Logoपवित्र ग्रंथ

श्री अञ्जनशैलनाथ स्तोत्रम्

श्री अञ्जनशैलनाथ स्तोत्रम्

॥ श्रीअञ्जनशैलनाथस्तोत्रम् ॥

पुलकिनि भुजमध्ये पूजयन्तं पुरन्ध्रीं भुवननयनपुण्यं पूरिताशेषकामम् । पुनरपि वृषशैले फुल्लनीलोत्पलाभं पुरुषमनुभवेयं पुण्डरीकायताक्षम् ॥ १॥ आजानसौहृदमपारकृपामृताब्धिं अव्याजवत्सलमवेलसुशीलमाद्यम् । आनन्दराशिमनुरागमयावरोधं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ २॥ आताम्रपादमवदातसुवर्णचेलं आपीनबाहुशिखरोज्ज्वलशङ्खचक्रम् । आविस्स्मिताननममन्ददयाकटाक्षं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ ३॥ अप्राकृतावयवसंहितसंनिवेशं आरूढयौवनमहीनकुमारभावम् । अम्लानकान्तिमतिवाङ्मनसानुभावं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ ४॥ आशावकाशसमुदित्वरसर्वगन्धं आस्वादयत्सुगमसर्वरसस्वभावम् । आश्लेषगम्यसुखसंस्पृशनातिरेकं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ ५॥ आदर्शयन्तमतिसंकुचिताक्षिशक्तिं आश्रावयन्तमखिलान् बधिरान् प्रकृत्या । आभाषयन्तमभितो नतमूकवर्गं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ ६॥ आधावयन्तमतिमारुतमेव पङ्गून् आजानुलम्बिभुजयन्तमहो कुबाहून् । अन्यांश्च कृतशिरसः प्रतिजीवयन्तं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ ७॥ आजन्मनिर्धनजनानलकेशयन्तं अज्ञानपि त्रिदशदेशिकदेश्ययन्तम् । अह्नाय वन्ध्यमपि मर्त्यमवन्ध्ययन्तं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ ८॥ आबद्धकङ्कणमशेषशरण्यतायां आपत्सहायमपराधसहं नतानाम् । आसन्नसामगसुखालससूरिवर्गं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ ९॥ अध्यासितासनसरोजसनूपुराङ्घ्रिं आमुक्तवीरकटकायतवृत्तजङ्घम् । आश्चर्यजानुयुगमप्रतिमोरुकाण्डं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ १०॥ आवर्तिनिम्ननिखिलाण्डनिदाननाभिं आयामिदोर्विवरकेलिगृहावरोधम् । आबद्धरत्नमयभूषभुजाचतुष्कं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ ११॥ अंसावलम्बिमणिकुण्डलकान्तगण्डं आविस्स्मितांशुमधुराधरबन्धुजीवम् । आस्याब्जसौरभसमुत्सुकदीर्घनासं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ १२॥ अर्धेन्दुभास्वदलिकोल्लसदूर्ध्वपुण्ड्रं आलोलनीलकुटिलालकचारुवक्त्रम् । आविर्मयूखमणिचूडमहाकिरीटं आराधयामि हरिमञ्जनशैलनाथम् ॥ १३॥ वादिभीतिकरार्येण रचिता भावबन्धतः । शोभते वेङ्कटाद्रीशविषया स्तुतिरद्भुता ॥ ॥ इति अञ्जनशैलनाथस्तोत्रं संपूर्णम् ॥
संलिखित ग्रंथ पढ़ें

