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दण्डकारण्यकृता श्रीगजाननस्तुतिः

दण्डकारण्यकृता श्रीगजाननस्तुतिः

दण्डकारण्यमुवाच ।

नमस्ते गजवक्राय गणेशाय महोदर । ब्रह्मणे ब्रह्मपालाय विघ्नेशाय नमो नमः ॥ ३८॥ हेरम्बाय चतुर्बाहुधराय कञ्जपाणये । पाशाङ्कुशधरायैव परेशाय नमो नमः ॥ ३९॥ अनादये च सर्वेषामादिरूपाय ते नमः । ज्येष्ठानां ज्येष्ठरूपाय ज्येष्ठाय वै नमो नमः ॥ ४०॥ स्वानन्दवासिने तुभ्यं सिद्धिबुद्धिवराय च । सिद्धिबुद्धिप्रदात्रे ते मूषकध्वजिने नमः ॥ ४१॥ मूषकोपरिसंस्थाय गणेशाय परात्मने । नानामायाप्रचालाय मयूरेशाय ते नमः ॥ ४२॥ नायकानां विशेषेण नायकाय विनायक । नायकैर्वर्जितायैव नायकत्वप्रदायिने ॥ ४३॥ विघ्नेशाय महाविघ्नधारिणे सर्वदायिने । पददात्रे तथा हन्त्रे विघ्नेशैस्ते नमो नमः ॥ ४४॥ अमेयशक्तये तुभ्यं सर्वपूज्याय ते नमः । किं स्तौमि त्वां गणाधीश योगाकारस्वरूपिणम् ॥ ४५॥ अधुना वरदोऽसि त्वं तदा मे नाम सार्थकम् । कुरु नित्यं वस स्वामिन् मम देहे गजानन ॥ ४६॥ भक्तिं देहि त्वदीयां मे सदा ब्रह्मप्रकाशिनीम् । तेनाऽहं कृतकृत्यश्च भविष्यामि गजानन ॥ ४७॥ एवमुक्त्वा गणेशानं प्रणनाम कृताञ्जलिः । भक्तिभावसमायुक्तं तञ्जगाद गजाननः ॥ ४८॥

फलश्रुतिः (श्रीगजानन उवाच)

त्वया कृतमिदं स्तोत्रं मदीयं सर्वसिद्धिदम् । भविष्यति महारण्य भुक्तिमुक्तिप्रदं परम् ॥ ४९॥ त्वयोक्तं सफलं सर्वं भविष्यति सदा प्रियम् । मामेव सर्वभावेन भजिष्यसि न संशयः ॥ ५०॥ नानावतारवांश्चैव त्वद्देहस्थोऽहमञ्जसा । भविष्यामि गणेशोक्त्वांऽतर्दधे देवसत्तमाः ॥ ५१॥ ॥ इति दण्डकारण्यकृता श्रीगजाननस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

दण्डकारण्यकृता श्रीगजाननस्तुतिः, मुद्गल पुराण (षष्ठ खण्ड, अध्याय १३) में वर्णित एक अद्वितीय और गहन स्तुति है। इसकी विशिष्टता इस बात में है कि इसकी रचना किसी देवता या ऋषि ने नहीं, बल्कि स्वयं दण्डकारण्य वन ने मानवरूप धारण करके की है। यह स्तोत्र प्रकृति के मानवीकरण और उसकी भक्ति-भावना का एक अद्भुत उदाहरण है। इसका मुख्य उद्देश्य भगवान गणेश से प्रार्थना करना है कि वे उस स्थान पर नित्य निवास करें और उसे एक पवित्र 'गणेश क्षेत्र' में परिवर्तित कर दें। भगवान गजानन इस स्तुति से प्रसन्न होकर इसे 'भुक्तिमुक्तिप्रद' (भौतिक सुख और आध्यात्मिक मुक्ति दोनों देने वाला) होने का वरदान देते हैं, जो इसे अत्यंत फलदायी बनाता है।

पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)

