पुत्रदारगृहादिषु । तृष्णया पीड्यमानोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥ ३॥ भक्तिहीनं च दीनं च दुःखशोकातुरं प्रभो । अनाश्रयमनाथं च त्राहि मां मधुसूदन ॥ ४॥ गतागतेन श्रान्तोऽस्मि दीर्घसंसारवर्त्मसु । येन भूयो न गच्छामि त्राहि मां मधुसूदन ॥ ५॥ बहवो हि मया दृष्टाः क्लेशाश्चैव पृथक् पृथक् । गर्भवासे महद्दुःखं त्राहि मां मधुसूदन ॥ ६॥ तेन देव प्रपन्नोऽस्मि त्राणार्थं त्वत्परायणः । दुःखार्णवपरित्राणात् त्राहि मां मधुसूदन ॥ ७॥ वाचा यच्च प्रतिज्ञातं कर्मणा नोपपादितम् । तत्पापार्जितमग्नोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥ ८॥ सुकृतं न कृतं किञ्चिदुष्कृतं च कृतं मया । संसारघोरे मग्नोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥ ९॥ देहान्तरसहस्रेषु चान्योन्यभ्रामितो मया । तिर्यक्त्वं मानुषत्वं च त्राहि मां मधुसूदन ॥ १०॥ वाचयामि यथोन्मत्तः प्रलपामि तवाग्रतः । जरामरणभीतोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥ ११॥ यत्र यत्र च यातोऽस्मि स्त्रीषु वा पुरुषेषु च । तत्र तत्राचला भक्तिस्त्राहि मां मधुसूदन ॥ १२॥ गत्वा गत्वा निवर्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः । अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः ॥ १३॥ ऊर्ध्वपातालमत्येषु व्याप्तं लोकं जगत्त्रयम् । द्वादशाक्षरात्परं नास्ति वासुदेवेन भाषितम् ॥ १४॥ द्वादशाक्षरं महामन्त्रं सर्वकामफलप्रदम् । गर्भवासनिवासेन शुकेन परिभाषितम् ॥ १५॥ द्वादशाक्षरं निराहारो यः पठेद्धरिवासरे । स गच्छेद्वैष्णवं स्थानं यत्र योगेश्वरो हरिः ॥ १६॥ ॥ इति श्रीशुकदेवविरचितं मधुसूदनस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

श्रीमधुसूदनस्तोत्रम् एक अत्यंत मार्मिक और भक्तिपूर्ण स्तुति है, जिसके रचयिता परम ज्ञानी श्री शुकदेव जी माने जाते हैं, जो महर्षि वेदव्यास के पुत्र और श्रीमद्भागवत महापुराण के मुख्य वक्ता हैं। इस स्तोत्र की विशेषता इसकी सरलता और गहरी भावनात्मक पुकार में है। प्रत्येक श्लोक में "त्राहि मां मधुसूदन" (हे मधुसूदन, मेरी रक्षा करो) की आवृत्ति, एक थके हुए, पीड़ित और संसार के बंधनों में उलझे हुए जीव की आतंरिक व्यथा को प्रकट करती है। यह स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण (complete surrender) और मोक्ष की एक सच्ची प्रार्थना है। मधुसूदन, अर्थात मधु नामक दैत्य का संहार करने वाले, यहाँ अज्ञान और अहंकार रूपी राक्षसों को नष्ट करने वाले प्रतीक के रूप में पूजे गए हैं।

पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)

श्री शुकदेव जी जन्म से ही विरक्त और ज्ञानी थे। कहा जाता है कि वे गर्भ में रहते हुए ही संसार के दुःखों (गर्भवासे महद्दुःखं) को जान गए थे और जन्म नहीं लेना चाहते थे, क्योंकि उन्हें माया के बंधन का भय था। भगवान कृष्ण के आश्वासन पर ही उन्होंने जन्म लिया। यह स्तोत्र उसी वैराग्य और संसार के प्रति गहरी समझ का परिणाम है। शुकदेव जी ने स्वयं जन्म-मृत्यु के चक्र (गतागतेन श्रान्तोऽस्मि), मोह-माया के जाल (मोहजालेन पुत्रदारगृहादिषु), और पाप-पुण्य के कर्मों के बंधन को गहराई से अनुभव किया। इसलिए, जब वे "त्राहि मां मधुसूदन" कहते हैं, तो यह केवल शब्द नहीं, बल्कि एक सिद्ध आत्मा का अनुभव है जो अन्य सभी साधकों को भगवान की शरण में जाने के लिए प्रेरित करता है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

