Logoपवित्र ग्रंथ

नारदमुनिकृता गजाननस्तुतिः

नारदमुनिकृता गजाननस्तुतिः

देवर्षय ऊचुः ।

गजानन नमस्तुभ्यं सर्वेषां बीजरूपिणे । निर्बीजाय गणेशाय विघ्नानां पतये नमः ॥ ३१॥ अनन्तायैकदन्ताय हेरम्बाय नमो नमः । चतुर्भुजाय सर्वेश सर्वपूज्याय ते नमः ॥ ३२॥ सर्वसिद्धिप्रदात्रे च सुरासुरमयाय ते । सिद्धिबुद्धिप्रचालाय सिद्धिबुद्धिपते नमः ॥ ३३॥ अगुणाय गुणेशाय गुणरूपाय गौणिने । मायामयाय मायायाश्चालकाय परात्मने ॥ ३४॥ सर्वादये महोदार पराक्रमपराय ते । स्वानन्दवासिने तेऽस्तु नमः स्वानन्ददायिने ॥ ३५॥ योगाकाराय योगानां स्वामिने शान्तिदायिने । ब्रह्मणस्पतये तेऽस्तु ब्रह्मणां ब्रह्मणे नमः ॥ ३६॥ अनाधाराय सर्वेषामाधाराय नमो नमः । आदिमध्यान्तहीनायादिमध्यान्ताय ते नमः ॥ ३७॥ परश्वङ्कुशहस्ताय त्रिनेत्राय महोदर । नमो मूषकवाहाय मूषकध्वजिने नमः ॥ ३८॥ नमो नमस्ते सकलाय धाम्ने सदा सुखानन्दकराय पात्रे । जगत् सुस्रष्ट्रे सकलस्य हन्त्रे गुणैर्विहीनाय गणाधिपाय ॥ ३९॥ विदेहरूपाय पराय भोक्त्रे बोधेन हीनाय सुसाङ्ख्यकाय । सदा स्वबुद्धौ परसंस्थिताय गजात्मरूपाय नमो नमस्ते ॥ ४०॥ बोधहीनं च यद्ब्रह्म तदेव गजवाचकम् । गजचिह्नेन योगीन्द्राः पश्यन्ति त्वां गजाननम् ॥ ४१॥ यथा मुखस्य चिह्नेन ज्ञायन्ते मानवादयः । तथा विदेहचिह्नेन ज्ञायसे त्वं तु योगिभिः ॥ ४२॥ विदेहं गजरूपं यत्तेन ते मुखमुच्यते । गणेशस्य प्राप्तिकरं गजानन नमोऽस्तु ते ॥ ४३॥ किं स्तवाम गणाधीश यत्र वेदादिकास्तथा । योगिनः शान्तिमापन्नास्तं वयं शरणं गताः ॥ ४४॥ स्तुत्वा विघ्नेश्वरं ते तु प्रणेमुस्तं पुनः पुनः । तानुवाच गणाधीशो हर्षयन् सर्वभाववित् ॥ ४५॥

फलश्रुतिः (गजानन उवाच)

स्तोत्रं भवत्कृतं देवा ईश्वरा मुनयश्च मे । सर्वसिद्धिप्रदं पूर्णं भविष्यति निरन्तरम् ॥ ४६॥ यद्यदिच्छति तत्तद्वै दास्यामि भक्तियन्त्रितः । पठनाच्छ्रवणादस्य सन्तुष्टोऽहं विशेषतः ॥ ४७॥ वरदोऽहं वृणुत वो दास्यामि वरमीप्सितम् । तपसा भक्तिभावेन स्तोत्रेण तुष्टिमागतः ॥ ४८॥ ॥ इति नारदमुनिकृता गजाननस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
संलिखित ग्रंथ पढ़ें

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

नारदमुनिकृता गजाननस्तुतिः, मुद्गल पुराण (चतुर्थ खण्ड, अध्याय ४०) में वर्णित एक गहन दार्शनिक और भक्तिपूर्ण स्तुति है। इसका महत्व इस बात में है कि इसकी रचना देवर्षि नारद के नेतृत्व में अन्य देवर्षियों द्वारा की गई है, जो स्वयं भक्ति के परम आचार्य हैं। यह स्तोत्र भगवान गणेश के केवल विघ्नहर्ता स्वरूप की नहीं, बल्कि उनके परब्रह्म, योगमय, और तात्विक स्वरूप की वंदना करता है। इसमें गणेश को सृष्टि का बीज (source) और फिर उस बीज से भी परे निर्बीज (beyond source) कहा गया है, जो अद्वैत वेदांत की गहरी अवधारणा को दर्शाता है। भगवान गणेश स्वयं इस स्तुति से प्रसन्न होकर इसे 'सर्वसिद्धिप्रद' और 'महायोगप्रद' होने का वरदान देते हैं, जो इसे भक्तों के लिए एक कल्पवृक्ष के समान बना देता है।

पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)

