श्री भुवनेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्रीदेव्युवाच ।
देवदेव महादेव योगीन्द्र वृषभध्वज । अस्याः श्रीभुवनेश्वर्याः शतनाम वद प्रभो ॥ १॥श्रीईशान उवाच ।
सहस्रेण महेशानि कलिकाले न सिद्ध्यति । शतनाम्नः परं नाम कलौ नास्ति महेश्वरि ॥ २॥विनियोगः
अस्य श्रीभुवनेश्वरी शतनामस्तोत्रस्य शक्तिऋषि विराट्च्छन्दः श्रीभुवनेश्वरी देवता चतुर्वर्गसिद्ध्यर्थे विनियोगः ॥ ॐ आद्या श्रीभुवनाभव्या भवबन्धविमोहिनी । भगरूपा भगवती भेरण्डा भाग्यशालिनी ॥ ३॥ ईश्वरी ईश्वरानन्दा वन्दनीया विलासिनी । उमा ऊमा च उन्मत्ता इन्दिरा इन्द्रपूजिता ॥ ४॥ ऊर्ध्व-तेजस्विनी ऊर्ध्वा ऊर्ध्वगा ऊर्ध्वरूपिणी । नन्दिनी नन्दमथिनी नन्दा नन्दकरूपिणी ॥ ५॥ नित्या च निष्कलङ्का च निर्मला मलनाशिनी । निरीहोल्लासिनी नत्या निर्मला नित्यनूतना ॥ ६॥ निशुम्भनाशिनी चैव तथा शुम्भविनाशिनी । शुक्लरूपा च शुक्लार्हा शाम्भवी शम्भुवल्लभा ॥ ७॥ शिवाख्या शिवरूपा च शिवपूज्या शिवार्चिता । शिववादा च श्यामा च श्यामाङ्गी श्याममूर्त्तिका ॥ ८॥ शोभा च सुभगा चैव शोभना भुवनेश्वरी । रक्ताङ्गी रक्तनयना रक्ताक्षी रक्तलोचना ॥ ९॥ रेवती रुक्मिणी राधा रौद्री रामा रजोगुणा । रम्या च रमणीया च रामक्रीडावती तथा ॥ १०॥ रामार्चिता रामपूज्या रङ्गिनी रामवल्लभा । रक्ताक्षी रक्तहास्या च रुधिरा रुधिरप्रिया ॥ ११॥ रक्तारक्तमयी राज्ञी रसयुक्ता रसप्रिया । रसमाला रसमयी तथा रसवती रतिः ॥ १२॥ रूपमाला रूपवती रूपाङ्गदविभूषणा । रेणुका रेतरूपा च रसरूपा रसाश्रया ॥ १३॥ भागीरथी तथोन्नासा वशिनी वेशरूपिणी । रेवा च शाम्भवी चैव मृदापारण पण्डिता ॥ १४॥फलश्रुतिः
शतनाम इदं देवि कथितं भक्तितस्तव । गुह्याद् गुह्यतरं गुह्यं कलिकालस्य सम्मतम् ॥ १५॥ अष्टोत्तरशतं जप्त्वा दशधा वापि सुन्दरि । पठित्वा फलमाप्नोति अयुतं वरवर्णनि ॥ १६॥ अयुतावर्त्तनाद्देवि चाश्वमेधफलं लभेत् । गोमेधशतयज्ञानां फलमाप्नोति निश्चितम् ॥ १७॥ प्रपठेद् यदि शुद्धात्मा स्वकीयस्त्रीषु संरतः । वामभागे स्त्रियं स्थाप्य धूपामोद सुगन्धितः ॥ १८॥ ताम्बूल-पूरितमुखी यदि स्याज्जपतत्परः । यद्यप्यदीक्षिता नारी दूरतः परिवर्जयेत् ॥ १९॥ दीक्षिता-परनारीषु यदि मैथुनमाचरेत् । न विन्दोः पातनं कार्यं कृते च ब्रह्महा भवेत् ॥ २०॥ यदि न प्रपतेद्दिन्दुः परनारीषु पार्वति । सर्वसिद्धीश्वरो भूत्वा विहरेत् क्षितिमण्डले ॥ २१॥ ॥ इति श्रीकालीविलासतन्त्रे श्रीभुवनेश्वरी शतनामस्तोत्रं समाप्तम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्री भुवनेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्, 'कालीविलास तंत्र' के दशम पटल से लिया गया एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र स्वयं भगवान शिव (ईशान) द्वारा देवी पार्वती के अनुरोध पर कहा गया है। इसकी महिमा इस बात में निहित है कि यह दशमहाविद्याओं (Dashamahavidya) में से चतुर्थ महाविद्या, देवी भुवनेश्वरी के 108 दिव्य नामों का संग्रह है। देवी भुवनेश्वरी को ब्रह्मांड की अधीश्वरी माना जाता है; वे स्थान (space) और सृष्टि की स्वामिनी हैं। भगवान शिव कहते हैं कि कलियुग में सहस्रनाम (हजार नामों) का पाठ सिद्ध करना कठिन है, इसलिए यह शतनाम स्तोत्र ही भक्तों के लिए परम कल्याणकारी और शीघ्र फल देने वाला है। इसका विनियोग चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की सिद्धि के लिए किया जाता है।
पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)
