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श्री आपदुद्धारक बटुक भैरव स्तोत्रम्

श्री आपदुद्धारक बटुक भैरव स्तोत्रम्
अथ स्तोत्रम्

(रुद्रयामलेतन्त्रेविश्वसारोद्धारे) अथमूलनामावलीपाठः- ॐ ह्रीं भैरवो भूतनाथश्च भूतत्मा भूतभावनः। क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालश्च क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट्॥१॥ श्मशानवासी मांसशी खर्पराशी स्मरान्तकः। रक्तपः पानपः सिद्धः सिद्धिदः सिद्धसेवितः॥२॥ कङ्कालः कालः कालशमनः कलाकाष्ठातनुः कविः। त्रिनेत्रो बहुनेत्रश्च तथा पिङ्गललोचनः॥३॥ शूलपाणिः खड्गपाणिः कङ्काली धूम्रलोचनः। अभीरुर्भैरवीनाथो भूतपो योगिनीपतिः॥४॥ धनदोऽधनहारी च धनवान् प्रतिभानवान्। नागहारो नागपाशो व्योमकेशः कपालभृत्॥५॥ कालः कपालमाली च कमनीयः कलानिधिः। त्रिलोचनो ज्वलन्नेत्रस्त्रिशिखी त्रिलोकपः॥६॥ त्रिनेत्रतनयो डिम्भः शान्तः शान्तजनप्रियः। बटुको बहुवेषश्च खट्वाङ्गवरधारकः॥७॥ भूताध्यक्षः पशुपतिर्भिक्षुकः परिचारकः। धूर्तो दिगम्बरः शूरो हरिणः पाण्डुलोचनः॥८॥ प्रशान्तः शान्तिदः शुद्धः शङ्करप्रियबान्धवः। अष्टमूर्तिर्निधीशश्च ज्ञानचक्षुस्तपोमयः॥९॥ अष्टाधारः षडाधारः सर्पयुक्तशिखीसखः। भूधरो भूधराधीशो भूपतिर्भूधरात्मजः॥१०॥ कङ्कालधारी कालधारी मण्डी च आन्त्रयज्ञोपवीतवान्। जृम्भणो मोहनः स्तम्भी मारणः क्षोभणस्तथा॥११॥ शुद्धनीलाञ्जनप्रख्यो यो दैत्यहा मुण्डभूषितः। बलिभुग् बलिभुङ्नाथो बालोऽबालपराक्रमः॥१२॥ सर्वापत्तारणो दुर्गो दुष्टभूतनिषेवितः। कामी कलानिधिकान्तः कामिनीवशकृद्वशी॥१३॥ जगद्रक्षाकरोऽनन्तो मायामन्त्रौषधीमयः। सर्वसिद्धिप्रदो वैद्यः प्रभविष्णुरिती वह्रि ह्रीं ॐ॥१४ (सर्वसिद्धिप्रदो वैद्यः प्रभविष्णुः करोतु शम्) ॥१४॥ फलश्रुति