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

श्री अञ्जनशैलनाथ स्तोत्रम् (Shri Anjanashailanatha Stotram) भगवान वेंकटेश्वर (भगवान बालाजी) को समर्पित एक अत्यंत प्रभावशाली और दुर्लभ स्तुति है। इसकी रचना श्री वैष्णव सम्प्रदाय के महान आचार्य वादिभीतिकर आर्य (Vadi Bhitikara Arya) ने की थी। 'अञ्जनशैल' तिरुमला की सात पहाड़ियों में से एक है, जिसे अंजनाद्रि (Anjanadri) भी कहा जाता है। यह स्तोत्र भगवान श्रीनिवास के दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है और उन्हें 'हरि' और 'अञ्जनशैलनाथ' (अंजनाद्रि के स्वामी) के रूप में संबोधित करता है।
इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल भगवान की सुंदरता का वर्णन नहीं करता, बल्कि उनके औषधीय और चमत्कारिक गुणों (healing powers) पर विशेष बल देता है। इसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि भगवान वेंकटेश्वर की कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है—गूंगे बोलने लगते हैं, बहरे सुनने लगते हैं, और दरिद्र धनवान हो जाते हैं।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

स्तोत्र के १३ श्लोकों में भगवान के नख-शिख सौंदर्य और उनकी करुणा का अद्भुत मिश्रण है:
  • दिव्य सौंदर्य (Divine Beauty): कवि भगवान के "फुल्लनीलोत्पलाभं" (खिले हुए नील कमल जैसी कांति), "पुण्डरीकायताक्षम्" (कमल जैसे विशाल नेत्र), और "आविस्स्मितानन" (मंद मुस्कान युक्त मुख) का वर्णन करते हैं। वे शंख और चक्र धारण किए हुए हैं और उनके वक्षस्थल पर माँ लक्ष्मी विराजमान हैं।
  • करुणा के सागर (Ocean of Compassion): उन्हें "अपारकृपामृताब्धिं" (अपार कृपा रूपी अमृत का सागर) और "अव्याजवत्सल" (बिना किसी कारण के वात्सल्य लुटाने वाले) कहा गया है। वे अपने भक्तों के अपराधों को क्षमा करने वाले ("अपराधसहं") और आपत्ति में रक्षक ("आपत्सहाय") हैं।
  • चमत्कारिक शक्तियां (Miraculous Powers): श्लोक ६, ७ और ८ में बताया गया है कि भगवान नेत्रहीनों को दृष्टि, बहरों को श्रवण, लंगड़ों को गति प्रदान करते हैं, दरिद्रों को कुबेर बना देते हैं, और बांझपन को दूर कर संतान सुख प्रदान करते हैं।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं, जैसा कि इसके श्लोकों में निहित है:
  • रोग निवारण (Cure for Diseases): यह स्तोत्र गंभीर शारीरिक व्याधियों, विशेषकर इंद्रियों से संबंधित दोषों (दृष्टि, श्रवण, वाणी) को दूर करने के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • दरिद्रता नाश (Removal of Poverty): "आजन्मनिर्धनजनानलकेशयन्तं"—इसका पाठ जन्मजात दरिद्रता को दूर कर समृद्धि (prosperity) और धन-धान्य प्रदान करता है।
  • संतान प्राप्ति (Progeny): निःसंतान दंपत्तियों के लिए यह स्तोत्र एक वरदान है, क्योंकि यह "वन्ध्यत्व" (baanjhpan) को समाप्त करने की शक्ति रखता है।
  • संकट रक्षा (Protection from Crisis): भगवान को "आपत्सहाय" कहा गया है। जीवन के किसी भी घोर संकट या भय के समय इसका पाठ सुरक्षा कवच का काम करता है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • शुभ दिन: शनिवार (Saturday), जो भगवान वेंकटेश्वर को प्रिय है, और एकादशी (Ekadashi) के दिन इसका पाठ सर्वश्रेष्ठ है।
  • विधि: स्नान करके पवित्र होकर, भगवान वेंकटेश्वर या विष्णु के चित्र के सामने दीपक जलाएं। तुलसी दल अर्पित करें।
  • संकल्प: यदि किसी विशेष रोग या समस्या (जैसे कर्ज या संतान हीनता) के लिए पाठ कर रहे हैं, तो संकल्प लेकर ४८ दिनों (एक मंडल) तक नित्य पाठ करें।
  • ध्यान: पाठ करते समय तिरुमला के शिखरों पर विराजमान, शंख-चक्र धारी, मंद मुस्कुराते हुए भगवान श्रीनिवास का ध्यान करें।