यह स्तोत्र आगम-निगम परम्परा के प्रसिद्ध ग्रंथ 'कालीविलास तंत्र' में प्रकट होता है, जहाँ योगीन्द्र भगवान शिव और देवी पार्वती के बीच संवाद चल रहा है। देवी पार्वती, जो स्वयं आदिशक्ति हैं, लोक कल्याण के लिए भगवान शिव से देवी भुवनेश्वरी के उस स्वरूप का वर्णन करने का आग्रह करती हैं, जिसकी आराधना से कलियुग के प्राणी सहजता से अपनी कामनाओं को पूर्ण कर सकें। तब भगवान शिव इस गुह्याद् गुह्यतरं (secret of secrets) स्तोत्र को प्रकट करते हैं। वे कहते हैं कि देवी भुवनेश्वरी ही आद्या शक्ति हैं, जो सम्पूर्ण भुवन (ब्रह्मांड) की रचना करती हैं, उसका पालन करती हैं और अंत में स्वयं में विलीन कर लेती हैं। उनके 108 नाम उनके इन्हीं विभिन्न रूपों, शक्तियों और गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह स्तोत्र साधक को सीधे देवी की ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ता है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
देवी भुवनेश्वरी के 108 नाम उनके विराट स्वरूप का वर्णन करते हैं। प्रत्येक नाम एक विशेष शक्ति और गुण का प्रतीक है:
- आद्या, श्रीभुवना, अभव्या (Adya, Shribhuvana, Abhavya): वे सृष्टि की आदि कारण हैं, तीनों लोकों की स्वामिनी हैं और उनका कोई जन्म नहीं होता।
- भवबन्धविमोहिनी (Bhavabandha Vimohini): वे भक्तों को संसार के बंधनों (attachments) से मुक्त करती हैं। यह नाम मोक्ष प्रदान करने की उनकी शक्ति को दर्शाता है।
- निर्मला, मलनाशिनी (Nirmala, Malanashini): वे स्वयं शुद्ध हैं और भक्तों के मन के मैल (अहंकार, क्रोध, लोभ) को नष्ट कर देती हैं, जिससे आध्यात्मिक उन्नति (spiritual upliftment) होती है।
- शुम्भ-निशुम्भनाशिनी (Shumbha-Nishumbha Nashini): यह नाम उनके दुर्गा स्वरूप को इंगित करता है, जो राक्षसी प्रवृत्तियों और नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) का संहार करती हैं।
- शिवाख्या, शिवपूज्या (Shivakhya, Shivapujya): वे शिव से अभिन्न हैं, स्वयं शिव स्वरूपा हैं और शिव द्वारा पूजित हैं। यह शिव और शक्ति की एकता का प्रतीक है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
'कालीविलास तंत्र' में भगवान शिव इस स्तोत्र के पाठ से मिलने वाले फलों का स्पष्ट वर्णन करते हैं:
- अश्वमेध यज्ञ का फल (Fruit of Ashwamedha Yagya): इस स्तोत्र का दस हजार बार पाठ करने से साधक को एक अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है, जो कि सर्वोच्च यज्ञों में से एक है।
- समस्त सिद्धियों की प्राप्ति (Attainment of all Siddhis): जो साधक तंत्र द्वारा निर्देशित विधि से इसका पाठ करता है, वह सर्वसिद्धीश्वरो बनकर पृथ्वी पर विचरण करता है, अर्थात् उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं।
- शत्रु नाश और सुरक्षा (Protection from Enemies): देवी के 'शुम्भ-निशुम्भनाशिनी', 'रौद्री' जैसे नाम साधक को बाहरी और आंतरिक शत्रुओं से सुरक्षा (protection) प्रदान करते हैं।
- सौभाग्य और समृद्धि (Prosperity and Fortune): 'भाग्यशालिनी', 'सुभगा' जैसे नाम साधक के जीवन में सौभाग्य, धन और समृद्धि को आकर्षित करते हैं।
- मोक्ष की प्राप्ति (Attainment of Moksha): 'भवबन्धविमोहिनी' नाम यह सुनिश्चित करता है कि नियमित पाठ करने वाले भक्त को सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिलती है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
यह एक तांत्रिक स्तोत्र है, इसलिए इसकी विधि का पालन करना महत्वपूर्ण है:
- साधक को शुद्ध आत्मा से, अपनी विवाहित पत्नी को वाम भाग (left side) में बैठाकर पाठ करना चाहिए।
- पूजा स्थान सुगंधित धूप से महकता हुआ होना चाहिए।
- पाठ करते समय मुख में ताम्बूल (पान) रखना श्रेष्ठ माना गया है।
- इसका पाठ करने का सबसे शुभ समय शुक्रवार, पूर्णिमा, या नवरात्रि के दिन होता है।
- जो साधक दीक्षा लेकर (initiated) इसका पाठ करता है, उसे विशेष सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। कहा गया है कि ऐसे साधक को पराई स्त्री से दूर रहना चाहिए, अन्यथा वह ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है।