श्री बाला त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रम्

॥ पूर्वपीठिका ॥
श्री भैरव उवाच अधुना देवि ! बालायाः स्तोत्रं वक्ष्यामि पार्वति ! । पञ्चमाङ्गं रहस्यं मे श्रुत्वा गोप्यं प्रयत्नतः ॥॥ विनियोग ॥
ॐ अस्य श्रीबालात्रिपुरसुन्दरीस्तोत्रमन्त्रस्य श्री दक्षिणामूर्तिः ऋषिः, पङ्क्तिश्छन्दः, श्रीबालात्रिपुरसुन्दरी देवता, ऐं बीजं, सौः शक्तिः, क्लीं किलकं, श्रीबालाप्रीतये पाठे विनियोगः ।॥ ऋष्यादि न्यास ॥
ॐ श्री दक्षिणामूर्तिऋषये नमः - शिरसि । ॐ श्री पङ्क्तिश्छन्दसे नमः - मुखे । ॐ श्रीबालात्रिपुरसुन्दरी देवतायै नमः - हृदि । ॐ ऐं बीजाय नमः - नाभौ । ॐ सौः शक्तये नमः - गुह्ये । ॐ क्लीं कीलकाय नमः - पादयोः । ॐ श्रीबालाप्रीतये पाठे विनियोगाय नमः - सर्वाङ्गे ।॥ करन्यासः ॥
ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ क्लीं तर्जनीभ्यां नमः । ॐ सौः मध्यमाभ्यां नमः । ॐ ऐं अनामिकाभ्यां नमः । ॐ क्लीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ सौः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।॥ अङ्गन्यास ॥
ॐ ऐं हृदयाय नमः । ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा । ॐ सौः शिखायै वौषट् । ॐ ऐं कवचाय हुम् । ॐ क्लीं नेत्रत्रयाय वौषतट् । ॐ सौः अस्त्राय फट् ।॥ ध्यान ॥
अरुणकिरणजालै रञ्जिताशावकाशा । विधृतजपवटीका पुस्तकाभीतिहस्ता । इतरकरवराढ्या फुल्लकह्लारसंस्था । निवसतु हृदि बाला नित्यकल्याणरूपा ॥॥ मानस पूजन ॥
ॐ लं पृथिवीतत्त्वात्मकं गन्धं श्रीबालात्रिपुराप्रीतये समर्पयामि नमः । ॐ हं आकाशतत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीबालात्रिपुराप्रीतये समर्पयामि नमः । ॐ यं वायुतत्त्वात्मकं धूपं श्रीबालात्रिपुराप्रीतये घ्रापयामि नमः । ॐ रं अग्नितत्त्वात्मकं दीपं श्रीबालात्रिपुराप्रीतये दर्शयामि नमः । ॐ वं जलतत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्रीबालात्रिपुराप्रीतये निवेदयामि नमः । ॐ सं सर्वतत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीबालात्रिपुराप्रीतये समर्पयामि नमः ।॥ मूल श्रीबालास्तोत्रम् ॥
वाणीं जपेद् यस्त्रिपुरे ! भवान्या बीजं निशीथे जडभावलीनः । भवेत स गीर्वाणगुरोर्गरीयान् गिरीशपत्नि प्रभुतादि तस्य ॥ १॥ कामेश्वरि ! त्र्यक्षरी कामराजं जपेद् दिनान्ते तव मन्त्रराजम् । रम्भाऽपि जृम्भारिसभां विहाय भूमौ भजेत् तं कुलदीक्षितं च ॥ २॥ तार्तीयकं बीजमिदं जपेद् यस्त्रैलोक्यमातस्त्रिपुरे ! पुरस्तात् । विधाय लीलां भुवने तथान्ते निरामयं ब्रह्मपदं प्रयाति ॥ ३॥ धरासद्मत्रिवृत्ताष्टपत्रषट्कोणनागरे । विन्दुपीठेऽर्चयेद् बालां योऽसौ प्रान्ते शिवो भवेत् ॥ ४॥॥ फलश्रुति ॥
इति मन्त्रमयं स्तवं पठेद् यस्त्रिपुराया निशि वा निशावसाने । स भवेद् भुवि सार्वभौममौलिस्त्रिदिवे शक्रसमानशौर्यलक्ष्मीः ॥ १॥ इतीदं देवि ! बालाया स्तोत्रं मन्त्रमयं परम् । अदातव्यमभक्तेभ्यो गोपनीयं स्वयोनिवत् ॥ २॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे भैरवभैरवीसंवादे श्रीबालात्रिपुरसुन्दरीस्तोत्रम् समाप्तम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और देवी बाला
