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श्री भोगापुरेश हनुमत्स्तोत्रम्

श्री भोगापुरेश हनुमत्स्तोत्रम्

॥ श्रीभोगापुरेशहनुमत्स्तोत्रम् ॥

प्रणमतु मम मूर्धा भारती प्राणभार्या- भ्रगभुजगपभर्गेन्द्रादिदेवर्षिवन्द्यम् । सकलसुरपतेऽङ्घ्रीन्दीवरद्वन्द्वमुग्रो- ग्रतररिपुकुलघ्नं नाथ भोगापुरेशम् ॥ १॥ यत इतरमृते त्वां मामनुग्राहकं द्राग् सुपवनपविजाने नैव जाने न जाने । विधिकरनिकरेतश्चाधमं मां प्रपन्नं ह्यव किल कृपया त्वां नौमि भोगापुरेशम् ॥ २॥ वरसदनुजिघृक्षात्तेन तेऽनल्पशक्ते कपिवरवपुषाऽऽविर्भूय भोगापुरे भोः । विषयविषविशिष्टाशेषदोषान्तकं त्वां निखिलनिजजनानां नौमि भोगापुरेशम् ॥ ३॥ असदसुमदतिव्यामोहनार्थं त्विहादा- वनिमिषमधुकेस्वीकर्तुमासप्तघस्रम् । उपयम महसुप्राग्वर्चलादोर्ग्रहं त्वां निजजनकृतसेवां नौमि भोगापुरेशम् ॥ ४॥ स्वजनगणगते कौण्डिन्यगोत्रेऽथ कृष्णे सति तव वरसेवां कर्तरीहाभ्यकार्षीत् । स्वजनवरदरूपं व्यक्तमञ्जोन्नतं त्वां सदयहृदयभक्त्या नौमि भोगापुरेशम् ॥ ५॥ निजजयविजयौ यो जन्मात्मजत्विज- निजयदपज्जाम्युज्जनिं द्वन्द्वभाजम् । विविधवृजिनसङ्गान्मां समभ्युद्धरन्तं कजजनुरनुजं त्वां नौमि भोगापुरेशम् ॥ ६॥ खलकदन कदाचिन्मूर्तिभेदेऽपि तत्रा- धिकतरनिजतेजो दर्शयन् स्वम् शङ्कितान् । अनुदिनमनुकम्पा मय्यलं नाथ तेऽस्तु स्वविधिकरजजे त्वां नौमि भोगापुरेशम् ॥ ७॥ कपिकुलतिलकेशाशोत्तमं स्वाशु भग्नं तव पदयुगलं मे सेवितुं प्रादित त्वम् । पदकमलनिषेवा नाथ ते मां हि नेष्य- त्युचितगतिमलं त्वां नौमि भोगापुरेशम् ॥ ८॥ नुतिगतपदमुक्तामालयेत्यष्टपद्य- प्रवरतमगुणिन्या मालिनी कृष्णजन्या । सुफलमिह हनूमन्मूर्तिरेषाप्यमुत्र स्तुतिमथ पठते तामञ्जसा ते प्रदद्यात् ॥ ९॥ वाग्विट्विञ्चसहस्रकेन्द्रमुनिमुख्यादिप्रणीतार्हण प्राण त्वं कृपया त्वदङ्घ्रिनिरतं नः पोषकं चान्वहम् । त्वद्भक्तस्वभिमन्त्रिताक्षतशिखं तत्कामितं पूरयन् श्रीमद्वेङ्कटराजमाश्वव चिरं भोगेश तुभ्यं नमः ॥ १०॥ ॥ इति श्रीभोगापुरेशहनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

श्री भोगापुरेश हनुमत्स्तोत्रम् भगवान हनुमान की एक दुर्लभ और अत्यंत मधुर स्तुति है, जो दक्षिण भारत के भोगापुर (Bhogapuram, Andhra Pradesh) स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर से संबंधित है। यहाँ हनुमान जी को 'भोगापुरेश' (भोगापुर के स्वामी) के रूप में पूजा जाता है। यह स्तोत्र 'मालिनी' छंद (Malini Meter) में रचा गया है, जो संस्कृत काव्य का एक अत्यंत प्रिय और गेय छंद है। इसमें हनुमान जी के उस दिव्य स्वरूप का वर्णन है जो भक्तों को केवल संकटों से ही नहीं बचाता, बल्कि उन्हें 'भोग' (सांसारिक सुख) और 'मोक्ष' (अंतिम गति) दोनों प्रदान करता है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

