श्री राघवेन्द्र प्रतिकूलस्वानुकूलीकरण स्तोत्रम्

॥ श्रीराघवेन्द्रप्रतिकूलस्वानुकूलीकरणस्तोत्रम् ॥
श्रीभूपे कूपे सुखवारां कृतचित्तं चित्ते त्वां ध्यायामि च भूयोऽहममत्तः । स्वामिन् भूमन् भो गुरुराज प्रतिकूलं दारापत्याद्यं सकलं कुर्वनुकूलम् ॥ १॥ राष्ट्रे राष्ट्रे ख्यातयशस्तोम विभासिन् वासिन् ध्यातुश्चेतसि दातः करुणावान् । स्वामिन् भूमन् भो गुरुराज प्रतिकूलं दारापत्याद्यं सकलं कुर्वनुकूलम् ॥ २॥ घोरे संसारे पतितोऽहं तव पुत्रः कुत्रावेयं त्वामपहाय प्रभुमिष्टम् । स्वामिन् भूमन् भो गुरुराज प्रतिकूलं दारापत्याद्यं सकलं कुर्वनुकूलम् ॥ ३॥ वेदाहं नो सद्गतिहेतुं तव पोतः पूतं पादादन्यदृते संसृतिवार्धेः । स्वामिन् भूमन् भो गुरुराज प्रतिकूलं दारपत्याद्यं सकलं कुर्वनुकूलम् ॥ ४॥ द्रावं द्रावं नश्यति कष्टं तव दृष्ट्या कष्ट्यापं त्वातः कुरु तुष्टं वृषपुष्पम् । स्वामिन् भूमन् भो गुरुराज प्रतिकूलं दारपत्याद्यं सकलं कुर्वनुकूलम् ॥ ५॥ यत्यतुच्च त्वद्वरेणुं गतमानौ दार्यं धार्यं मूर्धनि वार्यन्नदमीढे । स्वामिन् भूमन् भो गुरुराज प्रतिकूलं दारापत्याद्यं सकलं कुर्वनुकूलम् ॥ ६॥ नाना नाना दैवकदम्बे सविलम्बे लम्बे स्मालम्बं सुखदं त्वामविलम्बम् । स्वामिन् भूमन् भो गुरुराज प्रतिकूलं दारपत्याद्यं सकलं कुर्वनुकूलम् ॥ ७॥ मन्त्रं ते मन्त्रालयधामन् भुवि जप्तुः पातुः पादाम्भो लघु नश्यत्यतिदुःखम् । स्वामिन् भूमन् भो गुरुराज प्रतिकूलं दारापत्याद्यं सकलं कुर्वनुकूलम् ॥ ८॥ चक्रेऽष्टश्लोकीमवधूतः कविकृष्णः तत्पाठेन त्वं भव तुष्टो हर कष्टम् । स्वामिन् भूमन् भो गुरुराज प्रतिकूलं दारापत्याद्यं सकलं कुर्वनुकूलम् ॥ ९॥ ॥ इति श्रीकृष्णावधूतविरचिते श्रीराघवेन्द्रतन्त्रे नवमपटले प्रतिकूल-स्वानुकूलीकरणस्तोत्रं नाम सप्तमोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्री राघवेन्द्र प्रतिकूलस्वानुकूलीकरण स्तोत्रम्, 'राघवेन्द्र तंत्र' से लिया गया एक और अद्भुत स्तोत्र है, जिसकी रचना श्री कृष्णावधूत पंडित ने की है। इस स्तोत्र का नाम ही इसके उद्देश्य को स्पष्ट करता है: "प्रतिकूल-स्व-अनुकूली-करण", अर्थात् प्रतिकूल (unfavorable) को अपने अनुकूल (favorable) बनाना। यह स्तुति उन भक्तों के लिए एक शक्तिशाली साधन है जो पारिवारिक कलह, सामाजिक विरोध, शत्रु बाधा या किसी भी प्रकार की नकारात्मक परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। स्तोत्र की हर पंक्ति में दोहराई जाने वाली प्रार्थना, "स्वामिन् भूमन् भो गुरुराज प्रतिकूलं दारापत्याद्यं सकलं कुर्वनुकूलम्" (हे स्वामी, हे सर्वव्यापी, हे गुरुराज! मेरे परिवार, बच्चों आदि सभी प्रतिकूलों को मेरे अनुकूल कर दें), भक्त की पीड़ा और गुरु के प्रति उसके अटूट विश्वास को दर्शाती है। यह केवल भौतिक समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि मानसिक शांति और सद्भाव स्थापित करने का भी एक अचूक उपाय है।
संत श्री राघवेन्द्र स्वामी का संदर्भ (Context of Guru Raghavendra)
श्री राघवेन्द्र स्वामी, जिन्हें 'कलयुग के कामधेनु' और 'जीवित संत' के रूप में पूजा जाता है, अपने भक्तों की हर प्रकार की समस्याओं का समाधान करने के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपने जीवन काल में और वृंदावन प्रवेश के बाद भी अनगिनत चमत्कार किए हैं, जिनमें उन्होंने विरोधियों को मित्र बनाया, बीमारों को ठीक किया और निर्धनों को समृद्ध किया। यह स्तोत्र उनकी इसी चमत्कारी और करुणामयी शक्ति का आह्वान करता है। भक्त उन्हें एक ऐसे सक्षम गुरु के रूप में देखता है जिनकी दृष्टि (
