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गजाननस्तुतिः (लोभासुरेण प्रोक्ता)

गजाननस्तुतिः (लोभासुरेण प्रोक्ता)

लोभासुर उवाच ।

नमस्ते शस्त्रराजाय शस्त्राणां ब्रह्मरूपिणे । नानाशस्त्राणि शस्त्रेश! त्वदाधाराणि ते नमः ॥ ४॥ प्रलयानलसङ्काशं स्वरूपं धरते नमः । अनन्तवीर्ययुक्ताय भास्करामिततेजसे ॥ ५॥ दृश्यादृश्यमयायैव सर्वदर्पहराय ते । धर्मसंस्थापनार्थाय नानारूपधराय च ॥ ६॥ साक्षाद्गजाननस्यैव यद्वीर्यं नियतात्मकम् । तदेव त्वं महाशस्त्रं किं ते स्तौमि नमो नमः ॥ ७॥ शरणागतपालाय सदा स्वानन्दसंस्थितः । रक्ष मां भयभीतं भोः परशो! ते नमो नमः ॥ ८॥ नमस्ते गजवक्राय नानासिद्धिप्रदायिने । बुद्धिचालकवेषाय ब्रह्मणे वै नमो नमः ॥ १४॥ हेरम्बाय सदा स्वानन्दवासिने महात्मने । परात्परतरायैव विघ्नेशाय नमो नमः ॥ १५॥ सुरासुरप्रियकर सुरासुरमयाय ते । लोभयुक्तान् विधर्मस्थान्नाशनाय नमो नमः ॥ १६॥ देवानां पालकायैव दैत्यानां रक्षकाय ते । सर्वेषां दर्पहन्त्रे वै गणेशाय नमो नमः ॥ १७॥ लम्बोदराय देवेश! दैत्येश! मूषकध्वज ! । अनादये च सर्वेषां आदिरूपाय ते नमः ॥ १८॥ आदिमध्यान्तहीनायादिमध्यान्तस्वरूपिणे । ब्रह्मेशाय महेशानां पालकाय नमो नमः ॥ १९॥ ब्रह्मभ्यो ब्रह्मदात्रे च सदा शान्तिधराय ते । शान्तीनां शान्तिरूपाय नमो योगाय वै नमः ॥ २०॥ एकदन्ताय सर्वेश! वक्रतुण्डाय ते नमः । महोदराय पूर्णाय पूर्णानन्दाय ते नमः ॥ २१॥ सर्वेषां मूलबीजाय मात्रे पित्रे नमो नमः । ज्येष्ठराजाय ज्येष्ठानां पालकाय नमो नमः ॥ २२॥ बीजरूपं गणाधीश ! जगतां ब्रह्मणां गजम् । चिह्नेन लभ्यसे तेन गजानन ! नमोऽस्तु ते ॥ २३॥ बोधहीनाय रूपाय सदा साङ्ख्यमयाय च । विदेहाय नमस्तुभ्यं प्रत्यक्षं रूपधारिणे ॥ २४॥ यं स्तोतुं न समर्थाश्च वेदा योगिशिवादयः । तं किं स्तौमि गणाधीश ! नमस्ते वरदो भव ॥ २५॥ त्वद्दर्शनजमाहात्म्यात् संस्तुतोऽसि महाप्रभो ! । तेन मेऽभयदो भूत्वा रक्ष दासं विशेषतः ॥ २६॥ एवं स्तुत्वा महालोभः प्रणनाम गजाननम् । तमुवाच दयासिन्धुर्भक्तं भक्तप्रपालकः ॥ २७॥

फलश्रुतिः (गजानन उवाच)

त्वया कृतमिदं स्तोत्रं सर्वसिद्धिकरं भवेत् । पठतः शृण्वतश्चैव लोभस्तं नैव पीडयेत् ॥ २९॥ पुत्रपौत्रादिसंयुक्तो भुक्त्वा भोगान् मनेप्सितान् । अन्ते स्वानन्दलोके स ब्रह्मभूतो भविष्यति ॥ ३०॥ यः स्तौति मामनेनैव स मे मान्यो न संशयः । सदा सुरस्वभावेन हीनः सोऽपि भविष्यति ॥ ३१॥ त्वां हन्तुं क्रोधसंयुक्त आगतोऽहं न संशयः । शरणागतमेवं तु दानवोत्तम हन्मि न ॥ ३२॥ ॥ इति लोभासुरेण प्रोक्ता गजाननस्तुतिः समाप्ता ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

लोभासुरेण प्रोक्ता गजाननस्तुतिः, मुद्गल पुराण (चतुर्थ खण्ड, अध्याय ४२) से ली गई एक और अनूठी स्तुति है। इसका महत्व इस बात में है कि इसकी रचना स्वयं लोभासुर, यानी लोभ (Greed) के दैत्य, ने भगवान गजानन से पराजित होने के बाद भयभीत होकर की थी। यह स्तोत्र एक आंतरिक शत्रु के पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। जब 'लोभ' स्वयं भगवान गणेश की शरण लेता है, तो यह दर्शाता है कि गणेश की कृपा से सबसे कठिन मानसिक विकारों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है। इस स्तुति में भगवान गजानन द्वारा दी गई फलश्रुति इसे उन साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है जो भौतिकवाद और सांसारिक इच्छाओं के बंधन से मुक्त होना चाहते हैं।

पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)

मुद्गल पुराण के अनुसार, एक बार धन के देवता कुबेर को अपने धन पर अत्यधिक अहंकार हो गया। उनके इसी अहंकार और लोभ से लोभासुर नामक एक शक्तिशाली दैत्य का जन्म हुआ। उसने शुक्राचार्य से शिक्षा प्राप्त की और भगवान शिव की तपस्या करके अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान के मद में चूर होकर, लोभासुर ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और सभी देवताओं को अपना दास बना लिया। जब उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया, तो देवगुरु बृहस्पति ने सभी देवताओं को भगवान गजानन (गणेश का एक विशिष्ट अवतार) की शरण लेने की सलाह दी। देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान गजानन प्रकट हुए और उन्होंने लोभासुर को युद्ध के लिए ललकारा। भगवान गजानन के विराट स्वरूप और अमोघ पाश (परशु) को देखकर लोभासुर का सारा अहंकार नष्ट हो गया। वह भयभीत होकर उनकी शरण में आ गया और उसने पहले उनके अमोघ अस्त्र परशु की स्तुति की, और फिर स्वयं भगवान गजानन की स्तुति की, जो इस स्तोत्र के रूप में प्रसिद्ध हुई।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

यह स्तुति दो भागों में है, जो इसके दार्शनिक महत्व को और गहरा करती है:
  • परशु (अस्त्र) की स्तुति (Praise of the Parashu): लोभासुर सबसे पहले गणेश के अस्त्र, परशु (कुल्हाड़ी) की स्तुति करता है। वह कहता है, "नमस्ते शस्त्रराजाय"। परशु यहाँ केवल एक हथियार नहीं, बल्कि ज्ञान और वैराग्य का प्रतीक है जो आसक्ति और लोभ के बंधनों को काटता है। अपने विनाश के कारण की स्तुति करना, लोभासुर के पूर्ण समर्पण को दर्शाता है।
  • गजानन के परम स्वरूप की स्तुति (Praise of Gajanana's Supreme Form):** इसके बाद वह गजानन की स्तुति करता है, उन्हें 'ब्रह्मणे', 'परात्परतराय', और 'योग' का स्वरूप कहता है। यह दर्शाता है कि लोभासुर ने यह जान लिया है कि गणेश केवल एक देवता नहीं, बल्कि स्वयं परब्रह्म हैं।
  • लोभ के नाशक (Destroyer of Greed):** "लोभयुक्तान् विधर्मस्थान्नाशनाय नमो नमः" - यह पंक्ति स्तोत्र के सार को प्रकट करती है। लोभासुर स्वयं स्वीकार करता है कि गणेश का स्वरूप लोभ से युक्त और अधर्म के मार्ग पर चलने वालों का नाश करने वाला है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

इस स्तोत्र की फलश्रुति स्वयं भगवान गजानन ने लोभासुर को दी है:
  • सर्व-सिद्धि की प्राप्ति (Attainment of All Siddhis): "त्वया कृतमिदं स्तोत्रं सर्वसिद्धिकरं भवेत्" - भगवान कहते हैं कि तुम्हारे द्वारा रची यह स्तुति सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करने वाली होगी।
  • लोभ से मुक्ति (Freedom from Greed): "पठतः शृण्वतश्चैव लोभस्तं नैव पीडयेत्" - जो इस स्तोत्र को पढ़ेगा या सुनेगा, उसे लोभ कभी भी पीड़ा नहीं देगा। यह इस स्तोत्र का सबसे विशिष्ट और महत्वपूर्ण लाभ है।
  • भौतिक सुख और पारिवारिक समृद्धि (Worldly Pleasures and Family Prosperity): "पुत्रपौत्रादिसंयुक्तो भुक्त्वा भोगान् मनेप्सितान्" - भक्त पुत्र-पौत्रों से युक्त होकर अपनी इच्छानुसार भोगों का उपभोग करेगा।
  • मोक्ष की प्राप्ति (Attainment of Liberation): "अन्ते स्वानन्दलोके स ब्रह्मभूतो भविष्यति" - अंत में वह साधक स्वानन्द लोक में ब्रह्मलीन हो जाएगा, अर्थात् उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।
  • देव-स्वभाव की प्राप्ति (Attainment of Divine Nature): "सदा सुरस्वभावेन हीनः सोऽपि भविष्यति" - जो व्यक्ति देव-स्वभाव से हीन है, वह भी इस स्तोत्र के प्रभाव से दिव्य स्वभाव वाला बन जाएगा।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ दिन बुधवार और चतुर्थी तिथि है।
  • जो व्यक्ति लोभ, अत्यधिक भौतिक इच्छाओं, या धन के प्रति आसक्ति से पीड़ित है, उसके लिए यह स्तोत्र रामबाण है।
  • प्रातःकाल स्नान के बाद, भगवान गणेश के समक्ष बैठकर, उनसे अपने लोभ रूपी आंतरिक शत्रु को नष्ट करने की प्रार्थना के साथ इसका पाठ करना चाहिए।
  • चूंकि यह स्तोत्र स्वयं भगवान द्वारा वरदान प्राप्त है, इसे पूर्ण श्रद्धा से पाठ करने पर शीघ्र ही मन में संतोष और शांति का अनुभव होता है।