श्रीहनुमन्नवरत्नपद्यमाला

श्रितजनपरिपालं रामकार्यानुकूलं
धृतशुभगुणजालं यातुतन्त्वार्तिमूलम् ।
स्मितमुखसुकपोलं पीतपाटीरचेलं
पतिनतिनुतिलोलं नौमि वातेशबालम् ॥ १॥
दिनकरसुतमित्रं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं
शिशुतनुकृतचित्रं रामकारुण्यपात्रम् ।
अशनिसदृशगात्रं सर्वकार्येषु जैत्रं
भवजलधिवहित्रं स्तौमि वायोः सुपुत्रम् ॥ २॥
मुखविजितशशाङ्कं चेतसा प्राप्तलङ्कं
गतनिशिचरशङ्कं क्षालितात्मीयपङ्कम् ।
नगकुसुमविटङ्कं त्यक्तशापाख्यशृङ्गं
रिपुहृदयलटङ्कं नौमि रामध्वजाङ्कम् ॥ ३॥
दशरथसुतदूतं सौरसास्योद्गगीतं
हतशशिरिपुसूतं तार्क्ष्यवेगातिपातम् ।
मितसगरजखातं मार्गिताशेषकेतं
नयनपथगसीतं भावये वातजातम् ॥ ४॥
निगदितसुखिरामं सान्त्वितैक्ष्वाकुवामं
कृतविपिनविरामं सर्वरक्षोऽतिभीमम् ।
रिपुकुलकलिकामं रावणाख्याब्जसोमं
मतरिपुबलसीमं चिन्तये तं निकामम् ॥ ५॥
निहतनिखिलशूरः पुच्छवह्निप्रचारः
द्रुतगतपरतीरः कीर्तिताशेषसारः ।
समसितमधुधारो जातपम्पावतारो
नतरघुकुलवीरः पातु वायोः कुमारः ॥ ६॥
कृतरघुपतितोषः प्राप्तसीताङ्गभूषः
कथितचरितशेषः प्रोक्तसीतोक्तभाषः ।
मिलितसखिहनूषः सेतुजाताभिलाषः
कृतनिजपरिपोषः पातु कीनाशवेषः ॥ ७॥
क्षपितबलिविपक्षो मुष्टिपातार्तरक्षः
रविजनपरिमोक्षो लक्ष्मणोद्धारदक्षः ।
हृतमृतिपरपक्षो जातसीतापरोक्षो
विरमितरणदीक्षः पातु मां पिङ्गलाक्षः ॥ ८॥
सुखितसुहृदनीकः पुष्पयानप्रतीकः
शमितभरतशोको दृष्टरामाभिषेकः ।
स्मृतपतिसुखिसेको रामभक्तप्रवेकः
पवनसुकृतपाकः पातु मां वायुतोकः ॥ ९॥
अष्टाश्रीकृतनवरत्नपद्ममालां
भक्त्या श्रीहनुमदुरःस्थले निबद्धाम् ।
सङ्गृह्य प्रयतमना जपेत् सदा यः
सोऽभीष्टं हरिवरतो लभेत शीघ्रम् ॥ १०॥
॥ इति श्रीहनूमन्नवरत्नपद्यमाला समाप्ता ॥
धृतशुभगुणजालं यातुतन्त्वार्तिमूलम् ।
स्मितमुखसुकपोलं पीतपाटीरचेलं
पतिनतिनुतिलोलं नौमि वातेशबालम् ॥ १॥
दिनकरसुतमित्रं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं
शिशुतनुकृतचित्रं रामकारुण्यपात्रम् ।
अशनिसदृशगात्रं सर्वकार्येषु जैत्रं
भवजलधिवहित्रं स्तौमि वायोः सुपुत्रम् ॥ २॥
मुखविजितशशाङ्कं चेतसा प्राप्तलङ्कं
गतनिशिचरशङ्कं क्षालितात्मीयपङ्कम् ।
नगकुसुमविटङ्कं त्यक्तशापाख्यशृङ्गं
रिपुहृदयलटङ्कं नौमि रामध्वजाङ्कम् ॥ ३॥
दशरथसुतदूतं सौरसास्योद्गगीतं
हतशशिरिपुसूतं तार्क्ष्यवेगातिपातम् ।
मितसगरजखातं मार्गिताशेषकेतं
नयनपथगसीतं भावये वातजातम् ॥ ४॥
निगदितसुखिरामं सान्त्वितैक्ष्वाकुवामं
कृतविपिनविरामं सर्वरक्षोऽतिभीमम् ।
रिपुकुलकलिकामं रावणाख्याब्जसोमं
मतरिपुबलसीमं चिन्तये तं निकामम् ॥ ५॥
निहतनिखिलशूरः पुच्छवह्निप्रचारः
द्रुतगतपरतीरः कीर्तिताशेषसारः ।
समसितमधुधारो जातपम्पावतारो
नतरघुकुलवीरः पातु वायोः कुमारः ॥ ६॥
कृतरघुपतितोषः प्राप्तसीताङ्गभूषः
कथितचरितशेषः प्रोक्तसीतोक्तभाषः ।
मिलितसखिहनूषः सेतुजाताभिलाषः
कृतनिजपरिपोषः पातु कीनाशवेषः ॥ ७॥
क्षपितबलिविपक्षो मुष्टिपातार्तरक्षः
रविजनपरिमोक्षो लक्ष्मणोद्धारदक्षः ।
हृतमृतिपरपक्षो जातसीतापरोक्षो
विरमितरणदीक्षः पातु मां पिङ्गलाक्षः ॥ ८॥
सुखितसुहृदनीकः पुष्पयानप्रतीकः
शमितभरतशोको दृष्टरामाभिषेकः ।
स्मृतपतिसुखिसेको रामभक्तप्रवेकः
पवनसुकृतपाकः पातु मां वायुतोकः ॥ ९॥