तव दृष्ट्या) मात्र से सभी कष्ट तुरंत (द्रावं द्रावं) नष्ट हो जाते हैं। मन्त्रालयम् (Mantralayam) में स्थित उनका वृंदावन आज भी लाखों भक्तों के लिए आस्था और विश्वास का केंद्र है, जहाँ वे अपनी समस्याओं का समाधान पाने के लिए आते हैं।स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
यह स्तोत्र गुरु के प्रति एक बालक जैसी সরল आस्था और पूर्ण समर्पण का प्रतीक है:
- गुरु ही एकमात्र आश्रय (The Guru as the Only Refuge): "कुत्रावेयं त्वामपहाय प्रभुमिष्टम्" - हे प्रभु! आपको छोड़कर मैं और कहाँ जाऊँ? यह दर्शाता है कि भक्त के लिए गुरु ही अंतिम और एकमात्र आश्रय हैं।
- गुरु कृपा ही सद्गति का साधन (Guru's Grace as the Means to Salvation): "वेदाहं नो सद्गतिहेतुं तव पोतः पूतं पादादन्यदृते संसृतिवार्धेः" - मैं जानता हूँ कि इस संसार-सागर में आपके पवित्र चरण-रूपी नाव के अलावा सद्गति का कोई और साधन नहीं है।
- पूर्ण समर्पण का भाव (The Act of Complete Surrender): "दार्यं धार्यं मूर्धनि वार्यन्नदमीढे" - मैं आपके चरणों की धूल को अपने मस्तक पर धारण करता हूँ। यह भक्त के अहंकार के पूर्ण समर्पण और गुरु के प्रति सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक है।
- आठ श्लोकों की शक्ति (The Power of the Eight Verses): अंतिम श्लोक में स्वयं कवि कहते हैं, "चक्रेऽष्टश्लोकीमवधूतः कविकृष्णः तत्पाठेन त्वं भव तुष्टो हर कष्टम्" - अवधूत कवि कृष्ण ने इन आठ श्लोकों की रचना की है; इसके पाठ से आप संतुष्ट हों और हमारे कष्टों को हरें।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
इस स्तोत्र के नाम और भाव के अनुसार, इसके पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- पारिवारिक सद्भाव (Family Harmony):** यह स्तोत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो पारिवारिक कलह (family disputes) से पीड़ित हैं।
दारापत्याद्यं(पत्नी, बच्चे आदि) के प्रतिकूल होने की स्थिति में यह स्तोत्र उनमें प्रेम और अनुकूलता लाता है। - शत्रु और विरोधियों पर विजय (Victory over Enemies and Opposition):** जीवन में या कार्यक्षेत्र में यदि कोई व्यक्ति या परिस्थिति आपके विरुद्ध है, तो यह स्तोत्र उन सभी को आपके पक्ष में कर देता है और शत्रु बाधा (enemy obstacles) को शांत करता है।
- नकारात्मक परिस्थितियों का निवारण (Turning Negative Situations Favorable):** यह स्तोत्र केवल व्यक्तियों को ही नहीं, बल्कि हर प्रकार की प्रतिकूल स्थिति, दुर्भाग्य और बाधाओं को भी साधक के लिए अनुकूल और लाभकारी बना देता है।
- मानसिक शांति और निर्भयता (Mental Peace and Fearlessness):** जब जीवन में सब कुछ अनुकूल होने लगता है, तो मन से चिंता, भय और तनाव स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं, जिससे साधक को गहरी मानसिक शांति का अनुभव होता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ दिन गुरुवार है।
- प्रातःकाल स्नान के बाद श्री राघवेन्द्र स्वामी के चित्र के सामने बैठकर, अपनी समस्या का स्मरण करते हुए पूरी श्रद्धा से इसका पाठ करें।
- यदि पारिवारिक कलह या किसी व्यक्ति विशेष से समस्या हो, तो उस व्यक्ति का ध्यान करते हुए गुरुदेव से उसे अनुकूल बनाने की प्रार्थना करें।
- इस स्तोत्र का 9, 11 या 21 बार पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।
- पाठ के बाद "ॐ श्री राघवेन्द्राय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करने से स्तोत्र का प्रभाव और भी बढ़ जाता है।