श्री राघवेन्द्र दारिद्र्यमोचन स्तोत्रम्

॥ श्रीराघवेन्द्रदारिद्र्यमोचनस्तोत्रम् ॥
श्रितानां पादं ते सकलविधया शोकहरणः त्वमेवाम्बा तातस्त्वमसि मम मित्रं सरलहृत् । प्रदातुं स्वच्छन्दं द्रविणमनृणं वत्सल गुरो कलत्राद्यैः साकं सततमनुभोक्तुं च वितर ॥ १॥ रतं वा दुष्टार्ये त्यजति सुतमम्बा किमु पिता कृपां कृत्वा शिश्नोदरकृतमहागस्यपि मयि । प्रदातुं स्वच्छन्दं द्रविणमनृणं वत्सल गुरो कलत्राद्यैः साकं सततमनुभोक्तुं च वितर ॥ २॥ घनाघो वा दीनो वावयवविकलो वाक्षविकलः प्रपन्नश्चेत्पादं तव सुखयसीत्यागममहम् । प्रदातुं स्वच्छन्दं द्रविणमनृणं वत्सल गुरो कलत्राद्यैः साकं सततमनुभोक्तुं च वितर ॥ ३॥ वदान्यात् त्वद्भूमौ दिवि सुरभिकल्पद्रुमदृषदां लघुत्वं जानेऽहं वितरणमिदं वीक्ष्य भवतः । प्रदातुं स्वच्छन्दं द्रविणमनृणं वत्सल गुरो कलत्राद्यैः साकं सततमनुभोक्तुं च वितर ॥ ४॥ द्रवत्कारुण्य श्रीपरिमलसमुद्गारिहृदय त्वदन्यो दाता चेद्भवति कथमायामि वाद मे । प्रदातुं स्वच्छन्दं द्रविणमनृणं वत्सल गुरो कलत्राद्यैः साकं सततमनुभोक्तुं च वितर ॥ ५॥ यथाशक्त्याऽऽराध्य प्रसभममरानप्यथ नरान् व्रजन् देशं देशं श्रमजनिरभूवं न च धनी । प्रदातुं स्वच्छन्दं द्रविणमनृणं वत्सल गुरो कलत्राद्यैः साकं सततमनुभोक्तुं च वितर ॥ ६॥ न बाधन्ते दारा किमिदमधुना मे प्रिय दिशे- त्यमुं मा दारिद्र्यव्यसनपरिपिण्डीकृतहृदयम् । प्रदातुं स्वच्छन्दं द्रविणमनृणं वत्सल गुरो कलत्राद्यैः साकं सततमनुभोक्तुं च वितर ॥ ७॥ महोदारे भूम्नि त्वयि पितरि पुत्रोऽहमधुना जरत्काकावस्थां भृशमनुभवामीश किमिदम् । प्रदातुं स्वच्छन्दं द्रविणमनृणं वत्सल गुरो कलत्राद्यैः साकं सततमनुभोक्तुं च वितर ॥ ८॥ गुरोः पुत्रः सुकविरवधूतः स्तवमहं चकारैकश्वासात सरलमिममादृत्य पठताम् । प्रदातुं स्वच्छन्दं द्रविणमनृणं वत्सल गुरो कलत्राद्यैः साकं सततमनुभोक्तुं च वितर ॥ ९॥ ॥ इति श्रीकृष्णावधूतविरचिते श्रीराघवेन्द्रतन्त्रे नवमपटले दारिद्र्यमोचनस्तोत्रं नाम नवमोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्री राघवेन्द्र दारिद्र्यमोचन स्तोत्रम्, कलि युग के कामधेनु माने जाने वाले महान माध्व संत, श्री राघवेन्द्र स्वामी को समर्पित एक अत्यंत मार्मिक और फलदायी स्तुति है। इसकी रचना श्री कृष्णावधूत पंडित वेदाव्यासाचार्य ने की है और इसका वर्णन 'राघवेन्द्र तंत्र' में मिलता है। इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य 'दारिद्र्य मोचन' अर्थात् दरिद्रता से मुक्ति है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी सीधी, सरल और हृदयस्पर्शी प्रार्थना है। प्रत्येक श्लोक के अंत में दोहराई जाने वाली पंक्ति, "प्रदातुं स्वच्छन्दं द्रविणमनृणं वत्सल गुरो कलत्राद्यैः साकं सततमनुभोक्तुं च वितर" (हे वत्सल गुरु! मुझे इच्छानुसार, ऋण-मुक्त धन प्रदान करें, ताकि मैं अपने परिवार के साथ निरंतर उसका उपभोग कर सकूँ), एक भक्त की भौतिक और मानसिक पीड़ा को सीधे गुरु के चरणों में समर्पित करती है। यह केवल धन की याचना नहीं, बल्कि सम्मान और शांतिपूर्ण जीवन की प्रार्थना है।
संत श्री राघवेन्द्र स्वामी का संदर्भ (Context of Guru Raghavendra)
श्री राघवेन्द्र स्वामी (1595-1671 ई.) द्वैत वेदांत के एक महान संत, दार्शनिक और विद्वान थे। वे प्रह्लाद के अवतार माने जाते हैं। उन्होंने अपना जीवन भगवान हरि की सेवा, वेदान्त के प्रचार और भक्तों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। 1671 में, उन्होंने आंध्र प्रदेश के मन्त्रालयम् (Mantralayam) में तुंगभद्रा नदी के तट पर जीवित समाधि (वृंदावन प्रवेश) ले ली, और अपने भक्तों को वचन दिया कि वे 700 वर्षों तक वृंदावन से उनकी रक्षा और मार्गदर्शन करते रहेंगे। आज भी लाखों भक्त उनकी चमत्कारी कृपा का अनुभव करते हैं। उन्हें 'कलि युग का कल्पवृक्ष' कहा जाता है, जो अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। यह स्तोत्र उन्हीं की इस 'वदान्य' (उदार) और 'करुणानिधि' प्रकृति का आह्वान करता है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