अष्टाश्रीकृतनवरत्नपद्ममालां
भक्त्या श्रीहनुमदुरःस्थले निबद्धाम् ।
सङ्गृह्य प्रयतमना जपेत् सदा यः
सोऽभीष्टं हरिवरतो लभेत शीघ्रम् ॥ १०॥
॥ इति श्रीहनूमन्नवरत्नपद्यमाला समाप्ता ॥
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इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
श्रीहनुमन्नवरत्नपद्यमाला, जिसका अर्थ है 'श्री हनुमान के नौ रत्नों (श्लोकों) की माला', एक अत्यंत सुंदर और सारगर्भित स्तुति है। यह स्तोत्र भगवान हनुमान (Lord Hanuman) के नौ प्रमुख गुणों और लीलाओं को नौ रत्नों के समान प्रस्तुत करता है। इसमें हनुमान जी के भक्त-पालक स्वरूप, राम-कार्य के प्रति उनकी अनुकूलता, उनके पंचमुख-त्रिनेत्र जैसे दिव्य रूप, समुद्र लांघने का पराक्रम, और श्री राम के ध्वज पर विराजमान होने का गौरवगान किया गया है। अपनी संक्षिप्तता और मधुर काव्य-शैली के कारण यह स्तोत्र भक्तों के लिए नित्य पाठ करने हेतु अत्यंत उपयुक्त है।
स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति पर आधारित)
इस पद्यमाला का अंतिम श्लोक (फलश्रुति) इसके पाठ से प्राप्त होने वाले अचूक लाभों को स्पष्ट करता है:
- शीघ्र मनोकामना पूर्ति (Quick Fulfillment of Desires): फलश्रुति में स्पष्ट रूप से कहा गया है, "सोऽभीष्टं हरिवरतो लभेत शीघ्रम्" - जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इस नवरत्नमाला का सदा जप करता है, वह श्रेष्ठ वानर, श्री हनुमान जी से अपने अभीष्ट (मनवांछित) फल को शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।
- भक्तों की रक्षा (Protection of Devotees): स्तोत्र का आरंभ ही "श्रितजनपरिपालं" से होता है, जिसका अर्थ है 'शरण में आए हुए लोगों का पालन करने वाले'। यह हनुमान जी के रक्षक स्वरूप को दर्शाता है, जो भक्तों को सभी संकटों से बचाते हैं।
- शत्रुओं पर विजय (Victory over Enemies): हनुमान जी को "यातुतन्त्वार्तिमूलम्" (राक्षसों के वंश की पीड़ा का मूल कारण) और "रिपुहृदयलटङ्कं" (शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाले) कहा गया है। उनके इस स्वरूप का ध्यान करने से भक्तों को शत्रुओं पर विजय (victory over enemies) प्राप्त होती है।
- सर्वकार्य सिद्धि (Success in All Endeavors): उन्हें "सर्वकार्येषु जैत्रं" अर्थात् सभी कार्यों में विजयी बताया गया है। उनके इस गुण का स्मरण करने से साधक को अपने सभी कार्यों में सफलता (success) मिलती है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
- यह एक संक्षिप्त स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ अपनी नित्य पूजा में आसानी से शामिल किया जा सकता है।
- प्रातःकाल स्नान के बाद हनुमान जी के चित्र के समक्ष बैठकर, घी का दीपक जलाकर पूर्ण श्रद्धा से इसका पाठ करें।
- मंगलवार (Tuesday) और शनिवार (Saturday) को इस पद्यमाला का पाठ करना विशेष रूप से शुभ और फलदायी होता है।
- फलश्रुति के अनुसार, यदि संभव हो तो इस पद्यमाला को (कागज पर लिखकर या पुस्तक रूप में) हनुमान जी के वक्षस्थल पर धारण करके (स्पर्श कराके) जप करना चाहिए, इससे मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।