इस स्तोत्र के 10 श्लोकों में हनुमान जी के दिव्य गुणों और लीलाओं का सुंदर चित्रण है:
  • प्राणभार्या पति (Lord of Prana): पहले ही श्लोक में कवि कहते हैं "प्रणमतु मम मूर्धा भारती प्राणभार्या-भ्रगभुजग..."। यहाँ हनुमान जी को मुख्य प्राण (वायु) का स्वामी माना गया है, जिनकी शक्ति से ही वाणी (भारती) और जीवन सक्रिय है।
  • रिपुकुल नाशक: उन्हें "उग्रतररिपुकुलघ्नं" (अत्यंत उग्र शत्रुओं के कुल का नाश करने वाला) कहा गया है। वे भक्तों के शत्रुओं (enemies) का दमन कर उन्हें अभय प्रदान करते हैं।
  • अधम उद्धारक: श्लोक 2 में भक्त कहता है—"विधिकरनिकरेतश्चाधमं मां प्रपन्नं" (मैं विधि के विधान और कर्मों से दबा हुआ एक अधम जीव हूँ)। वह हनुमान जी से प्रार्थना करता है कि मेरे जैसा कोई नहीं और आपके जैसा कोई रक्षक नहीं, इसलिए मेरा उद्धार करें।
  • कौण्डिन्य गोत्र और वरद रूप: श्लोक 5 में उल्लेख है कि उन्होंने "कौण्डिन्य गोत्र" (एक ऋषि वंश) में जन्म लेकर अपने जनों को वरदान दिया। यह उनके अवतार की एक विशिष्ट लीला की ओर संकेत करता है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

स्तोत्र के अंतिम श्लोकों (9 और 10) में इसके पाठ के अद्भुत लाभ बताए गए हैं:
  • सुफल और अभीष्ट सिद्धि: "सुफलमिह हनूमन्मूर्तिरेषाप्यमुत्र... तामञ्जसा ते प्रदद्यात्"—जो भक्त इस 'मालिनी' छंद वाली स्तुति का पाठ करता है, हनुमान जी उसे इस लोक में उत्तम फल (success) और परलोक में सद्गति प्रदान करते हैं।
  • उचित गति (Spiritual Progress): "नेष्यत्युचितगतिमलं"—हनुमान जी भक्त को भटकने नहीं देते, बल्कि उसे जीवन की सही दिशा और अंत में मोक्ष की 'उचित गति' तक ले जाते हैं।
  • कामना पूर्ति: "तत्कामितं पूरयन्"—वे भक्त द्वारा अभिमंत्रित अक्षत (चावल) और पूजा को स्वीकार कर उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
  • श्री वेंकटेश कृपा: श्लोक 10 में "श्रीमद्वेङ्कटराजमाश्वव" (श्री वेंकटेश भगवान की तरह रक्षा करने वाले) कहकर उन्हें भगवान बालाजी का ही स्वरूप बताया गया है, जो धन और ऐश्वर्य देने वाले हैं।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • लय: चूंकि यह 'मालिनी' छंद में है, इसे गाकर पढ़ना बहुत प्रभावशाली होता है। इसकी लय मन को तुरंत शांत कर देती है।
  • शुभ दिन: शनिवार और मंगलवार को इसका पाठ विशेष फलदायी है।
  • विधि: हनुमान जी के सामने दीपक जलाएं और उन्हें तुलसी या पान का बीड़ा अर्पित करें। फिर श्रद्धापूर्वक इस अष्टक (10 श्लोकों) का पाठ करें।
  • संकल्प: यदि कोई विशेष इच्छा (जैसे विवाह, नौकरी या संतान) हो, तो 41 दिनों तक नित्य पाठ का संकल्प लें।