श्रीहनुमद्रक्षास्तोत्रम् (वामे करे वैरिभिदं)

॥ श्रीहनुमद्रक्षास्तोत्रम् ॥
वामे करे वैरिभिदं वहन्तं शैलं परे शृङ्खलहारटङ्कम् । ददानमच्छाच्छसुवर्णवर्णं भजे ज्वलत्कुण्डलमाञ्जनेयम् ॥ १॥ पद्मरागमणिकुण्डलत्विषा पाटलीकृतकपोलमस्तकम् । दिव्यहेमकदलीवनान्तरे भावयामि पवमाननन्दनम् ॥ २॥ उद्यदादित्यसङ्काशमुदारभुजविक्रमम् । कन्दर्पकोटिलावण्यं सर्वविद्याविशारदम् ॥ ३॥ श्रीरामहृदयानन्दं भक्तकल्पमहीरुहम् । अभयं वरदं दोर्भ्यां कलये मारुतात्मजम् ॥ ४॥ वामहस्ते महाकृच्छ्रदशास्यकरमर्दनम् । उद्यद्वीक्षणकोदण्डं हनूमन्तं विचिन्तयेत् ॥ ५॥ स्फटिकाभं स्वर्णकान्तिं द्विभुजं च कृताञ्जलिम् । कुण्डलद्वयसंशोभिमुखाम्भोजं हरिं भजे ॥ ६॥ ॥ इति श्रीहनुमद्रक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्रीहनुमद्रक्षास्तोत्रम् (जो "वामे करे" से प्रारंभ होता है) भगवान हनुमान की एक दुर्लभ और अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है। यह स्तोत्र हनुमान जी के उस स्वरूप का ध्यान कराता है जिसमें वे एक हाथ में पर्वत (शैल) और दूसरे में शृंखल-हार-टंक (शस्त्र/आयुध) धारण किए हुए हैं। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली रक्षा कवच (Raksha Kavach) है। इसमें हनुमान जी के 'विचित्र' और 'दिव्य' स्वरूप का वर्णन है जो भक्तों को शत्रुओं, भय और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखता है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
इस लघु स्तोत्र के 6 श्लोकों में हनुमान जी के दिव्य विग्रह का अद्भुत चित्रण है:
- वैरिभिदं (Destroyer of Enemies): पहले श्लोक में उन्हें "वैरिभिदं" कहा गया है, जिसका अर्थ है शत्रुओं का भेदन करने वाला। वे अपने बाएं हाथ में पर्वत धारण करते हैं, जो उनकी असीम शक्ति का प्रतीक है।
- दिव्य कांति (Divine Radiance): श्लोक 1 और 6 में उन्हें "सुवर्णवर्णं" (सोने जैसे रंग वाले) और "स्फटिकाभं" (स्फटिक मणि जैसे निर्मल) बताया गया है। यह उनकी आंतरिक शुद्धता और बाहरी तेज का द्योतक है।
- सर्वविद्या विशारद (Master of All Sciences): श्लोक 3 में उन्हें "सर्वविद्याविशारदम्" कहा गया है। वे न केवल बल के, बल्कि बुद्धि और ज्ञान के भी देवता हैं।
- अभय और वरद (Protection and Boons): श्लोक 4 में कहा गया है कि वे अपनी दोनों भुजाओं से "अभय" (fearlessness) और "वरद" (boons) मुद्रा धारण करते हैं, जो भक्तों को सुरक्षा और मनोकामना पूर्ति का आश्वासन देती है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
इस स्तोत्र के नित्य पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- शत्रु नाश (Destruction of Enemies): "वैरिभिदं"—यह स्तोत्र शत्रुओं और विरोधियों के कुचक्रों को विफल करने में अचूक है।
- भय मुक्ति (Freedom from Fear): "अभयं वरदं"—इसके पाठ से मन का भय, चिंता और असुरक्षा की भावना समाप्त होती है।
- बुद्धि और विद्या: छात्रों के लिए यह स्तोत्र बहुत लाभकारी है क्योंकि यह "सर्वविद्या" प्रदान करने वाला है।
- कठिन संकटों से रक्षा: "महाकृच्छ्र... मर्दनम्"—जीवन के बड़े से बड़े संकट (महाकृच्छ्र) और कष्टों को यह स्तोत्र कुचल देता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- ध्यान: पाठ शुरू करने से पहले श्लोक 1 के अनुसार ध्यान करें—हनुमान जी बाएं हाथ में पर्वत लिए हुए हैं, स्वर्ण जैसे चमक रहे हैं और कानों में कुंडल झिलमिला रहे हैं।
- समय: प्रातःकाल (सूर्य उदय के समय) या संध्याकाल में इसका पाठ करना श्रेष्ठ है। "उद्यदादित्यसङ्काशम्" पंक्ति सूर्योदय के समय उनके तेज के ध्यान का संकेत देती है।
- दिन: मंगलवार और शनिवार को लाल फूल अर्पित करके 11 बार पाठ करें।
- संकल्प: यात्रा पर जाने से पहले या किसी नए कार्य के आरंभ में इसका एक बार पाठ 'रक्षा कवच' के रूप में कार्य करता है।