Logoपवित्र ग्रंथ

श्रीहनुमत्स्तोत्रम् (सर्वसुखावहम्)

श्रीहनुमत्स्तोत्रम् (सर्वसुखावहम्)
महेश्वर उवाच ।
श‍ृणु देवि प्रवक्ष्यामि स्तोत्रं सर्वसुखावहम् ।
सर्वकामप्रदं नॄणां हनुमत्स्तोत्रमुत्तमम् ॥ १॥

तप्तहाटकसङ्काशं नानापुष्पविराजितम् ।
उद्यद्बालार्कवदनं त्रिनेत्रं कुण्डलोज्ज्वलम् ॥ २॥

मौञ्जीकौपीनकं हेममययज्ञोपवीतिनम् ।
पिङ्गलाक्षं महाकायं टङ्कशैलेन्द्रधारिणम् ॥ ३॥

मूर्तित्रयात्मकं वीरं महाशौर्यं महाहनुम् ।
हनुमन्तं वायुसूनुं नमामि ब्रह्मचारिणम् ॥ ४॥

त्रिवर्णाक्षरमन्त्रस्थं जपाकुसुमसन्निभम् ।
नानाभूषणसंयुक्तमाञ्जनेयं नमाम्यहम् ॥ ५॥

पञ्चाक्षरस्थितं देवं नीलनीरदसन्निभम् ।
पूजितं सर्वदेवैस्तु राक्षसारिं नमाम्यहम् ॥ ६॥

अचलद्युतिसङ्काशं सर्वालङ्कारभूषितम् ।
षडक्षरयुतं देवं नमामि ब्रह्मचारिणम् ॥ ७॥

सप्तवर्णमयं देवं हरीशं तं सुरार्चितम् ।
सुन्दरास्याब्जसंयुक्तं त्रिनेत्रं तं नमाम्यहम् ॥ ८॥

अष्टादशाधिपं देवं हेमवर्णं महातनुम् ।
नमामि जगतां वन्द्यं लङ्काप्रासाददाहनम् ॥ ९॥

अतसीपुष्पसङ्काशं दशवर्णात्मकं विभुम् ।
जटाधरं चतुर्बाहुं नमामि कपिनायकम् ॥ १०॥

द्वादशाक्षरमन्त्रस्य नायकं कुन्तधारिणम् ।
हेमवर्णलसत्कायं भजे सुग्रीवमन्त्रिणम् ॥ ११॥

मालामन्त्रात्मकं देवं त्रिवर्णं च चतुर्भुजम् ।
पाशाङ्कुशधरं देवं कपिवर्यं नमाम्यहम् ॥ १२॥

त्रयोदशाक्षरहितं सीतादुःखनिवारणम् ।
सुरासुरगणैः सर्वैः संस्तुतं प्रणमाम्यहम् ॥ १३॥

हाहाकारमुखान्तनित्यदहनज्वालासमूहोज्ज्वलं
विद्वन्मण्डलजातरोषपरुषं श्रीरामदासं विभुम् ।
सञ्चूर्णीकृतधूम्रलोचनमहाह्यक्षादिरक्षोबलं
तं वन्दे रविधारणं सुरवरैर्वन्द्यं समीरात्मजम् ॥ १४॥

रघुपतिपदभक्तं किङ्किणीकोत्तमाङ्गं
मुकुलितकरपद्मं मोदयानं तरङ्गे ।
पुलकितविपुलाङ्गं पुण्यलीलानुषङ्गं
वनचरकुलनाथं वायुपुत्रं नतोऽस्मि ॥ १५॥

॥ इति उमासंहितायां श्रीहनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

यह श्रीहनुमत्स्तोत्रम्, जैसा कि इसके प्रथम श्लोक में ही कहा गया है, "सर्वसुखावहम्" अर्थात् 'सभी प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाला' है। यह स्तुति भगवान हनुमान (Lord Hanuman) के विभिन्न मन्त्रात्मक और दिव्य स्वरूपों का ध्यान कराती है। इसमें भगवान शिव, देवी पार्वती को हनुमान जी के उन रूपों का वर्णन करते हैं जो विभिन्न अक्षर-संख्या वाले मंत्रों से जुड़े हैं, जैसे त्रिवर्णाक्षर (तीन अक्षर), पञ्चाक्षर (पांच अक्षर), षडक्षर (छह अक्षर) आदि। प्रत्येक स्वरूप का अपना एक विशिष्ट वर्ण, गुण और शक्ति है। यह स्तोत्र हनुमान जी को केवल एक भक्त के रूप में नहीं, बल्कि एक मन्त्रात्मक देवता (deity embodied in mantras) के रूप में प्रस्तुत करता है, जिनका ध्यान करने मात्र से सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ

इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को अनेक अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:
  • सर्वकामना पूर्ति (Fulfillment of All Desires): स्तोत्र के आरंभ में ही इसे "सर्वकामप्रदं" कहा गया है। इसका नित्य ध्यान करने से व्यक्ति के मन में स्थित सभी सात्विक इच्छाएं (righteous desires) शीघ्र ही पूर्ण होती हैं।
  • पापों से मुक्ति (Freedom from Sins): अंतिम श्लोक में कहा गया है, "एवं ध्यायेन्नरो नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते" - जो व्यक्ति नित्य इस प्रकार से हनुमान जी का ध्यान करता है, वह सभी पापों (sins) से मुक्त हो जाता है।
  • भय से मुक्ति (Freedom from Fear): भगवान शिव स्वयं इस स्तोत्र को "सर्वभयापहम्" कहते हैं, जिसका अर्थ है कि यह सभी प्रकार के ज्ञात और अज्ञात भय (fear) को हरने वाला है।
  • कार्यों की शीघ्र सिद्धि (Quick Accomplishment of Tasks): फलश्रुति यह सुनिश्चित करती है कि पाठक के सोचे हुए सभी कार्य "शीघ्रमेव न संशयः" अर्थात् शीघ्र ही और बिना किसी संदेह के पूर्ण हो जाते हैं।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह एक ध्यान स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ किसी भी हनुमान मंत्र के जाप से पहले करना अत्यंत लाभकारी होता है। यह उस मंत्र से जुड़े देवता के स्वरूप को मन में स्थापित करने में मदद करता है।
  • प्रातःकाल या संध्याकाल में, पूजा स्थान पर शांत चित्त से बैठकर, आँखें बंद करके इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक के अनुसार हनुमान जी के दिव्य स्वरूप की मन में कल्पना करें।
  • मंगलवार (Tuesday) और शनिवार (Saturday) को इस ध्यान का अभ्यास करना विशेष रूप से शुभ और फलदायी माना जाता है।
  • यह स्तोत्र विभिन्न हनुमान मंत्रों के साधकों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है, जो उन्हें अपने इष्ट मंत्र के अनुरूप हनुमान जी के स्वरूप का ध्यान करने की विधि बताता है।