यह स्तोत्र एक भक्त और उसके गुरु के बीच के गहरे, व्यक्तिगत संबंध को दर्शाता है:
- गुरु ही सर्वस्व हैं (The Guru is Everything): "त्वमेवाम्बा तातस्त्वमसि मम मित्रं सरलहृत्" - आप ही मेरी माँ, पिता और सरल हृदय वाले मित्र हैं। यहाँ भक्त गुरु को ही अपना एकमात्र सहारा मानता है, जो हर रिश्ते से बढ़कर हैं।
- असीम करुणा (Infinite Compassion): भक्त कहता है कि माता-पिता भी दुष्ट पुत्र का त्याग कर सकते हैं (
त्यजति सुतमम्बा किमु पिता), लेकिन आप इतने कृपालु हैं कि मुझ जैसे पापी पर भी कृपा करते हैं। यह गुरु की अहैतुकी कृपा का प्रतीक है। - कल्पवृक्ष से भी बढ़कर (Greater than Kalpavriksha): "वदान्यात् त्वद्भूमौ दिवि सुरभिकल्पद्रुमदृषदां लघुत्वं जानेऽहं" - मैं जानता हूँ कि आपकी उदारता के सामने स्वर्ग के कल्पवृक्ष और कामधेनु भी छोटे (
लघु) हैं। यह गुरु की महिमा को सर्वोच्च स्थापित करता है। - पूर्ण विश्वास और अधिकार (Complete Faith and Right): "महोदारे भूम्नि त्वयि पितरि पुत्रोऽहमधुना" - हे उदार पिता! मैं आपका पुत्र हूँ। यह भक्त का अपने गुरु पर पूर्ण अधिकार और विश्वास का भाव है। वह एक पुत्र की तरह अधिकार से अपनी पीड़ा बता रहा है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
इस स्तोत्र का नाम ही इसकी फलश्रुति है। इसके पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- दरिद्रता का नाश (Eradication of Poverty): यह स्तोत्र का मुख्य लाभ है। इसके नियमित और भक्तिपूर्वक पाठ से हर प्रकार की आर्थिक तंगी, कर्ज (
अनृणं द्रविणं) और वित्तीय बाधाएं दूर होती हैं। - धन-धान्य की प्राप्ति (Attainment of Wealth): गुरु राघवेन्द्र की कृपा से साधक को स्थायी और प्रचुर धन-सम्पदा की प्राप्ति होती है, जिसे वह अपने परिवार के साथ सुखपूर्वक भोग सकता है।
- मानसिक शांति और आत्मविश्वास (Mental Peace and Confidence): दरिद्रता केवल धन की कमी नहीं, बल्कि एक मानसिक अवस्था भी है। यह स्तोत्र हृदय को चिंता (
दारिद्र्यव्यसनपरिपिण्डीकृतहृदयम्) से मुक्त कर शांति और आत्मविश्वास प्रदान करता है। - सर्व-शोक निवारण (Removal of All Sorrows): स्तोत्र की पहली ही पंक्ति में गुरु को "सकलविधया शोकहरणः" कहा गया है, अर्थात् वे हर प्रकार के दुःख को हरने वाले हैं।
- गुरु कृपा की प्राप्ति (Receiving the Guru's Grace): इस स्तोत्र का पाठ साधक को सीधे गुरु राघवेन्द्र की करुणा और कृपा से जोड़ता है, जिससे जीवन की सभी समस्याओं का समाधान होता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ दिन गुरुवार है, क्योंकि यह श्री राघवेन्द्र स्वामी और सभी गुरुओं का दिन माना जाता है।
- प्रातःकाल स्नान के बाद, श्री राघवेन्द्र स्वामी के चित्र या वृंदावन के समक्ष बैठकर घी का दीपक जलाएं।
- पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ, अपनी आर्थिक समस्याओं को गुरु के चरणों में समर्पित करते हुए इस स्तोत्र का 9, 11, या 21 बार पाठ करें।
- जो लोग मन्त्रालयम् जाने में असमर्थ हैं, वे अपने घर पर ही इस स्तोत्र का पाठ करके उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
- पाठ के बाद, "ॐ श्री राघवेन्द्राय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करना अत्यंत फलदायी होता है।