देवाकृता श्रीगजाननस्तुतिः

देवा ऊचुः ।
गजाननाय पूर्णाय साङ्ख्यरूपमयाय ते । विदेहेन च सर्वत्र संस्थिताय नमो नमः ॥ २२॥ अमेयाय च हेरम्बाय ते परशुधारक । मूषकवाहनायैव विघ्नेशाय नमो नमः ॥ २३॥ अनन्तविभवायैव परेषां पररूपिणे । गुहाग्रजाय देवाय शिवपुत्राय ते नमः ॥ २४॥ पार्वतीनन्दनायैव देवानां पालकाय ते । सर्वेषां पूज्यदेहाय गणेशाय नमो नमः ॥ २५॥ स्वानन्दवासिने तुभ्यं शिवस्य कुलदैवत । विष्ण्वादीनां विशेषेण कुलदेवाय ते नमः ॥ २६॥ योगाकाराय सर्वेषां योगशान्तिप्रदाय च । ब्रह्मेशाय नमस्तुभ्यं ब्रह्मभूयप्रदाय ते ॥ २७॥ सिद्धिबुद्धिपते नाथ सिद्धिबुद्धिप्रदायिने । मायिने मायिकेभ्यश्च मोहदाय नमो नमः ॥ २८॥ लम्बोदराय वै तुभ्यं सर्वोदरगताय च । अमायिने च मायाया आधाराय नमो नमः ॥ २९॥ गजः सर्वस्य बीजं यत्तेन चिह्नेन विघ्नप । योगिनस्त्वां प्रजानन्ति तदाकारा भवन्ति ते ॥ ३०॥ तेन त्वं गजवक्रश्च किं स्तुमस्त्वां गजानन । वेदादयो विकुण्ठाश्च शङ्कराद्याश्च देवपाः ॥ ३१॥ शुकादयश्च शेषाद्याः स्तोतुं शक्ता भवन्ति न । तथापि संस्तुतोऽसि त्वं स्फूर्त्या त्वद्दर्शनात्मना ॥ ३२॥ गजाननं प्रणेमुस्तमेवमुक्त्वा शिवादयः । स तानुवाच प्रीतात्मा भक्तिभावेन तोषितः ॥ ३३॥फलश्रुतिः (श्रीगजानन उवाच)
भवत्कृतमिदं स्तोत्रं मदीयं सर्वदं भवेत् । पठते शृण्वते देवा ब्रह्मभूयप्रदायकम् ॥ ३४॥ ॥ इति देवाकृता श्रीगजाननस्तुतिः सम्पूर्णा ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
देवाकृता श्रीगजाननस्तुतिः, मुद्गल पुराण (चतुर्थ खण्ड, अध्याय ४८) से ली गई एक और गहन दार्शनिक स्तुति है। इसका महत्व इस बात में है कि इसकी रचना स्वयं देवताओं (
देवा ऊचुः) ने भगवान गणेश की महिमा को समझने के बाद की थी। यह स्तोत्र भगवान गणेश के उस स्वरूप की वंदना करता है जो सामान्य समझ से परे है—वे सांख्य दर्शन के मूर्त रूप हैं (साङ्ख्यरूपमयाय), रूपरहित (विदेहेन) होते हुए भी सर्वत्र विद्यमान हैं, और योगियों को योग तथा शांति प्रदान करते हैं। इस स्तोति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी फलश्रुति है, जिसमें स्वयं भगवान गजानन यह वरदान देते हैं कि इसका पाठ करने वाला 'ब्रह्मभूय' अर्थात् ब्रह्म-पद (मोक्ष) को प्राप्त करेगा, जो किसी भी स्तुति के लिए एक अत्यंत दुर्लभ और सर्वोच्च फल है।पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)
मुद्गल पुराण के अनुसार, यह स्तुति उस समय की गई जब देवताओं ने भगवान गणेश की कृपा से किसी बड़े संकट पर विजय प्राप्त की थी। अपनी विजय के उपरान्त, जब उन्होंने गणेश जी के विराट और अचिन्त्य स्वरूप का अनुभव किया, तो वे उनकी महिमा से अभिभूत हो गए। उन्होंने यह महसूस किया कि गणेश केवल एक देवता नहीं, बल्कि स्वयं परब्रह्म हैं, जिनका वर्णन वेद भी पूरी तरह से नहीं कर सकते (
वेदादयो विकुण्ठाश्च)। इस गहरी अनुभूति और कृतज्ञता के भाव से भरकर, सभी देवताओं ने मिलकर उनके परम तात्विक स्वरूप की प्रशंसा में इस स्तुति की रचना की। उनकी भक्ति और ज्ञान से प्रसन्न होकर, भगवान गजानन ने उन्हें दर्शन दिए और उनके द्वारा रचित इस स्तोत्र को अमर वरदान प्रदान किया।स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
