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विघ्नासुरकृता श्रीगजाननस्तुतिः

विघ्नासुरकृता श्रीगजाननस्तुतिः

विघ्नासुर उवाच ।

नमस्ते गणनाथाय गजाननस्वरूपिणे । योगाय योगनाथाय योगिभ्यो योगदायिने ॥ १५॥ अनाकाराय साकाररूपाय ते नमो नमः । नानाभेदविहीनाय भेदानां पतये नमः ॥ १६॥ विघ्नेशाय परेशाय कालभीतिहराय ते । हेरम्बाय परेषां वै परात्पर नमो नमः ॥ १७॥ अनादये ह्यनाथाय सर्वेषामादिमूर्तये । भक्तेशाय सदा भक्तवाञ्छितप्रद ते नमः ॥ १८॥ स्वानन्दवासिने तुभ्यं मूषकध्वजिने नमः । मूषकोपरिसंस्थाय ढुण्ढिराजाय ते नमः ॥ १९॥ आदिमध्यान्तहीनायादिमध्यान्तस्वरूपिणे । गजवक्राय वै तुभ्यं सर्वपूज्याय ते नमः ॥ २०॥ सिद्धिबुद्धिस्वरूपाय सिद्धिबुद्धिप्रदाय च । सिद्धिबुद्धिपते तुभ्यं महोदर नमो नमः ॥ २१॥ अमेयमायातिगमूर्तयेऽपि ते सदा सुशान्तिप्रदपूर्णमूर्तये । मनोवचोहीनमयाय तेजसे मनोवचोयुक्तकलाय ते नमः ॥ २२॥ अज्ञानदोषेण कृतोऽपराधो हेरम्ब तं क्षन्तुमिहार्हसि त्वम् । रक्षस्व मां भक्तियुतं दयाब्धे श्रेष्ठं वरं देहि परेशपाल ॥ २३॥ अधुना हि मया बुद्धं स्वरूपं ते गजानन । योगाकारमयोऽसि त्वं ततोऽहं निर्जितस्त्वया ॥ २४॥ त्वां विना का समर्थः स्यात् कालं कलयतां प्रभुम् । जेतुं धन्यः कृतो नाथ पादपद्मस्य दर्शनात् ॥ २५॥ एवं स्तुत्वा महाविघ्नः प्रणनाम गजाननम् । तमुत्थाप्य जगादेदं वचनं सर्वदः परः ॥ २६॥

फलश्रुतिः (श्रीगजानन उवाच)

त्वया कृतं मदीयं वै स्तोत्रं सर्वप्रदं भवेत् । कालस्य न भयं तेषां पठतां शृण्वतां सदा ॥ २७॥ यद्यदिच्छति तत्तद्वै दास्यामि स्तोत्रपाठतः । महायोगप्रदं चास्तु स्तोत्रं मत्प्रीतिवर्धनम् ॥ २८॥ हन्तुं त्वां क्रोधसंयुक्त आगतोऽहं न संशयः । वाञ्छितं वृणु नो हन्मि अधुना शरणार्थिनम् ॥ २९॥ ॥ इति विघ्नासुरकृता श्रीगजाननस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

विघ्नासुरकृता श्रीगजाननस्तुतिः, मुद्गल पुराण से ली गई एक अत्यंत अनूठी और महत्वपूर्ण स्तुति है। इसका महत्व इस तथ्य में निहित है कि इसकी रचना स्वयं विघ्नासुर नामक असुर ने भगवान गणेश से पराजित होने के बाद उनकी प्रशंसा में की थी। यह स्तोत्र एक शत्रु के हृदय-परिवर्तन और शरणागति का प्रतीक है। जब बाधाएं उत्पन्न करने वाला स्वयं बाधाओं के स्वामी (विघ्नेश्वर) की शरण लेता है, तो यह स्तुति की शक्ति को दर्शाता है। इस स्तोत्र के बाद ही भगवान गणेश ने 'विघ्नेश्वर' (बाधाओं के स्वामी) और 'विघ्नहर्ता' (बाधाओं को हरने वाले) के रूप में अपनी भूमिका स्वीकार की। इस स्तुति में भगवान गणेश द्वारा दी गई फलश्रुति इसे भक्तों के लिए विशेष रूप से फलदायी बनाती है।

पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)