(शिवपार्वतीसंवादे) अष्टोत्तरशतं नाम्ना भैरवस्य महात्मनः। मया ते कथितं देवि रहस्यं सर्वकामदम्॥ य इदं पठति स्तोत्रं नामाष्टशतमुत्तमम्। न तस्य दुरितं किञ्चिन्न रोगेभ्यो भयं भवेत्॥ न च मारीभयं किञ्चिन्न न च भूतभयं क्वचित्। न शत्रुर्भयो भयं किञ्चित् प्राप्नुयान् मानवः क्वचित्॥ पातकेभ्यो भयं नैव यः पठेत् स्तोत्रमुत्तमम्। मारीभये राजभये तथा चौराग्निजे भये॥ औत्पातिके महाघोरे तथा दुःस्वप्नदर्शने। बन्धने धने च तथा घोरे पठेत् स्तोत्रमनुत्तमम्॥ सर्वप्रशममायाति भयं भैरवकीर्तनात्। एकादशसहस्रं तु पुरश्चरणमुच्यते॥ यस्त्रिसन्ध्यं पठेद् देवि संवत्सरमतन्द्रितः। स सिद्धिं प्राप्नुयादिष्टां दुर्लभां अपि मानवः॥ षण्मासं भूमिकामस्तु जपित्वा प्राप्नुयान् महीम्। राजशत्रुविनाशार्थं पठेन् मासाष्टकं पुनः॥ रात्रौ वारत्रयं यश्चैव नाशयत्येव शात्रवान्। जपेन् मासत्रयं मर्त्यो राजानवशमानयेत्॥ धनार्थी च सुतार्थी च दारार्थी चापि मानवः। पठेन् मासत्रयं देवि वारमेकं तथा निशि॥ धनं पुत्रं तथा दारान् प्राप्नुयान् नात्र संशयः। रोगी रोगात् प्रमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात्। भीतो भयात् प्रमुच्येत आपन्न आपदः॥ निगडैश्चापि बद्धो यः कारागृहनिपातितः। श‍ृङ्खलाबन्धनं प्राप्तः पठेच्चैव दिवानिशम्॥ यान्यान्समीहते कामाँस्ताँस्तानाप्नोति मानवः। अप्रकाश्यं परं गुह्यं न देयं यस्य कस्य चित्॥ सुकुलीनाय शान्ताय ऋजवदम्भवर्जिते। दद्यात् स्तोत्रमिदं पुण्यं सर्वकामफलप्रदम्॥ य इदं पठते नित्यं धनधान्यमवाप्नुयात्। इति श्रीरुद्रयामलेतन्त्रेविश्वसारोद्धारे श्रीमदापदुद्धारकबटुकभैरवस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

बटुक भैरव स्तोत्र का महत्व (Significance of Batuk Bhairava Stotra)

बटुक भैरव स्तोत्र भगवान भैरव के बटुक स्वरूप को समर्पित है। यह स्तोत्र भक्तों को सभी प्रकार की आपदाओं, संकटों और नकारात्मक शक्तियों से बचाने में सहायक माना जाता है। बटुक (Batuk) शब्द का अर्थ है 'छोटा बालक', और भैरव का यह स्वरूप बाल रूप में भक्तों की रक्षा करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भय, रोग, और शत्रुओं से मुक्ति मिलती है, और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी है जो जीवन में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं और सुरक्षा और मार्गदर्शन की तलाश में हैं।

बटुक भैरव स्तोत्र की उत्पत्ति (Origin of Batuk Bhairava Stotra)

श्री आपदुद्धारक बटुक भैरव स्तोत्र रुद्रयामल तंत्र के विश्वसारोद्धार भाग से लिया गया है। रुद्रयामल तंत्र एक प्राचीन ग्रंथ है जो भगवान शिव और देवी पार्वती के संवादों पर आधारित है। इस तंत्र में विभिन्न देवी-देवताओं की उपासना विधियों, मंत्रों और स्तोत्रों का वर्णन है। यह स्तोत्र भगवान भैरव के महत्व और उनकी कृपा को दर्शाता है। इस स्तोत्र के माध्यम से, भगवान भैरव के विभिन्न नामों और गुणों का वर्णन किया गया है, जो भक्तों को उनकी आराधना करने और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने में मदद करते हैं।

बटुक भैरव स्तोत्र का अर्थ (Meaning of Batuk Bhairava Stotra)