यह स्तुति गणेश के सर्वोच्च दार्शनिक स्वरूप को प्रकट करती है:
- सांख्य के मूर्त रूप (Embodiment of Sankhya Philosophy): "साङ्ख्यरूपमयाय ते" - गणेश जी को सांख्य दर्शन का मूर्त रूप कहा गया है। सांख्य, जो प्रकृति और पुरुष के विवेक पर आधारित है, ज्ञान के प्राचीनतम मार्गों में से एक है। गणेश को इसका स्वरूप मानना उन्हें ज्ञान का अधिष्ठाता सिद्ध करता है।
- 'गज' का तात्विक अर्थ (The Esoteric Meaning of 'Gaja'): "गजः सर्वस्य बीजं यत्तेन चिह्नेन विघ्नप" - यहाँ 'गज' (हाथी) का एक गूढ़ अर्थ बताया गया है। 'गज' इस सम्पूर्ण सृष्टि का बीज (कारण) है, और योगी इसी चिह्न के माध्यम से आप (विघ्नप) को जानते हैं और आप ही का आकार हो जाते हैं (
तदाकारा भवन्ति ते)। - माया के नियंता (Controller of Maya): "मायिने मायिकेभ्यश्च मोहदाय नमो नमः" - आप स्वयं 'मायी' (माया के स्वामी) हैं, और जो माया में फंसे हैं, उन्हें 'मोह' प्रदान करते हैं। यह दर्शाता है कि बंधन और मुक्ति, दोनों उन्हीं की शक्ति के अधीन हैं।
- शरणागति का भाव (The Spirit of Surrender): देवता अंत में अपनी असमर्थता व्यक्त करते हैं, "किं स्तुमस्त्वां गजानन। वेदादयो विकुण्ठाश्च... स्तोतुं शक्ता भवन्ति न" - हे गजानन! हम आपकी स्तुति कैसे कर सकते हैं, जब वेद और शंकर आदि देवता भी आपका पूर्ण गुणगान करने में समर्थ नहीं हैं। यह ज्ञान की पराकाष्ठा है, जो अंततः शरणागति में परिवर्तित हो जाती है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
इस स्तोत्र की फलश्रुति स्वयं भगवान गजानन ने देवर्षियों को दी है, जो इसे अकाट्य और परम फलदायी बनाती है:
- सर्व-सिद्धि प्रदायक (Bestower of All Siddhis): "स्तोत्रं भवत्कृतमिदं मदीयं सर्वदं भवेत्" - भगवान कहते हैं, "तुम्हारे द्वारा रचित मेरी यह स्तुति सब कुछ प्रदान करने वाली होगी।"
- ब्रह्म-पद या मोक्ष की प्राप्ति (Attainment of the State of Brahman / Liberation): "पठते शृण्वते देवा ब्रह्मभूयप्रदायकम्" - यह इस स्तोत्र का सर्वोच्च फल है। भगवान स्वयं कहते हैं कि जो इस स्तोत्र को पढ़ता या सुनता है, यह उसे 'ब्रह्मभूय' (ब्रह्म-पद या मोक्ष) प्रदान करेगा।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- यह स्तोत्र ज्ञान और मोक्ष की कामना करने वाले साधकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
- इसका पाठ करने का सबसे शुभ समय बुधवार, चतुर्थी तिथि और गणेश जयंती है।
- प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में, शुद्ध होकर, भगवान गणेश के सात्विक स्वरूप का ध्यान करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
- चूंकि भगवान ने इसे पढ़ने और सुनने (
पठते शृण्वते), दोनों का समान फल बताया है, इसलिए इसे श्रद्धापूर्वक सुनना भी उतना ही लाभकारी है। - इसका पाठ करते समय यह भाव रखना चाहिए कि हम केवल एक देवता की नहीं, बल्कि उस परब्रह्म की स्तुति कर रहे हैं जो सभी रूपों में विद्यमान हैं।