श्री बाला त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रम् का उद्गम रुद्रयामल तन्त्र (Rudrayamala Tantra) के भैरव-भैरवी संवाद से हुआ है। 'बाला' माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी का ही 9 वर्षीय बाल स्वरूप है। श्रीविद्या (Sri Vidya) साधना में प्रवेश करने वाले साधक सबसे पहले माँ बाला की ही उपासना करते हैं। वे लीला और कौतुक प्रिय होते हुए भी अत्यधिक शक्तिशाली हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने ही भाण्डासुर के पुत्रों का वध किया था। यह स्तोत्र साधक के भीतर सुप्त चेतना को जगाने का 'प्रथम सोपान' है।
बीज मंत्रों का रहस्य और अर्थ
इस स्तोत्र में माँ बाला के तीन प्रमुख बीज मंत्रों (Beeja Mantras) का बार-बार प्रयोग और न्यास बताया गया है:
- ऐं (Aim): यह 'वाग्भव बीज' है, जो सरस्वती का प्रतीक है। यह साधक को असीमित ज्ञान, बुद्धि और वाक सिद्धि (Speech) प्रदान करता है।
- क्लीं (Kleem): यह 'कामराज बीज' है। यह आकर्षण (Attraction), इच्छा शक्ति और भौतिक सुखों को नियंत्रित करता है। यह तीनों लोकों को मोहित करने की क्षमता रखता है।
- सौः (Sauh): यह 'शक्ति बीज' है। यह पराशक्ति और मोक्ष का प्रतीक है। यह साधक को परम सत्य और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ता है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)
तन्त्र शास्त्र के अनुसार, इस गोपनीय स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित सिद्धियां प्राप्त होती हैं:
- सार्वभौम और शौर्य (Universal Sovereignty): फलश्रुति में कहा गया है—"स भवेद् भुवि सार्वभौम..."। जो साधक इसका निशीथ (आधी रात) में पाठ करता है, वह पृथ्वी पर चक्रवर्ती राजा के समान और स्वर्ग में इंद्र के समान पराक्रमी हो जाता है।
- वाक सिद्धि और ज्ञान: "वाणीं जपेद् यस्त्रिपुरे..." (श्लोक १) - इस स्तोत्र के पाठ से साधक को बृहस्पति के समान ज्ञान और वाणी प्राप्त होती है। जड़बुद्धि भी विद्वान बन जाता है।
- मोक्ष (Liberation): "निरामयं ब्रह्मपदं प्रयाति" - अंत में साधक सभी बन्धनों से मुक्त होकर ब्रह्म पद को प्राप्त करता है।
पाठ करने की विधि और न्यास
- न्यास अनिवार्य है: इस स्तोत्र में दिए गए ऋष्यादि न्यास, करन्यास और अंगन्यास (शरीर के अंगों को स्पर्श करके मंत्र स्थापना) करना अत्यंत आवश्यक है, तभी मंत्र चैतन्य होता है।
- ध्यान (Dhyana): पाठ से पहले "अरुणकिरणजालै..." श्लोक द्वारा देवी के अरुण (लाल) वर्ण, हाथों में जपमाला और पुस्तक धारण किए हुए बाल रूप का ध्यान करें।
- मानस पूजन: इसमें "लं" से पृथ्वी, "हं" से आकाश आदि बीजों द्वारा मानसिक पूजन की विधि भी दी गई है, जिसे पाठ से पूर्व करना चाहिए।
- समय: फलश्रुति के अनुसार, 'निशि वा निशावसाने' (रात में या रात के अंत/ब्रह्म मुहूर्त में) इसका पाठ सर्वाधिक फलदायी होता है।