श्रीभैरवताण्डवस्तोत्रम्

।। श्रीभैरवताण्डवस्तोत्रम् ।।
(अथवा कष्टहरं श्रीभैरवाष्टकस्तोत्रम्)
श्रीगणेशाय नमः ।
श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः ।
श्रीगुरवे नमः ।
श्रीभैरवाय नमः ॥
अथ श्रीभैरवताण्डवस्तोत्रम् ।
ॐ चण्डं प्रतिचण्डं करधृतदण्डं कृतरिपुखण्डं सौख्यकरं
लोकं सुखयन्तं विलसितसन्तं प्रकटितदन्तं नृत्यकरम् ।
डमरुध्वनिशङ्खं(मन्तं) तरलवतंसं(तरं तं ) मधुरहसन्तं लोकभरं
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ १॥
चर्चितसिन्दूरं रणभूविदूरं(रणभुवि शूरं) दुष्टविदूरं श्रीनिकरं
किङ्किणिगणरावं त्रिभुवनपावं खर्प्प(र्प)रसावं पुण्यभरम् ।
करुणामयवेषं सकलसुरेशं मुक्तसुकेशं पापहरं
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ २॥
कलिमलसंहारं मदनविहारं फणिपतिहारं शीघ्रकरं
कलुषं शमयन्तं परिभृतसन्तं मत्तदृगन्तं(छगं तं) शुद्धतरम् ।
गतिनिन्दितकेशं(हंसं) नर्तनदेशं(नरनुतहंसं) स्वच्छकशं(शुकं) सन्मुण्डकरं
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ३॥
कठिनस्तनकुम्भं सुकृतसुलम्भं कालीडिम्भं खड्गधरं
वृतभूतपिशाचं स्फुटमृदुवाचं स्निग्धसुकाचं भक्तभरम् ।
तनुभाजितशेषं विलमसुदेशं सर्वसुरेशं प्रीतिन(प)रं
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ४॥
ललिताननचन्द्रं सुमनवितन्द्रं बोधितमन्द्रं श्रेष्ठवरं
सुखिताखिललोकं परिहृतशोकं शुद्धविलोकं पुष्टिकरम् ।
वरदाभयहारं तरलिततारं क्षुद्रविदा(हा)रं तुष्टिकरं
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ५॥
सकलायुधभारं विजनविहारं सुश्रविशारं(विश्वविसारं) भ्रष्टमलं
शरणागतपालं मृगमदभालं सञ्जितकालं स्वेष्टबलम् ।
पदनूपूरशिञ्जं त्रिनयनकञ्जं गुणिजनरञ्जन कुष्ठहरं
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ६॥
मदयुतसंरावं प्रकटितभावं विश्वसुभावं ज्ञानपदं
रक्तांशुकजोषं परिकृततोषं नाशितदोषं सन्मतिदम् ।
कुटिलभ्रुकुटीकं ज्वरधननी(वी)कं विसरन्ध्रीकं प्रेमभरं
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ७॥
परिनिर्जितकामं विलसितवामं योगिजनाभं(परमभिरामं) योगेशं
बहुमद्यपनाथं गीतसुगाथं कृष्टसुनाथं वीरेशम् ।
कलयन्तमशेषं भृतजनदेशं नृत्यसुरेशं दत्तवरं
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ८॥
इति श्रीभैरवताण्डवस्तोत्रं अथवा कष्टहरं श्रीभैरवाष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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श्री भैरव ताण्डव स्तोत्र का महत्व (Significance of Shri Bhairava Tandava Stotram)
श्री भैरव ताण्डव स्तोत्र भगवान शिव के उग्र रूप, काल भैरव को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तुति है। 'ताण्डव' शब्द भगवान शिव के ब्रह्मांडीय नृत्य को दर्शाता है, जो सृजन और विनाश दोनों का प्रतीक है। इस स्तोत्र में भैरव के उस स्वरूप का वर्णन है जो पापों को नष्ट करने वाला (पापहरं), शत्रुओं का नाश करने वाला (रिपुखण्डं), और भक्तों के कष्टों को हरने वाला (कष्टहरं) है। यह स्तोत्र न केवल भय युक्त मन को शांति देता है, बल्कि जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में भी साधक को साहस और सुरक्षा प्रदान करता है।
उत्पत्ति और देवता (Origin and Deity)
देवता: इस स्तोत्र के मुख्य देवता श्री कालभैरव हैं। वे काशी (वाराणसी) के कोतवाल माने जाते हैं और भगवान शिव के अंशावतार हैं। उनका स्वरूप भयंकर हो सकता है (दण्ड धारण करने वाले, कपाल पहनने वाले), लेकिन अपने भक्तों के लिए वे अत्यंत कृपालु और रक्षक हैं।
परंपरा: यह स्तोत्र शैव परंपरा और विशेष रूप से 'कश्मीरी शैव दर्शन' या तांत्रिक परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जहाँ भैरव को परम चेतना या 'परम शिव' के रूप में पूजा जाता है। 'ताण्डव' यहाँ केवल भौतिक नृत्य नहीं, बल्कि चेतना का स्पंदन है।
परंपरा: यह स्तोत्र शैव परंपरा और विशेष रूप से 'कश्मीरी शैव दर्शन' या तांत्रिक परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जहाँ भैरव को परम चेतना या 'परम शिव' के रूप में पूजा जाता है। 'ताण्डव' यहाँ केवल भौतिक नृत्य नहीं, बल्कि चेतना का स्पंदन है।
स्तोत्र पाठ के लाभ (Benefits of Recitation)
नियमित रूप से श्री भैरव ताण्डव स्तोत्र का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- शत्रु और भय नाश: यह स्तोत्र शत्रुओं के भय और आंतरिक भय (Insecurities) को समाप्त करता है।
- कष्ट निवारण: इसे 'कष्टहरं' कहा गया है, अर्थात यह शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं को दूर करता है।
- ग्रह दोष शांति: विशेष रूप से राहू और केतु जैसे क्रूर ग्रहों के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए भैरव उपासना अचूक मानी जाती है।
- आत्मविश्वास: साधक में असीम ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार होता है।
पाठ विधि (Method of Recitation)
- समय: रविवार (Sunday) या मंगलवार की शाम, या अष्टमी तिथि (विशेषकर कालाष्टमी) को पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।
- दिशा: दक्षिण (South) या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- दीपक: सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
- भाव: पूर्ण समर्पण और निर्भय होकर पाठ करें। भगवान भैरव को 'आपदुद्धारक' मानकर अपनी समस्याएं उनके चरणों में समर्पित कर दें।