श्री अष्टविनायक स्तोत्रम्

॥ श्री अष्टविनायकस्तोत्रम् ॥
स्वस्ति श्रीगणनायको गजमुखो मोरेश्वरः सिद्धिदः बल्लाळस्तु विनायकस्त्वथ मढे चिन्तामणिस्थेवरे । लेण्याद्रौ गिरिजात्मजः सुवरदो विघ्नेश्वरश्चोझरे ग्रामे रांजणसंस्थितो गणपतिः कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥वैकल्पिक पाठ (Alternative Version)
स्वस्ति श्रीगणनायकं गजमुखं मोरेश्वरं सिद्धिदं बल्लाळं मुरुडं विनायकं मढं चिन्तामणीस्थेवरम् । लेण्याद्रिं गिरिजात्मजं सुवरदं विघ्नेश्वरं ओझरं ग्रामे रांजणसंस्थितं गणपतिः कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥ ॥ इति अष्टविनायकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्री अष्टविनायक स्तोत्रम् एक अत्यंत संक्षिप्त, फिर भी अत्यधिक शक्तिशाली स्तुति है, जो महाराष्ट्र में स्थित भगवान गणेश के आठ स्वयंभू (self-manifested) स्वरूपों का एक साथ आह्वान करती है। 'अष्टविनायक' का अर्थ है 'आठ विनायक'। यह स्तोत्र एक ही श्लोक में इन आठों पवित्र क्षेत्रों और वहाँ विराजमान गणपति के विशिष्ट नामों का स्मरण कराता है। इसका महत्व इस बात में है कि यह संपूर्ण अष्टविनायक यात्रा (Ashtavinayak Yatra) के पुण्य को एक ही श्लोक में समाहित कर लेता है। किसी भी नए कार्य, यात्रा या अनुष्ठान के आरम्भ में इसका पाठ करने से सभी बाधाएं दूर होती हैं और कार्य में सफलता मिलती है। इसकी अंतिम पंक्ति "कुर्यात् सदा मङ्गलम्" (वे सदैव मंगल करें) एक आशीर्वाद और फलश्रुति दोनों है, जो पाठ करने वाले के जीवन में निरंतर शुभता और कल्याण की कामना करती है।
अष्टविनायक का संदर्भ (Context of the Ashtavinayaka)
अष्टविनायक यात्रा महाराष्ट्र में एक प्रसिद्ध तीर्थयात्रा है, जिसमें पुणे के आसपास स्थित आठ प्राचीन गणेश मंदिरों के दर्शन किए जाते हैं। इन सभी मंदिरों की मूर्तियाँ 'स्वयंभू' मानी जाती हैं, अर्थात् वे मानव-निर्मित नहीं हैं, बल्कि प्राकृतिक रूप से प्रकट हुई हैं। प्रत्येक मंदिर की अपनी एक अनूठी पौराणिक कथा और महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, इस यात्रा को एक विशिष्ट क्रम में पूरा करना होता है, जिसकी शुरुआत मोरगाँव के मोरेश्वर से होती है और अंत में फिर से मोरेश्वर के दर्शन करने पर ही यात्रा पूर्ण मानी जाती है। यह स्तोत्र इन्हीं आठ क्षेत्रों और उनके गणपति का संक्षिप्त स्मरण है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Verse Breakdown and Meaning)
यह एक श्लोकी स्तोत्र प्रत्येक गणपति और उनके स्थान का सटीक वर्णन करता है:
- मोरेश्वर (Moreshwar) at मोरगाँव (Morgaon): "श्रीगणनायको गजमुखो मोरेश्वरः सिद्धिदः" - गजमुख वाले श्री गणनायक, मोरेश्वर सिद्धि प्रदान करने वाले हैं। यह यात्रा का पहला और अंतिम पड़ाव है।
- सिद्धिविनायक (Siddhivinayak) at सिद्धटेक (Siddhatek): श्लोक में उन्हें 'सिद्धिदः' कहा गया है, जो सिद्धटेक के सिद्धिविनायक का प्रतीक है।
- बल्लाळेश्वर (Ballaleshwar) at पाली (Pali): "बल्लाळस्तु विनायकस्तथ" - पाली में स्थित बल्लाळेश्वर, जो अपने भक्त बल्लाल के नाम पर प्रसिद्ध हुए।
- वरदविनायक (Varadavinayak) at महाड (Mahad): "मढे चिन्तामणिस्थेवरे" के बाद 'विनायक' शब्द महाड के वरदविनायक को संदर्भित करता है। (नोट: श्लोक में स्थानों का क्रम यात्रा के क्रम से थोड़ा भिन्न है)।
- चिंतामणि (Chintamani) at थेऊर (Theur): "मढे चिन्तामणिस्थेवरे" - थेऊर में स्थित चिंतामणि गणपति, जो चिंताओं को हरते हैं।
- गिरिजात्मज (Girijatmaj) at लेण्याद्री (Lenyadri): "लेण्याद्रौ गिरिजात्मजः" - लेण्याद्री की गुफा में स्थित गिरिजात्मज (पार्वती के पुत्र)।
- विघ्नेश्वर (Vighneshwar) at ओझर (Ozar): "विघ्नेश्वरश्चोझरे" - ओझर में विघ्नों का हरण करने वाले विघ्नेश्वर।
- महागणपति (Mahaganapati) at रांजणगाँव (Ranjangaon):** "ग्रामे रांजणसंस्थितो गणपतिः" - रांजणगाँव में स्थित महागणपति।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
इस स्तोत्र की फलश्रुति इसकी अंतिम पंक्ति में ही निहित है:
- सर्व-मंगल की प्राप्ति (Attainment of Complete Auspiciousness): "कुर्यात् सदा मङ्गलम्" - इसका पाठ करने वाले पर अष्टविनायक की कृपा से सदैव मंगल (auspiciousness) और कल्याण होता है।
- बाधाओं का निवारण (Removal of Obstacles):** भगवान गणेश विघ्नहर्ता हैं। आठों स्वरूपों का एक साथ स्मरण करने से जीवन के सभी क्षेत्रों—शिक्षा, व्यवसाय, स्वास्थ्य और परिवार—में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
- यात्रा और कार्य में सफलता (Success in Journeys and Endeavors):** किसी भी महत्वपूर्ण कार्य या यात्रा पर निकलने से पहले इस स्तोत्र का पाठ करने से वह कार्य निर्विघ्न रूप से सफल होता है।
- अष्टविनायक यात्रा का पुण्य (Merit of the Pilgrimage):** जो लोग शारीरिक या अन्य कारणों से पूरी अष्टविनायक यात्रा नहीं कर सकते, वे इस स्तोत्र के नित्य पाठ से उस यात्रा का मानसिक पुण्य और आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- यह एक नित्य पठनीय स्तोत्र है, जिसे प्रतिदिन की पूजा में आसानी से शामिल किया जा सकता है।
- इसका पाठ करने का सबसे शुभ दिन बुधवार और संकष्टी चतुर्थी है।
- किसी भी नए कार्य का शुभारंभ करने से पहले, घर से यात्रा के लिए निकलने से पहले, या किसी परीक्षा/साक्षात्कार से पहले इसका 1, 3, या 11 बार पाठ करना चाहिए।
- पाठ करते समय मन में अष्टविनायक के आठों स्वरूपों का ध्यान करने से इसका प्रभाव और भी बढ़ जाता है।