मुद्गल पुराण के अनुसार, दण्डकारण्य, जो कभी ऋषियों की तपोभूमि थी, विभिन्न श्रापों और राक्षसों के अत्याचारों के कारण एक निर्जन और अपवित्र स्थान बन गया था। अपनी पवित्रता पुनः प्राप्त करने के लिए, दण्डकारण्य ने एक देहधारी रूप धारण किया और भगवान गजानन की कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान गजानन प्रकट हुए। उनके दिव्य स्वरूप के दर्शन से अभिभूत होकर, दण्डकारण्य ने कृतज्ञता और समर्पण के भाव से इस स्तुति की रचना की। उसने प्रार्थना की, "कुरु नित्यं वस स्वामिन् मम देहे गजानन" (हे स्वामी गजानन! आप नित्य मेरे इस देह (वन-स्वरूप) में निवास करें)। उसकी निश्छल भक्ति से प्रसन्न होकर, गणेश जी ने न केवल वहाँ निवास करने का वचन दिया, बल्कि यह भी घोषणा की कि आज से दण्डकारण्य एक उत्तम 'गणेश क्षेत्र' (गणेशक्षेत्रमुत्तमम्) के रूप में जाना जाएगा और उनके विभिन्न अवतार वहाँ प्रकट होंगे।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

यह स्तुति भगवान गणेश के विभिन्न स्वरूपों और उनकी सर्वोच्च सत्ता को नमन करती है:
  • ब्रह्म और ब्रह्मपालक (Brahman and the Protector of Brahman): "ब्रह्मणे ब्रह्मपालाय" - गणेश को यहाँ स्वयं ब्रह्म (परम सत्य) और ब्रह्म (वेदों/रचयिता) का पालक भी कहा गया है। यह उनके परब्रह्म स्वरूप को दर्शाता है।
  • नायकों के भी नायक (The Leader of Leaders): "नायकानां विशेषेण नायकाय विनायक" - वे सभी नायकों के भी विशेष नायक हैं, फिर भी वे स्वयं किसी नायक से रहित हैं (नायकैर्वर्जितायैव) और दूसरों को नायकत्व प्रदान करते हैं (नायकत्वप्रदायिने)। यह एक गहरा दार्शनिक विरोधाभास है जो उनकी सर्वोच्चता को सिद्ध करता है।
  • भक्ति का वरदान (The Boon of Bhakti): भौतिक वस्तुओं के बजाय, दण्डकारण्य प्रार्थना करता है, "भक्तिं देहि त्वदीयां मे सदा ब्रह्मप्रकाशिनीम्" - मुझे अपनी वह भक्ति प्रदान करें जो सदैव ब्रह्म का प्रकाश (ज्ञान) देने वाली हो। यह दर्शाता है कि सच्ची भक्ति ही परम ज्ञान का मार्ग है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

इस स्तोत्र की फलश्रुति स्वयं भगवान गजानन ने दी है, जो इसे अत्यंत प्रामाणिक और शक्तिशाली बनाती है:
  • सर्व-सिद्धि प्रदायक (Bestower of All Siddhis): "त्वया कृतमिदं स्तोत्रं मदीयं सर्वसिद्धिदम्" - भगवान कहते हैं कि तुम्हारे द्वारा रचित यह स्तुति सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करने वाली होगी।
  • भुक्ति और मुक्ति (Worldly Enjoyment and Liberation): "भविष्यति महारण्य भुक्तिमुक्तिप्रदं परम्" - यह स्तोत्र साधक को 'भुक्ति' (सांसारिक सुख और भोग) और 'मुक्ति' (मोक्ष), दोनों प्रदान करने वाला है।
  • स्थिर भक्ति की प्राप्ति (Attainment of Steadfast Devotion): "मामेव सर्वभावेन भजिष्यसि न संशयः" - भगवान आशीर्वाद देते हैं कि तुम (पाठक) सभी भावों से मेरा ही भजन करोगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।
  • पवित्र क्षेत्र का निर्माण (Creation of a Sacred Space): इस स्तोत्र के प्रभाव से वह स्थान एक 'गणेश क्षेत्र' बन जाता है। इसका पाठ करने से घर, कार्यस्थल या कोई भी स्थान पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ दिन बुधवार और संकष्टी चतुर्थी है।
  • नया घर बनाने, गृह प्रवेश करने, या किसी भूमि को पवित्र करने के लिए इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • जो व्यक्ति जीवन में भौतिक सुख और आध्यात्मिक शांति, दोनों में संतुलन चाहता है, उसके लिए यह स्तोत्र एक आदर्श प्रार्थना है।
  • पाठ करते समय भगवान गणेश के उस सौम्य, वरदायक स्वरूप का ध्यान करें जो अपने भक्त की पुकार सुनकर प्रकट हुए हैं, और उनसे अपने जीवन और परिवेश में वास करने की प्रार्थना करें।