मुद्गल पुराण के अनुसार, एक बार राजा अभिनन्दन ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने देवराज इंद्र को आमंत्रित नहीं किया। क्रोधित होकर, इंद्र ने यज्ञ को नष्ट करने के लिए कालविघ्न नामक असुर को उत्पन्न किया और उसे विघ्नासुर नाम दिया। विघ्नासुर ने न केवल यज्ञ को नष्ट किया, बल्कि तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया, सभी शुभ कार्यों और वैदिक अनुष्ठानों में बाधाएं उत्पन्न करने लगा। तब सभी देवताओं और ऋषियों ने भगवान गजानन की शरण ली। भगवान गणेश ने विघ्नासुर से युद्ध किया और अंततः उसे अपने पाश में बांध लिया। जब विघ्नासुर का वध करने का समय आया, तो उसने भगवान की स्तुति करना आरम्भ कर दिया और उनकी शरण मांगी। उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर, गजानन ने उसे जीवनदान दिया और यह वरदान दिया कि तुम उन स्थानों पर रह सकते हो जहाँ मेरी पूजा नहीं होती। उन्होंने विघ्नासुर को यह भी आदेश दिया कि वह उनके भक्तों को कभी परेशान न करे। इसी घटना के बाद गणेश 'विघ्नेश्वर' और 'विघ्नराज' के नाम से प्रसिद्ध हुए।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

यह स्तुति गणेश के परम तात्विक स्वरूप का वर्णन करती है:
  • योग के परमेश्वर (The Supreme Lord of Yoga): "योगाय योगनाथाय योगिभ्यो योगदायिने" - आप योग हैं, योग के स्वामी हैं, और योगियों को योग प्रदान करने वाले हैं। यह गणेश के केवल विघ्नहर्ता रूप से परे, उनके आध्यात्मिक गुरु स्वरूप को दर्शाता है।
  • निराकार और साकार (Formless and With Form): "अनाकाराय साकाररूपाय ते नमो नमः" - यह स्तुति गणेश के निर्गुण (निराकार) और सगुण (साकार) दोनों रूपों को प्रणाम करती है, जो अद्वैत दर्शन का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
  • काल के भय को हरने वाले (Remover of the Fear of Time): "कालभीतिहराय ते" - वे काल (समय और मृत्यु) के भय को भी हर लेते हैं। यह एक बहुत बड़ा आश्वासन है, जैसा कि फलश्रुति में भी दोहराया गया है।
  • शरणागति का महत्व (Importance of Surrender):** विघ्नासुर स्वीकार करता है, "अधुना हि मया बुद्धं स्वरूपं ते गजानन। योगाकारमयोऽसि त्वं ततोऽहं निर्जितस्त्वया" - हे गजानन! अब मैं आपके योगमय स्वरूप को समझ गया हूँ, और इसीलिए मैं आपसे पराजित हुआ हूँ। यह दर्शाता है कि अहंकार की हार और ज्ञान का उदय ही सच्ची शरणागति है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

इस स्तोत्र की फलश्रुति स्वयं भगवान गजानन ने दी है, जो इसे अत्यंत शक्तिशाली बनाती है:
  • सर्व-मनोकामना पूर्ति (Fulfillment of All Desires): "त्वया कृतं मदीयं वै स्तोत्रं सर्वप्रदं भवेत्। यद्यदिच्छति तत्तद्वै दास्यामि स्तोत्रपाठतः" - भगवान कहते हैं, "तुम्हारे द्वारा रचित यह स्तोत्र सब कुछ प्रदान करने वाला होगा। जो भी इसकी इच्छा से इसका पाठ करेगा, मैं उसे वह सब कुछ दूँगा।"
  • काल-भय से मुक्ति (Freedom from Fear of Time/Death):** "कालस्य न भयं तेषां पठतां शृण्वतां सदा" - जो लोग इस स्तोत्र को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें कभी भी काल का भय नहीं होता।
  • महायोग की प्राप्ति (Attainment of Maha Yoga):** "महायोगप्रदं चास्तु स्तोत्रं मत्प्रीतिवर्धनम्" - यह स्तोत्र महायोग प्रदान करने वाला और मुझे (गणेश को) प्रसन्न करने वाला है।
  • भगवान गणेश की प्रसन्नता (Pleasing Lord Ganesha):** यह स्तोत्र भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय है, और इसके पाठ से उनकी विशेष कृपा और प्रसन्नता प्राप्त होती है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ दिन बुधवार और संकष्टी/विनायक चतुर्थी है।
  • किसी भी नए या महत्वपूर्ण कार्य को शुरू करने से पहले, या जब जीवन में बार-बार बाधाएं आ रही हों, तो इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
  • पाठ करते समय, भगवान गणेश के विघ्नेश्वर स्वरूप का ध्यान करें और मन में अपनी बाधाओं को उनके चरणों में समर्पित करने का भाव रखें।
  • चूंकि यह स्तोत्र स्वयं भगवान द्वारा वरदान प्राप्त है, इसे पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करने से शीघ्र फल मिलता है।