यह स्तोत्र एक भक्त की आध्यात्मिक यात्रा के विभिन्न चरणों को दर्शाता है:
  • पापों की स्वीकृति (Acceptance of Flaws): "पापपङ्के निमग्नोऽस्मि" (मैं पाप के कीचड़ में डूबा हुआ हूँ) कहकर भक्त अपने दोषों को स्वीकार करता है, जो शुद्धिकरण का पहला चरण है।
  • मोह से मुक्ति की प्रार्थना (Prayer for Detachment): "मोहितो मोहजालेन पुत्रदारगृहादिषु" (मैं पुत्र, पत्नी और घर के मोह जाल में फँसा हूँ) यह दर्शाता है कि सांसारिक लगाव (worldly attachments) ही दुःख का मूल कारण है।
  • जन्म-मृत्यु से थकावट (Weariness from Rebirth): "गतागतेन श्रान्तोऽस्मि दीर्घसंसारवर्त्मसु" (मैं इस लंबे संसार पथ पर आने-जाने से थक गया हूँ) यह जीव की उस पीड़ा को व्यक्त करता है जो बार-बार जन्म लेने से होती है।
  • द्वादशाक्षर मंत्र की महिमा (Glory of Dwadashakshara Mantra): स्तोत्र का अंत "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" इस द्वादशाक्षर महामंत्र की सर्वोच्चता का गुणगान करता है। शुकदेव जी कहते हैं कि सूर्य-चंद्रमा भी लौटकर आते हैं, पर इस मंत्र का चिंतन करने वाला भक्त लौटकर नहीं आता, अर्थात् वह मोक्ष को प्राप्त होता है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को अनेक आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं:
  • पूर्ण शरणागति और अभय (Complete Surrender and Fearlessness): बार-बार "त्राहि मां" का उच्चारण करने से मन में शरणागति का भाव दृढ़ होता है और भगवान की कृपा से सभी प्रकार के भय (fear of death, sin, attachment) दूर होते हैं।
  • पापों का नाश (Destruction of Sins): जो व्यक्ति अपने पापों का पश्चाताप करते हुए भगवान मधुसूदन को पुकारता है, भगवान उसके सभी पापों को नष्ट कर देते हैं।
  • वैराग्य और मानसिक शांति (Detachment and Mental Peace): यह स्तोत्र मन को सांसारिक मोह-माया से हटाकर भगवान के चरणों में लगाने की प्रेरणा देता है, जिससे साधक को सच्ची मानसिक शांति (mental peace) मिलती है।
  • मोक्ष की प्राप्ति (Attainment of Moksha): स्तोत्र के अंत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि द्वादशाक्षर मंत्र का जाप और इस स्तोत्र का पाठ करने वाला भक्त भगवान के वैष्णव धाम को प्राप्त करता है, जहाँ से उसे पुनः लौटकर नहीं आना पड़ता।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे उत्तम दिन एकादशी (हरिवासर) है। फलश्रुति के अनुसार, इस दिन निराहार रहकर पाठ करने से वैष्णव धाम की प्राप्ति होती है।
  • इसे प्रतिदिन की पूजा में, विशेषकर प्रातःकाल या संध्याकाल में, शामिल किया जा सकता है।
  • जब भी मन अत्यंत दुखी, अशांत या संसार से विरक्त हो, तो इस स्तोत्र का पाठ करने से अद्भुत शांति और संबल मिलता है।
  • पाठ करते समय भगवान विष्णु या श्री कृष्ण के मधुसूदन स्वरूप का ध्यान करें और प्रत्येक श्लोक के अंत में पूरी श्रद्धा से "त्राहि मां मधुसूदन" का उच्चारण करें।