श्री गणपति स्तोत्रम् (स्वामिनारायण सम्प्रदाय)

॥ श्रीगणपतिस्तोत्रम् ॥
विघ्नेश! विघ्नचयखण्डननामधेय! श्री शङ्करात्मज! सुराधिपवन्द्यपाद । दुर्गामहाव्रतफलाखिलमङ्गलात्मन्! विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक! त्वम् ॥ १॥ सत्पद्मराग मणिवर्ण शरीरकान्तिः । श्री सिद्धिबुद्धिपरिचिन्तितकुङ्कुमश्रीः दक्षस्तने वलयितातिमनोज्ञशुण्डो! (पाठभेद: वक्षःस्थले) विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक! त्वम् ॥ २॥ पाशाङ्कुशाब्जपरशूंश्च दधच्चतुर्भि- र्दोर्भिश्च शोणकुसुमस्रगुमाङ्गजजातः । सिन्दूरशोभितललाट विधुप्रकाशो विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक! त्वम् ॥ ३॥ कार्येषु विघ्नचयभीतविरञ्चिमुख्यैः सम्पूजितः सुरवरैरपि मोदकाद्यैः । सर्वेषु च प्रथममेव सुरेषु पूज्यो! विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक! त्वम् ॥ ४॥ शीघ्राञ्चनस्खलनचुञ्चुरवोर्ध्वकण्ठ स्थूलोन्दुरुद्रवणहासितदेवसङ्घः । शूर्पश्रुतिश्च पृथुवर्तुलतुङ्गतुन्दो! विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक! त्वम् ॥ ५॥ यज्ञोपवीतपदलम्भितनागराजो मासादिपूज्यददृशीकृतऋक्षराजः । भक्ताभयप्रद! दयालय! विघ्नराजो! विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक! त्वम् ॥ ६॥ सद्रत्नसारततिराजितसत्किरीटः कौसुम्भचारुवसनद्वय ऊर्जितश्रीः । सर्वत्रमङ्गलकरस्मरणप्रतापो विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक! त्वम् ॥ ७॥ देवान्तकाद्यसुरभीतसुरार्तिहर्ता विज्ञानबोधनव तमोपहर्ता । आनन्दितत्रिभुवनेश! कुमारबन्धो! विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक! त्वम् ॥ ८॥ ॥ इति श्रीगणपतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्री गणपति स्तोत्रम्, जैसा कि स्वामिनारायण सम्प्रदाय में प्रचलित है, भगवान गणेश के 'सिद्धिविनायक' स्वरूप को समर्पित एक सुंदर अष्टक (आठ श्लोकों की स्तुति) है। इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य और भाव इसके प्रत्येक श्लोक के अंत में दोहराई जाने वाली पंक्ति "विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक! त्वम्" (हे सिद्धिविनायक! आप मेरे विघ्नों का हरण करें) में निहित है। यह एक सरल, सीधी और अत्यंत भक्तिपूर्ण प्रार्थना है जो भगवान गणेश को सभी बाधाओं के विनाशक और सभी मंगलों के प्रदाता के रूप में देखती है। स्वामिनारायण सम्प्रदाय में, यद्यपि भगवान स्वामिनारायण को परम ब्रह्म माना जाता है, तथापि अन्य प्रमुख हिंदू देवताओं की पूजा और सम्मान का भी विधान है। यह स्तोत्र उसी परम्परा का एक सुंदर उदाहरण है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
यह अष्टक भगवान गणेश के दिव्य और मंगलमय स्वरूप का काव्यात्मक वर्णन करता है:
- शंकरपुत्र और देवाधिदेव (Son of Shankara and Lord of Gods): "श्री शङ्करात्मज! सुराधिपवन्द्यपाद" - आप श्री शंकर के पुत्र हैं और इंद्र आदि देवताओं के स्वामी भी आपके चरणों की वंदना करते हैं। यह उनके उच्च पद को दर्शाता है।
- पद्मराग मणि के समान कांति (Lustre like a Ruby): "सत्पद्मराग मणिवर्ण शरीरकान्तिः" - उनके शरीर की कांति श्रेष्ठ पद्मराग मणि (रूबी) के समान है। लाल वर्ण उनकी शक्ति, उत्साह और मंगलकारी स्वरूप का प्रतीक है।
- प्रथम पूज्य (The First to be Worshipped): "सर्वेषु च प्रथममेव सुरेषु पूज्यो" - आप सभी देवताओं में भी सबसे पहले पूजे जाते हैं। यह किसी भी कार्य के आरम्भ में उनकी पूजा की अनिवार्यता को सिद्ध करता है।
- शूर्पकर्ण और विशाल उदर (Winnow-like Ears and Large Belly): "शूर्पश्रुतिश्च पृथुवर्तुलतुङ्गतुन्दो" - उनके सूप जैसे कान (शूर्पकर्ण) सार और असार को अलग करने (अच्छी बातों को ग्रहण करने और बुरी को त्यागने) का प्रतीक हैं, जबकि उनका विशाल उदर (लम्बोदर) सम्पूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित करने की उनकी क्षमता को दर्शाता है।
- ज्ञान के प्रकाशक और अज्ञान के नाशक (Illuminator of Knowledge and Destroyer of Darkness):** "विज्ञानबोधनव तमोपहर्ता" - वे विज्ञान (विशेष ज्ञान) का बोध कराने वाले और अज्ञान रूपी अंधकार को हरने वाले हैं।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
इस स्तोत्र की कोई औपचारिक फलश्रुति नहीं है, क्योंकि इसका फल इसकी प्रत्येक पंक्ति में ही निहित है—"विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक! त्वम्"। इसके पाठ के मुख्य लाभ हैं:
- सभी विघ्नों का नाश (Removal of All Obstacles): यह स्तोत्र का प्रमुख लाभ है। जीवन के किसी भी क्षेत्र - शिक्षा, करियर, स्वास्थ्य, या परिवार - में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए इसका पाठ अत्यंत प्रभावी है।
- कार्यों में सफलता (Success in Endeavors): विघ्नों के नाश होने से सभी कार्य निर्विघ्न रूप से सिद्ध होते हैं। 'सिद्धिविनायक' नाम का स्मरण ही कार्यों में सिद्धि प्रदान करता है।
- मंगल की प्राप्ति (Attainment of Auspiciousness): उन्हें "अखिलमङ्गलात्मन्" (समस्त मंगलों का स्वरूप) कहा गया है। उनके स्मरण मात्र से जीवन में शुभता और मंगल का आगमन होता है।
- भय और संकटों से रक्षा (Protection from Fear and Dangers):** भगवान गणेश की स्तुति भक्त को सभी प्रकार के भय, संकट और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करती है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- यह एक नित्य पठनीय स्तोत्र है जिसे प्रतिदिन की पूजा में शामिल किया जा सकता है।
- किसी भी नए कार्य, यात्रा, परीक्षा या महत्वपूर्ण अवसर के प्रारंभ में इस स्तोत्र का 1, 5, या 11 बार पाठ करना चाहिए।
- बुधवार और संकष्टी/विनायक चतुर्थी के दिन इसका पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
- पाठ करते समय भगवान गणेश के 'सिद्धिविनायक' स्वरूप का, जो अपनी सूंड दाईं ओर घुमाए हुए होते हैं, ध्यान करना चाहिए और उनसे अपने जीवन के सभी विघ्नों को हरने की विनम्र प्रार्थना करनी चाहिए।