मुद्गल पुराण के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद और अन्य ऋषि-मुनि भगवान गणेश के परम तत्व को जानने के लिए अत्यंत जिज्ञासु हुए। वे यह समझना चाहते थे कि गणेश का वास्तविक स्वरूप क्या है - क्या वे साकार हैं या निराकार? क्या वे गुणों से युक्त हैं या गुणातीत? अपने इन गहन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए, सभी ऋषि-मुनि भगवान गजानन का ध्यान करने लगे। उनकी सम्मिलित तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान गजानन उनके समक्ष प्रकट हुए। उनके दिव्य और तेजोमय स्वरूप को देखकर, देवर्षि नारद और अन्य मुनियों ने उनकी महिमा को पहचान लिया और उनके तात्विक स्वरूप का गुणगान करते हुए इस स्तुति की रचना की। इस स्तुति के माध्यम से, उन्होंने गणेश के उन सभी विरोधाभासी प्रतीत होने वाले पहलुओं, जैसे साकार-निराकार, सगुण-अगुण, को एक ही परब्रह्म के विभिन्न manifestations के रूप में स्वीकार किया।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

यह स्तुति गणेश के परम दार्शनिक स्वरूप को प्रकट करती है:
  • बीज और निर्बीज (The Seed and Beyond the Seed): "सर्वेषां बीजरूपिणे। निर्बीजाय गणेशाय" - आप सभी के बीज (कारण) हैं, और फिर भी आप स्वयं कारणरहित (निर्बीज) हैं। यह दर्शाता है कि वे सृष्टि के स्रोत हैं, लेकिन स्वयं किसी से उत्पन्न नहीं हुए।
  • गुण और गुणातीत (With and Beyond Attributes): "अगुणाय गुणेशाय गुणरूपाय" - आप गुणों से रहित (निर्गुण) हैं, फिर भी सभी गुणों के स्वामी (सगुण) हैं, और स्वयं गुणों के रूप में प्रकट होते हैं।
  • विदेह स्वरूप (The Formless Body): "विदेहाय नमस्तुभ्यं प्रत्यक्षं रूपधारिणे" - आप विदेह (बिना शरीर के) हैं, फिर भी भक्तों के लिए प्रत्यक्ष रूप धारण करते हैं। योगी आपको 'विदेहचिह्न' (अरूप के चिह्न) से ही जानते हैं, जो 'गज' (हाथी) का प्रतीक है।
  • वाणी और वेदों से परे (Beyond Speech and Vedas): "यं स्तोतुं न समर्थाश्च वेदा योगिशिवादयः" - जिनकी स्तुति करने में वेद, योगी और शिव भी समर्थ नहीं हैं, हम उनकी स्तुति कैसे कर सकते हैं? यह उनकी अचिन्त्य महिमा और शरणागति के भाव को दर्शाता है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

इस स्तोत्र की फलश्रुति स्वयं भगवान गजानन ने देवर्षियों को दी है, जो इसे अत्यंत प्रामाणिक और शक्तिशाली बनाती है:
  • सर्व-सिद्धि प्रदायक (Bestower of All Siddhis): "स्तोत्रं भवत्कृतं देवा... सर्वसिद्धिप्रदं पूर्णं भविष्यति निरन्तरम्" - भगवान कहते हैं कि तुम्हारे द्वारा रचित यह स्तोत्र पूर्ण और निरंतर सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाला होगा।
  • सर्व-मनोकामना पूर्ति (Fulfillment of All Desires): "यद्यदिच्छति तत्तद्वै दास्यामि भक्तियन्त्रितः" - भक्ति से नियंत्रित होकर, मैं वह सब कुछ दूँगा जो भी भक्त इस स्तोत्र का पाठ करके इच्छा करेगा।
  • भगवान की विशेष प्रसन्नता (Special Grace of the Lord): "पठनाच्छ्रवणादस्य सन्तुष्टोऽहं विशेषतः" - इस स्तोत्र के पढ़ने और सुनने से मैं विशेष रूप से संतुष्ट होता हूँ।
  • महायोग की प्राप्ति (Attainment of Maha Yoga): भगवान ने इस स्तोत्र को 'महायोगप्रद' होने का भी वरदान दिया है, जिसका अर्थ है कि यह साधक को परमात्मा के साथ एकाकार होने की सर्वोच्च योग अवस्था तक ले जाने में सक्षम है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • यह एक ज्ञान-प्रधान स्तोत्र है, इसलिए इसे शांत मन और शुद्ध भाव से, अर्थ पर विचार करते हुए पढ़ना चाहिए।
  • इसका पाठ करने का सबसे शुभ दिन बुधवार और चतुर्थी तिथि है।
  • ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति की कामना करने वाले छात्रों और साधकों के लिए यह स्तोत्र विशेष रूप से फलदायी है।
  • किसी भी प्रकार की सिद्धि या मनोकामना की पूर्ति के लिए संकल्प लेकर इस स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है, क्योंकि इसका वरदान स्वयं भगवान गणेश ने दिया है।