बटुक भैरव स्तोत्र भगवान भैरव के विभिन्न नामों और गुणों का वर्णन करता है। प्रत्येक नाम भगवान भैरव के एक विशेष पहलू को दर्शाता है, जैसे कि उनका भूतनाथ होना, क्षेत्रपाल होना, और भक्तों की रक्षा करना। स्तोत्र में भगवान भैरव को श्मशानवासी, मांसशी, और स्मरान्तक के रूप में भी वर्णित किया गया है, जो उनके उग्र रूप को दर्शाता है। स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान भैरव के इन विभिन्न रूपों और गुणों का ज्ञान होता है, और वे उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। स्तोत्र में 'ह्रीं' और 'ॐ' जैसे बीज मंत्रों का भी प्रयोग किया गया है, जो स्तोत्र की शक्ति को बढ़ाते हैं।

बटुक भैरव स्तोत्र के लाभ (Benefits of Batuk Bhairava Stotra)

बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं:
  • आपदाओं से मुक्ति (Relief from Disasters): यह स्तोत्र भक्तों को सभी प्रकार की आपदाओं और संकटों से बचाता है।
  • सुरक्षा (Protection): यह स्तोत्र नकारात्मक शक्तियों, भूत-प्रेतों और शत्रुओं से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • रोगों से मुक्ति (Relief from Diseases): स्तोत्र का पाठ करने से रोगों से मुक्ति मिलती है और स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  • भय से मुक्ति (Relief from Fear): यह स्तोत्र भय और चिंता को दूर करता है और मन को शांति प्रदान करता है।
  • समृद्धि (Prosperity): स्तोत्र का नियमित पाठ करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है।
  • इच्छापूर्ति (Fulfillment of Desires): यह स्तोत्र भक्तों की इच्छाओं को पूरा करने में सहायक होता है।

बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ कैसे करें (How to Recite Batuk Bhairava Stotra)

बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें:
  • शुद्धता (Purity): स्तोत्र का पाठ करने से पहले स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • स्थान (Place): एक शांत और पवित्र स्थान चुनें जहाँ आप ध्यान केंद्रित कर सकें।
  • मूर्ति या चित्र (Idol or Picture): भगवान भैरव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  • दीपक और धूप (Lamp and Incense): दीपक जलाएं और धूप करें।
  • पाठ (Recitation): स्तोत्र का पाठ ध्यानपूर्वक और भक्तिभाव से करें।
  • नियम (Rules): फलश्रुति में दिए गए नियमों का पालन करें, जैसे कि एकादश सहस्र (11,000) पाठ का पुरश्चरण।
  • समय (Time): त्रिसंध्या (सुबह, दोपहर, शाम) में पाठ करना विशेष फलदायी होता है।

फलश्रुति का महत्व (Importance of Phalashruti)

फलश्रुति स्तोत्र के अंत में दी गई होती है और यह स्तोत्र के पाठ के लाभों का वर्णन करती है। बटुक भैरव स्तोत्र की फलश्रुति में बताया गया है कि इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को सभी प्रकार के भय, रोग, और शत्रुओं से मुक्ति मिलती है। यह भी बताया गया है कि स्तोत्र का नियमित पाठ करने से धन, पुत्र, और दार (पत्नी) की प्राप्ति होती है। फलश्रुति में स्तोत्र के पुरश्चरण (निश्चित संख्या में पाठ) और पाठ के समय के बारे में भी जानकारी दी गई है, जो भक्तों को स्तोत्र का अधिकतम लाभ प्राप्त करने में मदद करती है। फलश्रुति स्तोत्र के महत्व को और भी बढ़ा देती है और भक्तों को इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करने के लिए प्रेरित करती है।

सावधानी (Caution)

स्तोत्र के फलश्रुति में यह भी उल्लेख है कि इस स्तोत्र को हर किसी को नहीं देना चाहिए। यह स्तोत्र केवल सुकुलीनाय (अच्छे कुल वाले), शान्ताय (शांत स्वभाव वाले), ऋजवदम्भवर्जिते (सरल और अहंकार रहित) व्यक्ति को ही देना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि स्तोत्र की शक्ति का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए, और इसे केवल उन लोगों को देना चाहिए जो इसका सम्मान करते हैं और इसका सही उपयोग करते हैं।